महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तत्पश्चात् प्रतापी भरद्वाजकुलनन्दन अश्वत्थामाने सैकड़ों तीखे बाणोंसे रणभूमिमें श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंको निश्चेष्ट कर दिया।
हाहाकृतमभूत् सर्वं स्थावरं जङ्गमं तथा ।
चराचरस्य गोप्तारौ दृष्ट्वा संछादितौ शरैः ॥
चराचरकी रक्षा करनेवाले उन दोनों महापुरुषोंको बाणोंद्वारा आच्छादित देख समस्त स्थावर-जंगम जगत्में हाहाकार मच गया।
सिद्धचारणसंघाश्च सम्पेतुर्वै समन्ततः ।
अपि स्वस्ति भवेद्य लोकानामिति चाब्रुवन् ॥
सिद्ध और चारणोंके समुदाय सब ओरसे वहाँ आ पहुँचे और बोले—'आज तीनों लोकोंका मंगल हो'।
न मया तादृशो राजन् दृष्टपूर्वः पराक्रमः ।
संजज्ञे यादृशो द्रौणेः कृष्णौ छादयतो रणे ॥
राजन्! मैंने इससे पहले अश्वत्थामाका वैसा पराक्रम नहीं देखा था, जैसा कि रणभूमिमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको आच्छादित करते समय प्रकट हुआ था।
द्रौणेस्तु धनुषः शब्दं रथानां त्रासनं रणे ।
अश्रौषं बहुशो राजन् सिंहस्य नदतो यथा ॥
नरेश्वर! रणभूमिमें द्रोणकुमारके धनुषकी टंकार बड़े-बड़े रथियोंको भयभीत करनेवाली थी। दहाड़ते हुए सिंहके समान उसके शब्दको मैंने बहुत बार सुना था।
ज्या चास्य चरतो युद्धे सव्यं दक्षिणमस्यतः ।
विद्युदम्भोधरस्येव भ्राजमाना व्यदृश्यत ॥
युद्धमें विचरते हुए अश्वत्थामाके धनुषकी प्रत्यंचा बायें-दायें बाण छोड़ते समय बादलमें बिजलीके समान चमकती दिखायी देती थी।
स तदा क्षिप्रकारी च दृढहस्तश्च पाण्डवः ।
प्रमोहं परमं गत्वा प्रेक्षन्नास्ते धनंजयः ॥
शीघ्रता करने और दृढ़तापूर्वक हाथ चलानेवाले पाण्डुपुत्र धनंजय उस समय भारी मोहमें पड़कर केवल देखते रह गये थे।
विक्रमं च हृतं मेने आत्मनस्तेन संयुगे ।
तदास्य समरे राजन् वपुरासीत् सुदुर्द्दशम् ॥
द्रौणेस्तत् कुर्वतः कर्म यादृग्रूपं पिनाकिनः ।
उन्हें युद्धमें ऐसा मालूम होता था कि अश्वत्थामाने मेरा पराक्रम हर लिया है। राजन्! उस समय समरांगणमें वैसा पराक्रम करते हुए द्रोणकुमार अश्वत्थामाका शरीर ऐसा डरावना हो गया था कि उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था। पिनाकपाणि भगवान् रुद्रका जैसा रूप दिखायी देता है, वैसा ही उसका भी था।
वर्धमाने ततस्तत्र द्रोणपुत्रे विशाम्पते ।।
हीयमाने च कौन्तेये कृष्णं रोषः समाविशत् ।
प्रजानाथ! जब वहाँ द्रोणपुत्र बढ़ने लगा और कुन्तीकुमारका पराक्रम घटने लगा, तब श्रीकृष्णको बड़ा रोष हुआ।
स रोषान्निःश्वसन् राजन् निर्दहन्निव चक्षुषा ।।
द्रौणिं ददर्श संग्रामे फाल्गुनं च मुहुर्मुहुः ।
ततः क्रुद्धोऽब्रवीत् कृष्णः पार्थं सप्रणयं वचः ।।
