महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1685, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् प्रतापी भरद्वाजकुलनन्दन अश्वत्थामाने सैकड़ों तीखे बाणोंसे रणभूमिमें श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंको निश्चेष्ट कर दिया।
हाहाकृतमभूत् सर्वं स्थावरं जङ्गमं तथा ।
चराचरस्य गोप्तारौ दृष्ट्वा संछादितौ शरैः ॥
चराचरकी रक्षा करनेवाले उन दोनों महापुरुषोंको बाणोंद्वारा आच्छादित देख समस्त स्थावर-जंगम जगत्में हाहाकार मच गया।
सिद्धचारणसंघाश्च सम्पेतुर्वै समन्ततः ।
अपि स्वस्ति भवेद्य लोकानामिति चाब्रुवन् ॥
सिद्ध और चारणोंके समुदाय सब ओरसे वहाँ आ पहुँचे और बोले—'आज तीनों लोकोंका मंगल हो'।
न मया तादृशो राजन् दृष्टपूर्वः पराक्रमः ।
संजज्ञे यादृशो द्रौणेः कृष्णौ छादयतो रणे ॥
राजन्! मैंने इससे पहले अश्वत्थामाका वैसा पराक्रम नहीं देखा था, जैसा कि रणभूमिमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको आच्छादित करते समय प्रकट हुआ था।
द्रौणेस्तु धनुषः शब्दं रथानां त्रासनं रणे ।
अश्रौषं बहुशो राजन् सिंहस्य नदतो यथा ॥
नरेश्वर! रणभूमिमें द्रोणकुमारके धनुषकी टंकार बड़े-बड़े रथियोंको भयभीत करनेवाली थी। दहाड़ते हुए सिंहके समान उसके शब्दको मैंने बहुत बार सुना था।
ज्या चास्य चरतो युद्धे सव्यं दक्षिणमस्यतः ।
विद्युदम्भोधरस्येव भ्राजमाना व्यदृश्यत ॥
युद्धमें विचरते हुए अश्वत्थामाके धनुषकी प्रत्यंचा बायें-दायें बाण छोड़ते समय बादलमें बिजलीके समान चमकती दिखायी देती थी।
स तदा क्षिप्रकारी च दृढहस्तश्च पाण्डवः ।
प्रमोहं परमं गत्वा प्रेक्षन्नास्ते धनंजयः ॥
शीघ्रता करने और दृढ़तापूर्वक हाथ चलानेवाले पाण्डुपुत्र धनंजय उस समय भारी मोहमें पड़कर केवल देखते रह गये थे।
विक्रमं च हृतं मेने आत्मनस्तेन संयुगे ।
तदास्य समरे राजन् वपुरासीत् सुदुर्द्दशम् ॥
द्रौणेस्तत् कुर्वतः कर्म यादृग्रूपं पिनाकिनः ।
उन्हें युद्धमें ऐसा मालूम होता था कि अश्वत्थामाने मेरा पराक्रम हर लिया है। राजन्! उस समय समरांगणमें वैसा पराक्रम करते हुए द्रोणकुमार अश्वत्थामाका शरीर ऐसा डरावना हो गया था कि उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था। पिनाकपाणि भगवान् रुद्रका जैसा रूप दिखायी देता है, वैसा ही उसका भी था।