भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1677, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1677

दोनों ही युद्धस्थलमें एक-दूसरेको रथहीन कर देनेकी इच्छा करने लगे। तदनन्तर महारथी अश्वत्थामाने बड़े-बड़े अस्त्र प्रकट किये; परन्तु पाण्डुपुत्र भीमसेनने समरांगणमें अपने अस्त्रोंद्वारा ही उन सबको नष्ट कर दिया ।। २२ १/२ ।। ततो घोरं महाराज अस्त्रयुद्धमवर्तत ।। २३ ।। ग्रहयुद्धं यथा घोरं प्रजासंहरणे ह्यभूत् । महाराज! फिर तो जैसे प्रजाके संहारकालमें ग्रहोंका घोर युद्ध होने लगता है, उसी प्रकार उन दोनोंमें भयंकर अस्त्रयुद्ध छिड़ गया ।। २३ १/२ ।। ते बाणाः समसज्जन्त मुक्तास्ताभ्यां तु भारत ।। २४ ।। द्योतयन्तो दिशः सर्वास्तव सैन्यं समन्ततः । भारत! उन दोनोंके छोड़े हुए वे बाण सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए आपकी सेनाके चारों ओर गिरने लगे ।। २४ १/२ ।। बाणसङ्घैर्वृतं घोरमाकाशं समपद्यत ।। २५ ।। उल्कापातावृत्तं युद्धं प्रजानां संक्षये नृप । नरेश्वर! उस समय बाणसमूहोंसे व्याप्त हुआ आकाश बड़ा भयंकर प्रतीत होने लगा; ठीक उस तरह जैसे प्रजाके संहारकालमें होनेवाला युद्ध उल्कापातसे व्याप्त होनेके कारण अत्यन्त भयानक दिखायी देता है ।। २५ १/२ ।। बाणाभिघातात् संजज्ञे तत्र भारत पावकः ।। २६ ।। सविस्फुलिङ्गो दीप्तार्चिर्योऽदहद् वाहिनीद्वयम् । भरतनन्दन! वहाँ बाणोंके परस्पर टकरानेसे चिनगारियों तथा प्रज्वलित लपटोंके साथ आग प्रकट हो गयी, जो दोनों सेनाओंको दग्ध किये देती थी ।। २६ १/२ ।। तत्र सिद्धा महाराज सम्पतन्तोऽब्रुवन् वचः ।। २७ ।। युद्धानामति सर्वेषां युद्धमेतदिति प्रभो । सर्वयुद्धानि चैतस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।। २८ ।। प्रभो! महाराज! उस समय वहाँ उड़कर आते हुए सिद्ध परस्पर इस प्रकार कहने लगे—'यह युद्ध तो सभी युद्धोंसे बढ़कर हो रहा है, अन्य सब युद्ध तो इसकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं थे ।। २७-२८ ।। नेदृशं च पुनर्युद्धं भविष्यति कदाचन । अहो ज्ञानेन सम्पन्नावुभौ ब्राह्मणक्षत्रियौ ।। २९ ।। 'ऐसा युद्ध फिर कभी नहीं होगा। ये ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों ही अद्भुत ज्ञानसे सम्पन्न हैं ।। २९ ।। अहो शौर्येण सम्पन्नावुभौ चोग्रपराक्रमौ । अहो भीमबलो भीम एतस्य च कृतास्त्रता ।। ३० ।।

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