राजन्! वे क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचते हुए संग्रामभूमिमें अश्वत्थामाकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो उसे अपनी दृष्टिद्वारा दग्ध कर देंगे। अर्जुनकी ओर भी वे बारंबार दृष्टिपात करने लगे। फिर कुपित हुए श्रीकृष्णने अर्जुनसे प्रेमपूर्वक कहा।
श्रीभगवानुवाच
अत्यद्भुतमहं पार्थ त्वयि पश्यामि संयुगे ।
यत् त्वां विशेषयत्याजौ द्रोणपुत्रोऽद्य भारत ।।
कच्चित्ते गाण्डिवं हस्ते मुष्टिर्वा न व्यशीर्यत ।
कच्चिद् वीर्यं यथापूर्वं भुजयोर्वा बलं तव ।।
उदीर्यमाणं हि रणे पश्यामि द्रौणिमाहवे ।
**श्रीभगवान् बोले—**पार्थ! भरतनन्दन! मैं इस युद्धमें तुम्हारे अंदर यह अत्यन्त अद्भुत परिवर्तन देख रहा हूँ कि आज द्रोणकुमार रणभूमिमें तुमसे आगे बढ़ा जा रहा है। क्या तुम्हारे हाथमें गाण्डीव धनुष है? या तुम्हारी मुट्ठी ढीली पड़ गयी? क्या तुम्हारी दोनों भुजाओंमें पहलेके समान ही बल और पराक्रम है? क्योंकि इस समय संग्राममें द्रोणपुत्रको मैं तुमसे बढ़ा-चढ़ा देख रहा हूँ।
गुरुपुत्र इति ह्येनं मानयन् भरतर्षभ ।
उपेक्षां मा कृथाः पार्थ नायं कालो ह्युपेक्षितुम् ।।)
भरतश्रेष्ठ! यह मेरे गुरुका पुत्र है, ऐसा समझकर इसे सम्मान देते हुए तुम इसकी उपेक्षा न करो। पार्थ! यह उपेक्षाका अवसर नहीं है।
तस्य तं निनदं श्रुत्वा पाण्डवोऽच्युतमब्रवीत् ।
पश्य माधव दौरात्म्यं गुरुपुत्रस्य मां प्रति ।। ३७ ।।
(भगवान् श्रीकृष्णका यह कथन तथा) अश्वत्थामाके उस सिंहनादको सुनकर पाण्डुपुत्र अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा—'माधव! देखिये तो सही गुरुपुत्र अश्वत्थामा मेरे प्रति कैसी दुष्टता कर रहा है? ।। ३७ ।।
वधं प्राप्तौ मन्यते नौ प्रावेश्य शरवेश्मनि ।
एषोऽस्मि हन्मि संकल्पं शिक्षया च बलेन च ।। ३८ ।।
'यह अपने बाणोंके घेरेमें डालकर हम दोनोंको मारा गया समझता है। मैं अभी अपनी शिक्षा और बलसे इसके इस मनोरथको नष्ट किये देता हूँ' ।। ३८ ।। अश्वत्थाम्नः शरानस्तान् छित्त्वैकैकं त्रिधा त्रिधा । व्यधमद् भरतश्रेष्ठो निहारमिव मारुतः ।। ३९ ।। ऐसा कहकर भरतश्रेष्ठ अर्जुनने अश्वत्थामाके चलाये हुए उन बाणोंमेंसे प्रत्येकके तीन-तीन टुकड़े करके उन सबको उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे हवा कुहरेको उड़ा देती है ।। ३९ ।। ततः संशप्तकान् भूयः साश्वसूतरथद्विपान् । ध्वजपत्तिगणानुग्रैर्बाणैर्विव्याध पाण्डवः ।। ४० ।। तदनन्तर पाण्डुकुमार अर्जुनने पुनः घोड़े, सारथि, रथ, हाथी, पैदलसमूह और ध्वजोंसहित संशप्तक-सैनिकोंको अपने भयंकर बाणोंद्वारा बींध डाला ।। ४० ।। ये ये ददृशिरे तत्र यद्यद्रूपास्तदा जनाः । ते ते तत्र शरैर्व्याप्तं मेनिरेऽऽत्मानमात्मना ।। ४१ ।। उस समय वहाँ जो-जो मनुष्य जिस-जिस रूपमें दिखायी देते थे, वे-वे