महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1678, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘भयंकर पराक्रम दिखानेवाले ये दोनों योद्धा अद्भुत शौर्यशाली हैं। अहो! भीमसेनका बल भयंकर है। इनका अस्त्रज्ञान अद्भुत है!॥ ३०॥ अहो वीर्यस्य सारत्वमहो सौष्ठवमेतयोः । स्थितावेतौ हि समरे कालान्तकयमोपमौ ॥ ३१ ॥ ‘अहो! इनके वीर्यकी सारता विलक्षण है। इन दोनोंका युद्धसौन्दर्य आश्चर्यजनक है। ये दोनों समरांगणमें कालान्तक एवं यमके समान जान पड़ते हैं॥ ३१॥ रुद्रौ द्वाविव सम्भूतौ यथा द्वाविव भास्करौ । यमौ वा पुरुषव्याघ्रौ घोररूपावुभौ रणे ॥ ३२ ॥ ‘ये भयंकर रूपधारी दोनों पुरुषसिंह रणभूमिमें दो रुद्र, दो सूर्य अथवा दो यमराजके समान प्रकट हुए हैं' ॥ ३२॥ इति वाचः स्म श्रूयन्ते सिद्धानां वै मुहुर्मुहुः । सिंहनादश्च संजज्ञे समेतानां दिवौकसाम् ॥ ३३ ॥ इस प्रकार सिद्धोंकी बातें वहाँ बारंबार सुनायी देती थीं। आकाशमें एकत्र हुए देवताओंका सिंहनाद भी प्रकट हो रहा था॥ ३३॥ अद्भुतं चाप्यचिन्त्यं च दृष्ट्वा कर्म तयो रणे । सिद्धचारणसंघानां विस्मयः समजायत ॥ ३४॥ रणभूमिमें उन दोनोंके अद्भुत एवं अचिन्त्य कर्मको देखकर सिद्धों और चारणोंके समूहोंको बड़ा विस्मय हो रहा था ॥ ३४॥ प्रशंसन्ति तदा देवाः सिद्धाश्च परमर्षयः । साधु द्रौणे महाबाहो साधु भीमेति चाब्रुवन् ॥ ३५ ॥ उस समय देवता, सिद्ध और महर्षिगण उन दोनोंकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे—‘महाबाहु द्रोणकुमार! तुम्हें साधुवाद! भीमसेन! तुम्हारे लिये भी साधुवाद' ॥ ३५॥ तौ शूरौ समरे राजन् परस्परकृतागसौ । परस्परमुदीक्षेतां क्रोधादुद्वृत्य चक्षुषी ॥ ३६॥ राजन्! परस्पर अपराध करनेवाले वे दोनों शूरवीर समरांगणमें क्रोधसे आँखें फाड़-फाड़कर एक-दूसरेकी ओर देख रहे थे ॥ ३६ ॥ क्रोधरक्तेक्षणौ तौ तु क्रोधात् प्रस्फुरिताधरौ । क्रोधात् संदष्टदशनौ तथैव दशनच्छदौ ॥ ३७ ॥ क्रोधसे उन दोनोंकी आँखें लाल हो गयी थीं। क्रोधसे उनके ओठ फड़क रहे थे और क्रोधसे ही वे ओठ चबाते एवं दाँत पीसते थे ॥ ३७॥ अन्योन्यं छादयन्तौ स्म शरवृष्ट्या महारथौ । शराम्बुधारौ समरे शस्त्रविद्युत्प्रकाशिनौ ॥ ३८ ॥