महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1686, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्धमाने ततस्तत्र द्रोणपुत्रे विशाम्पते ।।
हीयमाने च कौन्तेये कृष्णं रोषः समाविशत् ।
प्रजानाथ! जब वहाँ द्रोणपुत्र बढ़ने लगा और कुन्तीकुमारका पराक्रम घटने लगा, तब श्रीकृष्णको बड़ा रोष हुआ।
स रोषान्निःश्वसन् राजन् निर्दहन्निव चक्षुषा ।।
द्रौणिं ददर्श संग्रामे फाल्गुनं च मुहुर्मुहुः ।
ततः क्रुद्धोऽब्रवीत् कृष्णः पार्थं सप्रणयं वचः ।।
राजन्! वे क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचते हुए संग्रामभूमिमें अश्वत्थामाकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो उसे अपनी दृष्टिद्वारा दग्ध कर देंगे। अर्जुनकी ओर भी वे बारंबार दृष्टिपात करने लगे। फिर कुपित हुए श्रीकृष्णने अर्जुनसे प्रेमपूर्वक कहा।
श्रीभगवानुवाच
अत्यद्भुतमहं पार्थ त्वयि पश्यामि संयुगे ।
यत् त्वां विशेषयत्याजौ द्रोणपुत्रोऽद्य भारत ।।
कच्चित्ते गाण्डिवं हस्ते मुष्टिर्वा न व्यशीर्यत ।
कच्चिद् वीर्यं यथापूर्वं भुजयोर्वा बलं तव ।।
उदीर्यमाणं हि रणे पश्यामि द्रौणिमाहवे ।
**श्रीभगवान् बोले—**पार्थ! भरतनन्दन! मैं इस युद्धमें तुम्हारे अंदर यह अत्यन्त अद्भुत परिवर्तन देख रहा हूँ कि आज द्रोणकुमार रणभूमिमें तुमसे आगे बढ़ा जा रहा है। क्या तुम्हारे हाथमें गाण्डीव धनुष है? या तुम्हारी मुट्ठी ढीली पड़ गयी? क्या तुम्हारी दोनों भुजाओंमें पहलेके समान ही बल और पराक्रम है? क्योंकि इस समय संग्राममें द्रोणपुत्रको मैं तुमसे बढ़ा-चढ़ा देख रहा हूँ।
गुरुपुत्र इति ह्येनं मानयन् भरतर्षभ ।
उपेक्षां मा कृथाः पार्थ नायं कालो ह्युपेक्षितुम् ।।)
भरतश्रेष्ठ! यह मेरे गुरुका पुत्र है, ऐसा समझकर इसे सम्मान देते हुए तुम इसकी उपेक्षा न करो। पार्थ! यह उपेक्षाका अवसर नहीं है।
तस्य तं निनदं श्रुत्वा पाण्डवोऽच्युतमब्रवीत् ।
पश्य माधव दौरात्म्यं गुरुपुत्रस्य मां प्रति ।। ३७ ।।
(भगवान् श्रीकृष्णका यह कथन तथा) अश्वत्थामाके उस सिंहनादको सुनकर पाण्डुपुत्र अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा—'माधव! देखिये तो सही गुरुपुत्र अश्वत्थामा मेरे प्रति कैसी दुष्टता कर रहा है? ।। ३७ ।।
वधं प्राप्तौ मन्यते नौ प्रावेश्य शरवेश्मनि ।
एषोऽस्मि हन्मि संकल्पं शिक्षया च बलेन च ।। ३८ ।।