स्वयं ही अपने-आपको बाणोंसे व्याप्त मानने लगे ।। ४१ ।। ते गाण्डीवप्रमुक्तास्तु नानारूपाः पत्रिणः । क्रोशे साग्रे स्थितान् घ्नन्ति द्विपांश्च पुरुषान् रणे ।। ४२ ।। गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए नाना प्रकारके बाण रणभूमिमें एक कोससे अधिक दूरीपर खड़े हुए हाथियों और मनुष्योंको भी मार डालते थे ।। ४२ ।। भल्लैश्छिन्नाः कराः पेतुः करिणां मदवर्षिणाम् । यथा वने परशुभिर्निकृत्ताः सुमहाद्रुमाः ।। ४३ ।। जैसे जंगलमें कुल्हाड़ोंसे काटनेपर बड़े-बड़े वृक्ष धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार वहाँ मदकी वर्षा करनेवाले गजराजोंके शुण्डदण्ड भल्लोंसे कट-कटकर धरतीपर गिरने लगे ।। ४३ ।। पश्चात्तु शैलवत् पेतुस्ते गजाः सह सादिभिः । वज्रिवज्रप्रमथिता यथैवाद्रिचयास्तथा ।। ४४ ।। सूँड़ कटनेके पश्चात् वे पर्वतोंके समान हाथी अपने सवारोंसहित उसी प्रकार गिर जाते थे, जैसे वज्रधारी इन्द्रके वज्रसे विदीर्ण होकर गिरे हुए पहाड़ोंके ढेर लगे हों ।। ४४ ।। गन्धर्वनगराकारान् रथांश्चैव सुकल्पितान् । विनीतैर्जवनैर्युक्तानास्थितान् युद्धदुर्मदैः ।। ४५ ।। शरैर्विशकलीकुर्वन्नमित्रानभ्यवीवृषत् । स्वलंकृतानश्वसादीन् पत्तींश्चाहन् धनंजयः ।। ४६ ।।
धनंजय अपने बाणोंद्वारा सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए, रणदुर्मद रथियोंकी सवारीमें आये हुए एवं गन्धर्वनगरके समान आकारवाले सुसज्जित रथोंके टुकड़े-टुकड़े करते हुए शत्रुओंपर बाण बरसाते और सजे-सजाये घुड़सवारों एवं पैदलोंको भी मार गिराते थे ॥ ४५-४६ ॥
धनंजययुगान्ताकः संशप्तकमहार्णवम् ।
व्यशोषयत दुःशोषं तीक्ष्णैः शरगभस्तिभिः ॥ ४७ ॥
अर्जुनरूपी प्रलयकालिक सूर्यने जिसका शोषण करना कठिन था, ऐसे संशप्तक-सैन्यरूपी महासागरको अपनी बाणमयी प्रचण्ड किरणोंसे सोख लिया ॥ ४७ ॥
पुनर्द्रौणिं महाशैलं नाराचैर्वज्रसंनिभैः ।
निर्बिभेद महावेगैस्त्वरन् वज्रीव पर्वतम् ॥ ४८ ॥
जैसे वज्रधारी इन्द्रने पर्वतोंको विदीर्ण किया था, उसी प्रकार अर्जुनने महान् वेगशाली वज्रतुल्य नाराचोंद्वारा अश्वत्थामारूपी महान् शैलको पुनः वेधना आरम्भ किया ॥ ४८ ॥
तमाचार्यसुतः क्रुद्धः साश्वयन्तारमाशुगैः ।
युयुत्सुरागमद्योद्धुं पार्थस्तानच्छिनच्छरान् ॥ ४९ ॥
तब क्रोधमें भरा हुआ आचार्यपुत्र सारथि श्रीकृष्णसहित अर्जुनके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे बाणोंद्वारा उनके सामने उपस्थित हुआ; परंतु कुन्तीकुमार अर्जुनने उसके सभी बाण काट गिराये ॥ ४९ ॥
ततः परमसंक्रुद्धः पाण्डवेऽस्त्राण्यवासृजत् ।
अश्वत्थामाभिरूपाय गृहानतिथये यथा ॥ ५० ॥
तदनन्तर अत्यन्त कुपित हुआ अश्वत्थामा पाण्डुपुत्र अर्जुनको उसी प्रकार अपने अस्त्र अर्पित करने लगा, जैसे कोई गृहस्थ योग्य अतिथिको अपना सारा घर सौंप देता है ॥ ५० ॥
