महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1665, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसात्यकिं च ततस्तूर्णं केकयानां महारथः । शरैरनेकसाहस्रैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ २५ ॥ तदनन्तर केकय-महारथी विन्दने तुरंत ही सात्यकिकी दोनों भुजाओं और छातीमें कई हजार बाण मारे ॥ २५ ॥
स शरैः क्षतसर्वाङ्गः सात्यकिः सत्यविक्रमः । रराज समरे राजन् सपुष्प इव किंशुक ॥ २६ ॥ राजन्! उन बाणोंसे समरांगणमें सत्यपराक्रमी सात्यकिके सारे अंग क्षत-विक्षत हो लहुलुहान हो गये और वे खिले हुए पलाशके समान सुशोभित होने लगे ॥ २६ ॥
सात्यकिः समरे विद्धः कैकेयेन महात्मना । कैकेयं पञ्चविंशत्या विव्याध प्रहसन्निव ॥ २७ ॥ महामना कैकेय (विन्द)-के द्वारा समरांगणमें घायल हुए सात्यकिने हँसते हुए-से पचीस बाण मारकर कैकेयको भी घायल कर दिया ॥ २७ ॥
तावन््योन्यस्य समरे संछिद्य धनुषी शुभे । हत्वा च सारथी तूर्णं हयांश्च रथिनां वरौ ॥ २८ ॥ उन दोनों महारथियोंने युद्धस्थलमें एक-दूसरेके सुन्दर धनुष काटकर तुरंत ही सारथि और घोड़े भी मार डाले ॥ २८ ॥
विरथावसियुद्धाय समाजग्मतुराहवे । शतचन्द्रचिते गृह्य चर्मणी सुभुजौ तथा ॥ २९ ॥ फिर वे सुन्दर भुजाओंवाले दोनों वीर रथहीन होकर सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त ढाल और तलवार लिये खड्ग-युद्धके लिये उद्यत हो युद्धस्थलमें एक-दूसरेके सामने आये ॥ २९ ॥
व्यरोचेतां महारङ्गे निस्त्रिंशवरधारिणौ । यथा देवासुरे युद्धे जम्भशक्रौ महाबलौ ॥ ३० ॥ जैसे देवासुर-संग्राममें महाबली इन्द्र और जम्भासुर शोभा पाते थे, उसी प्रकार युद्धके उस महान् रंगस्थलमें उत्तम खड्ग धारण किये हुए वे दोनों योद्धा सुशोभित हो रहे थे ॥ ३० ॥
मण्डलानि ततस्तौ तु विचरन्तौ महारण । अन्योन्यमभितस्तूर्णं समाजग्मतुराहवे ॥ ३१ ॥ उस महासमरमें मण्डलाकार विचरते और पैंतरे दिखाते हुए वे दोनों वीर तुरंत ही एक-दूसरेके समीप आ गये ॥ ३१ ॥
अन्योन्यस्य वधे चैव चक्रतुर्यत्नमुत्तमम् । कैकेयस्य द्विधा चर्म ततश्छिच्छेद सात्वतः ॥ ३२ ॥ सात्यकेस्तु तथैवासौ चर्म चिच्छेद पार्थिवः ।