भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1664

अपतत् तच्छिरो राजन् कुण्डलोपचितं महत् ।। २१ ।। शम्बरस्य शिरो यद्वन्निहतस्य महारणे । शोचयन् केकयान् सर्वान् जगामाशु वसुन्धराम् ।। २२ ।। राजन्! उस महासमरमें मारे गये अनुविन्दका कुण्डलमण्डित महान् मस्तक शम्बरासुरके सिरके समान कटकर गिरा और समस्त केकयोंको शोकमें डालता हुआ शीघ्र पृथ्वीपर जा पड़ा ।। २१-२२ ।। तं दृष्ट्वा निहतं शूरं भ्राता तस्य महारथः । सज्यमन्यद् धनुः कृत्वा शैनेयं पर्यवारयत् ।। २३ ।। शूरवीर अनुविन्दको मारा गया देख उसके महारथी भाई विन्दने अपने धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर सात्यकिको चारों ओरसे रोका ।। २३ ।। स षष्ट्या सात्यकिं विद्ध्वा स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः । ननाद बलवन्नादं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।। २४ ।। उसने शिलापर तेज किये गये सुवर्णपंखयुक्त साठ बाणोंद्वारा सात्यकिको घायल करके बड़े जोरकी गर्जना की और कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ।। २४ ।।