अथ संशप्तकांस्त्यक्त्वा पाण्डवो द्रौणिमभ्ययात् ।
अपाङ्क्तेयानिव त्यक्त्वा दाता पाङ्क्तेयमर्थिनम् ॥ ५१ ॥
तब पाण्डुपुत्र अर्जुन संशप्तकोंको छोड़कर द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके सामने आये। ठीक उसी तरह जैसे दाता पंक्तिमें बैठनेके अयोग्य ब्राह्मणोंको छोड़कर याचना करनेवाले पंक्तिपावन ब्राह्मणकी ओर जाता है ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अश्वत्थामाार्जुनसंवादे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अश्वत्थामा और अर्जुनका संवादविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६६ १/३ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 1689)
सप्तदशोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाकी पराजय
संजय उवाच
ततः समभवद् युद्धं शुक्राङ्गिरसवर्चसोः ।
नक्षत्रमभितो व्योम्नि शुक्राङ्गिरसयोरिव ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर आकाशमें नक्षत्रमण्डलके निकट परस्पर युद्ध करनेवाले शुक्राचार्य और बृहस्पतिके समान वहाँ रणभूमिमें श्रीकृष्णके निकट शुक्र और बृहस्पतिके तुल्य तेजस्वी अश्वत्थामा और अर्जुनका युद्ध होने लगा ॥ १ ॥
संतापयन्तावन्योन्यं दीप्तैः शरगभस्तिभिः ।
लोकत्रासकरावास्तां विमार्गस्थौ ग्रहाविव ॥ २ ॥
जैसे वक्र या अतिचार गतिसे चलनेवाले दो ग्रह सम्पूर्ण जगत्के लिये त्रास उत्पन्न करनेवाले हो जाते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर अपनी बाणमयी प्रज्वलित किरणोंद्वारा एक-दूसरेको संताप देने लगे ॥ २ ॥
ततोऽविध्यद् भ्रुवोर्मध्ये नाराचेनार्जुनो भृशम् ।
स तेन विबभौ द्रौणिरूर्ध्वरश्मिर्यथा रविः ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने एक नाराचसे अश्वत्थामाकी दोनों भौंहोंके मध्यभागमें गहरा आघात पहुँचाया। ललाटमें धँसे हुए उस बाणसे अश्वत्थामा ऊपरकी ओर उठी हुई किरणोंवाले सूर्यके समान सुशोभित होने लगा ॥ ३ ॥
अथ कृष्णौ शरशतैरश्वत्थाम्नार्दितौ भृशम् ।
स्वरश्मिजालविकचौ युगान्तार्काविवासतुः ॥ ४ ॥
इसके बाद अश्वत्थामाने भी श्रीकृष्ण और अर्जुनको अपने सैकड़ों बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। उस समय वे दोनों अपनी किरणोंका प्रसार करनेवाले प्रलयकालके दो सूर्योंके समान प्रतीत होते थे ॥ ४ ॥
ततोऽर्जुनः सर्वतोधारमस्त्र-
मवासृजद् वासुदेवेऽभिभूते ।
द्रौणायनिं चाभ्यहनत् पृषत्कै-
र्वज्राग्निवैवस्वतदण्डकल्पैः ॥ ५ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके घायल होनेपर अर्जुनने एक ऐसे अस्त्रका प्रयोग किया, जिसकी धार सब ओर थी। उन्होंने वज्र, अग्नि और यमदण्डके समान अमोघ, दाहक और प्राणहारी बाणोंद्वारा द्रोणकुमार अश्वत्थामाको घायल कर दिया ॥ ५ ॥
