महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1656, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसात्यकिश्चेकितानश्च द्राविडैः सैनिकैः सह ॥ १४ ॥
वृता व्यूहेन महता पाण्ड्याश्चोलाः सकेरलाः ।
धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदीके पुत्र, प्रभद्रक, सात्यकि, चेकितान, द्राविड़ सैनिकोंसहित महान् व्यूहसे घिरे हुए पाण्ड्य, चोल तथा केरल योद्धाओंने धावा किया ॥
व्यूढोरस्का दीर्घभुजाः प्रांशवः पृथुलोचनाः ॥ १५ ॥
आपीडिनो रक्तदन्ता मत्तमातङ्गविक्रमाः ।
इन सबकी छाती चौड़ी और भुजाएँ तथा आँखें बड़ी थीं। वे सब-के-सब ऊँचे कदके थे। उन्होंने भाँति-भाँतिके शिरोभूषण एवं हार धारण किये थे। उनके दाँत लाल थे और वे मतवाले हाथीके समान पराक्रमी थे ॥
नानाविरागवसना गन्धचूर्णावचूर्णिताः ॥ १६ ॥
बद्धासयः पाशहस्ता वारणप्रतिवारणाः ।
उन्होंने अनेक प्रकारके रंगीन वस्त्र पहन रखे थे और अपने अंगोंमें सुगन्धित चूर्ण लगा रखा था। उनकी कमरमें तलवार बँधी थी, वे हाथमें पाश लिये हुए थे और हाथियोंको भी रोक देनेकी शक्ति रखते थे ॥ १६½ ॥
समानमृत्यवो राजन् नात्यजन्त परस्परम् ॥ १७ ॥
कलापिनश्चापहस्ता दीर्घकेशाः प्रियंवदाः ।
पत्तयः सादिनश्चान्ये घोररूपपराक्रमाः ॥ १८ ॥
राजन्! वे सभी सैनिक समानरूपसे मृत्युको वरण करनेकी प्रतिज्ञा करके एक-दूसरेका साथ नहीं छोड़ते थे। वे मस्तकपर मोरपंख धारण किये हुए थे। उनके हाथोंमें धनुष शोभा पाता था। उनके केश बहुत बड़े थे और वे प्रिय वचन बोलते थे। अन्यान्य पैदल और घुड़सवार भी बड़े भयंकर पराक्रमी थे ॥ १७-१८ ॥
अथापरे पुनः शूराश्चेदिपञ्चालकेकयाः ।
कारूषाः कोसलाः काञ्च्या मागधाश्चापि दुद्रुवुः ॥ १९ ॥
तदनन्तर पुनः दूसरे शूरवीर चेदि, पांचाल, केकय, कारूष, कोसल, कांचीनिवासी और मागध सैनिक भी हमी लोगोंपर चढ़ आये ॥ १९ ॥
तेषां रथाश्वनागाश्च प्रवराश्चोग्रपत्तयः ।
नानावाद्यधरैर्हृष्टा नृत्यन्ति च हसन्ति च ॥ २० ॥
उनके रथ, घोड़े और हाथी उत्तम कोटिके थे। पैदल सैनिक भी बड़े भयंकर थे। वे नाना प्रकारके बाजे बजाने-वालोंके साथ हर्षमें भरकर नाचते-कूदते और हँसते थे ॥
तस्य सैन्यस्य महतो महामात्रवरैर्वृतः ।
मध्ये वृकोदरोऽभ्यायात् त्वदीयान् नागधुर्गतः ॥ २१ ॥
उस विशाल सेनाके मध्यभागमें हाथीकी पीठपर बड़े-बड़े महावतोंसे घिरकर बैठे हुए भीमसेन आपके सैनिकोंकी ओर बढ़े आ रहे थे ॥ २१ ॥