स केशवं चार्जुनं चातितेजा
विव्याध मर्मस्वतिरौद्रकर्मा । बाणैः सुयुक्तैरतितीव्रवेगै- यैराहतो मृत्युरपि व्यथेत ॥ ६ ॥ फिर अत्यन्त भयंकर कर्म करनेवाले महातेजस्वी अश्वत्थामाने भी अच्छी तरह छोड़े हुए अत्यन्त तीव्र वेगवाले बाणोंद्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनके मर्मस्थानोंमें आघात किया। वे बाण ऐसे थे जिनकी चोट खाकर मौतको भी व्यथा हो सकती थी ॥ ६ ॥
द्रौणेरिषूनर्जुनः संनिवार्य व्यायच्छतस्तद्द्विगुणैः सुपुङ्खैः । तं साश्वसूतध्वजमेकवीर- मावृत्य संशप्तकसैन्यमार्च्छत् ॥ ७ ॥ अर्जुनने परिश्रमपूर्वक बाण चलानेवाले द्रोणकुमारके उन बाणोंका सुन्दर पंखवाले उनसे दुगुने बाणोंद्वारा निवारण करके घोड़े, सारथि और ध्वजसहित उस एक वीरको आच्छादित कर दिया। फिर वे संशप्तकसेनाकी ओर चल दिये ॥ ७ ॥
धनूंषि बाणानिषुधीर्धनुर्ज्याः पाणीन् भुजान् पाणिगतं च शस्त्रम् । छत्राणि केतूनस्तुरगान् रथेषां वस्त्राणि माल्यान्यथ भूषणानि ॥ ८ ॥ चर्माणि वर्माणि मनोरमाणि प्रियाणि सर्वाणि शिरांसि चैव । चिच्छेद पार्थो द्विषतां सुयुक्तै- र्बाणैः स्थितानामपराङ्मुखानाम् ॥ ९ ॥ कुन्तीकुमार अर्जुनने उत्तम रीतिसे छोड़े गये बाणोंद्वारा युद्धमें पीठ न दिखाकर सामने खड़े हुए शत्रुओंके धनुष, बाण, तरकस, प्रत्यंचा, हाथ, भुजा, हाथमें रखे हुए शस्त्र, छत्र, ध्वज, अश्व, रथ, ईषादण्ड, वस्त्र, माला, आभूषण, ढाल, सुन्दर कवच, समस्त प्रिय वस्तु तथा मस्तक—इन सबको काट डाला ॥ ८-९ ॥
सुकल्पिताः स्यन्दनवाजिनागाः समास्थिताः कृतयत्नैर्नृवीरैः । पार्थेरितैर्बाणशतैर्निरस्ता- स्तैरेव सार्धं नृवरैर्निपेतुः ॥ १० ॥ सुन्दर सजे-सजाये रथ, घोड़े और हाथी खड़े थे और उनपर प्रयत्नपूर्वक युद्ध करनेवाले नरवीर बैठे थे; परंतु अर्जुनके चलाये हुए सैकड़ों बाणोंसे घायल हो वे सारे वाहन उन नरवीरोंके साथ ही धराशायी हो गये ॥ १० ॥
पद्मार्कपूर्णेन्दुनिभाननानि
किरीटमाल्याभरणोज्ज्वलानि । भल्लार्धचन्द्रक्षुरकर्तितानि प्रपेतुरुर्व्यां नृशिरांस्यजस्रम् ॥ ११ ॥ जिनके मुखकमल, सूर्य और पूर्ण चन्द्रमाके समान सुन्दर, तेजस्वी एवं मनोरम थे तथा मुकुट, माला एवं आभूषणोंसे प्रकाशित हो रहे थे, ऐसे असंख्य नरमुण्ड भल्ल, अर्द्धचन्द्र तथा क्षुर नामक बाणोंसे कट-कटकर लगातार पृथ्वीपर गिर रहे थे ॥ ११ ॥
अथ द्विपैर्देवपतिद्विपाभै- र्देवारिदर्पापहमत्युदग्रम् । कलिङ्गवङ्गाङ्गनिशादवीरा जिघांसवः पाण्डवमभ्यधावन् ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् कलिंग, अंग, वंग और निषाद देशोंके वीर देवराज इन्द्रके ऐरावत हाथीके समान विशाल गजराजोंपर सवार हो, देवद्रोहियोंका दर्प दलन करनेवाले प्रचण्ड वीर पाण्डुकुमार अर्जुनपर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे चढ़ आये ॥ १२ ॥
तेषां द्विपानां निचकर्त पार्थो वर्माणि चर्माणि करान् नियन्तॄन् । ध्वजान् पताकांश्च ततः प्रपेतु- र्वज्राहतानीव गिरेः शिरांसि ॥ १३ ॥ कुन्तीकुमार अर्जुनने उनके हाथियोंके कवच, चर्म, सूँड़, महावत, ध्वजा और पताका—सबको काट डाला। इससे वे वज्रके मारे हुए पर्वतीय शिखरोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १३ ॥
तेषु प्रभग्नेषु गुरोस्तनूजं बाणैः किरीटी नवसूर्यवर्णैः । प्रच्छादयामास महाभ्रजालै- र्वायुः समुद्यन्तमिवांशुमन्तम् ॥ १४ ॥ उनके नष्ट हो जानेपर किरीटधारी अर्जुनने प्रभातकालके सूर्यकी कान्तिके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा गुरुपुत्र अश्वत्थामाको ढक दिया, मानो वायुने उगते हुए किरणोंवाले सूर्यको मेघोंकी बड़ी भारी घटाओंसे आच्छादित कर दिया हो ॥ १४ ॥
ततोऽर्जुनेषूनिषुभिर्निरस्य द्रौणिः शितैरर्जुनवासुदेवौ । प्रच्छादयित्वा दिवि चन्द्रसूर्यौ ननाद सोऽम्भोद इवातपान्ते ॥ १५ ॥ तब द्रोणकुमार अश्वत्थामाने अपने तीखे बाणोंद्वारा अर्जुनके बाणोंका निवारण करके श्रीकृष्ण और अर्जुनको ढक दिया और आकाशमें चन्द्रमा तथा सूर्यको आच्छादित करके
गर्जनेवाले वर्षाकालके मेघकी भाँति वह गम्भीर गर्जना करने लगा ।। १५ ।। तमर्जुनस्तांश्च पुनस्त्वदीया- नभ्यर्दितस्तैरभिसृत्य शस्त्रैः । बाणान्धकारं सहसैव कृत्वा विव्याध सर्वानिषुभिः सुपुङ्खैः ।। १६ ।। उसके बाणोंसे पीड़ित हुए अर्जुनने आगे बढ़कर सहसा शस्त्रोंद्वारा शत्रुके बाणजनित अन्धकारको नष्ट करके उत्तम पंखवाले अपने बाणोंद्वारा अश्वत्थामा तथा आपके अन्य समस्त सैनिकोंको पुनः घायल कर दिया ।। १६ ।। नाप्याददत् संदधन्नैव मुञ्चन् बाणान् रथेऽदृश्यत सव्यसाची । रथांश्च नागांस्तुरगान् पदातीन् संस्त्यूतदेहान् ददृशुर्हतांश्च ।। १७ ।। रथपर बैठे हुए सव्यसाची अर्जुन कब तरकससे बाण लेते, कब उन्हें धनुषपर रखते और कब छोड़ते हैं, यह नहीं दिखायी देता था। सब लोग यही देखते थे कि रथियों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंके शरीर उनके बाणोंसे गुँथे हुए हैं और वे प्राणशून्य हो गये हैं ।। १७ ।। संधाय नाराचवरान् दशाशु द्रौणिस्त्वरन्नेकमिवोत्ससर्ज । तेषां च पञ्चार्जुनमभ्यविध्यन् पञ्चाच्युतं निर्बिभिदुः सुपुङ्खाः ।। १८ ।। तब अश्वत्थामाने बड़ी उतावलीके साथ अपने धनुषपर दस उत्तम नाराच रखे और उन सबको एकके ही समान एक साथ छोड़ दिया। उनमेंसे पाँच सुन्दर पंखवाले नाराचोंने अर्जुनको बींध डाला और पाँचने श्रीकृष्णको क्षत-विक्षत कर दिया ।। १८ ।। तैराहतौ सर्वमनुष्यमुख्या- वसृक् स्रवन्तौ धनदेन्द्रकल्पौ । समाप्तविद्येन तथाभिभूतौ हतौ रणे ताविति मेनिरेऽन्ये ।। १९ ।। उन बाणोंसे आहत होकर सम्पूर्ण मनुष्योंमें श्रेष्ठ, कुबेर और इन्द्रके समान पराक्रमी वे दोनों वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने अंगोंसे रक्त बहाने लगे। जिसकी विद्या पूरी हो चुकी थी, उस अश्वत्थामाके द्वारा इस प्रकार पराभवको प्राप्त हुए उन दोनोंको अन्य सब लोगोंने यही समझा कि 'वे रणभूमिमें मारे गये' ।। १९ ।। अथार्जुनं प्राह दशार्हनाथः प्रमाद्यसे किं जहि योधमेतम् ।
कुर्याद्धि दोषं समुपेक्षितोऽयं कष्टो भवेद् व्याधिरिवाक्रियावान् ॥ २० ॥ तब दशार्हवंशके स्वामी श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—‘पार्थ! तुम क्यों प्रमाद कर रहे हो? इस योद्धाको मार डालो। इसकी उपेक्षा की जायगी तो यह और भी नये-नये अपराध करेगा और जिसकी चिकित्सा न की गयी हो, उस रोगके समान अधिक कष्टदायक हो जायगा’ ॥
तथेति चोक्त्वाच्युतमप्रमादी द्रौणिं प्रयत्नादिषुभिस्ततक्ष । भुजौ वरौ चन्दनसारदिग्धौ वक्षः शिरोऽथाप्रतिमौ तथोरू ॥ २१ ॥ ‘बहुत अच्छा, ऐसा ही करूँगा’ श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर सतत सावधान रहनेवाले अर्जुन अपने बाणोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक अश्वत्थामाको—उसके चन्दनसारचर्चित श्रेष्ठ भुजाओं, वक्षःस्थल, सिर और अनुपम जाँघोंको क्षत-विक्षत करने लगे ॥ २१ ॥
गाण्डीवमुक्तैः कुपितोऽविकर्णै- र्द्रौणिं शरैः संयति निर्बिभेद । छित्त्वा तु रश्मींस्तुरगानविध्यत् ते तं रणाद्दूरमतीव दूरम् ॥ २२ ॥ क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए भेड़के कान-जैसे अग्रभागवाले बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें द्रोणपुत्रको विदीर्ण कर डाला। घोड़ोंकी बागडोर काटकर उन्हें अत्यन्त घायल कर दिया। इससे वे घोड़े अश्वत्थामाको रणभूमिसे बहुत दूर भगा ले गये ॥ २२ ॥
स तैर्हृतो वातजवैस्तुरङ्गै- र्द्रौणिर्दृढं पार्थशराभिभूतः । इयेष नावृत्य पुनस्तु योद्धुं पार्थेन सार्धं मतिमान् विमृश्य । जानञ्जयं नियतं वृष्णिवीरे धनंजये चाङ्गिरसां वरिष्ठः ॥ २३ ॥ अश्वत्थामा अर्जुनके बाणोंसे बहुत पीड़ित हो गया था। जब वायुके समान वेगशाली घोड़े उसे रणभूमिसे बहुत दूर हटा ले गये, तब उस बुद्धिमान् वीरने मन-ही-मन विचार करके पुनः लौटकर अर्जुनके साथ युद्ध करनेकी इच्छा त्याग दी। अंगिरा गोत्रवाले ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ अश्वत्थामा यह जान गया था कि वृष्णिवीर श्रीकृष्ण और अर्जुनकी विजय निश्चित है ॥ २३ ॥
नियम्य स हयान् द्रौणिः समाश्वास्य च मारिष । रथाश्वनरसम्बाधं कर्णस्य प्राविशद् बलम् ॥ २४ ॥
मान्यवर! अपने घोड़ोंको रोककर थोड़ी देर उनको स्वस्थ कर लेनेके बाद द्रोणकुमार अश्वत्थामा रथ, घोड़े और पैदल मनुष्योंसे भरी हुई कर्णकी सेनामें प्रविष्ट हो गया ।। २४ ।।
प्रतीपकारिणि रणादश्वत्थाम्नि हृते हयैः ।
मन्त्रौषधिक्रियायोगैर्व्याधौ देहादिवाहृते ।। २५ ।।
संशप्तकानभिमुखौ प्रयातौ केशवार्जुनौ ।
वातोद्धूतपताकेन स्यन्दनेनौघनादिना ।। २६ ।।
जैसे मन्त्र, औषध, चिकित्सा और योगके द्वारा शरीरसे रोग दूर हो जाता है, उसी प्रकार जब प्रतिकूल कार्य करनेवाला अश्वत्थामा चारों घोड़ोंद्वारा रणभूमिसे दूर हटा दिया गया, तब वायुसे फहराती हुई पताकाओंसे युक्त और जलप्रवाहके समान गम्भीर घोष करनेवाले रथके द्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुन फिर संशप्तकोंकी ओर चल दिये ।। २५-२६ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अश्वत्थामपराजये सप्तदशोऽध्यायः ।। १७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अश्वत्थामाकी पराजयविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1695)
अष्टादशोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा हाथियोंसहित दण्डधार और दण्ड आदिका वध तथा उनकी सेनाका पलायन
संजय उवाच
अथोत्तरेण पाण्डूनां सेनायां ध्वनिरुत्थितः ।
रथनागाश्वपत्तीनां दण्डधारेण वध्यताम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर पाण्डव-सेनाके उत्तर भागमें दण्डधारके द्वारा मारे जाते हुए रथी, हाथी, घोड़े और पैदलोंका आर्तनाद गूँज उठा ॥ १ ॥
निवर्तयित्वा तु रथं केशवोऽर्जुनमब्रवीत् ।
वाहयन्नेव तुरगान् गरुडानिलरंहसः ॥ २ ॥
उस समय भगवान् श्रीकृष्णने अपना रथ लौटाकर गरुड़ और वायुके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँकते हुए ही अर्जुनसे कहा— ॥ २ ॥
मागधोऽप्यतिविक्रान्तो द्विरदेन प्रमाथिना ।
भगदत्तादनावरः शिक्षया च बलेन च ॥ ३ ॥
'पार्थ! यह मगधनिवासी दण्डधार भी बड़ा पराक्रमी है। इसके पास शत्रुओंको मथ डालने-वाला गजराज है। इसे युद्धकी उत्तम शिक्षा मिली है तथा यह बलवान् भी है, इन सब विशेषताओंके कारण यह पराक्रममें भगदत्तसे तनिक भी कम नहीं है ॥ ३ ॥
एनं हत्वा निहन्तासि पुनः संशप्तकानिति ।
वाक्यान्ते प्रापयत् पार्थं दण्डधारान्तिकं प्रति ॥ ४ ॥
'अतः पहले इसका वध करके तुम पुनः संशप्तकोंका संहार करना।' इतना कहते-कहते श्रीकृष्णने अर्जुनको दण्डधारके निकट पहुँचा दिया ॥ ४ ॥
स मागधानां प्रवरोऽङ्कुशग्रहे
ग्रहेऽप्रसह्यो विकचो यथा ग्रहः ।
सपत्नसेनां प्रममाथ दारुणो
महीं समग्रां विकचो यथा ग्रहः ॥ ५ ॥
मागध वीरोंमें सर्वश्रेष्ठ दण्डधार अंकुश धारण करके हाथीद्वारा युद्ध करनेमें अपना सानी नहीं रखते थे। जैसे ग्रहोंमें केतुग्रहका वेग असह्य होता है, उसी प्रकार उनका आक्रमण भी शत्रुओंके लिये असहनीय था। जैसे धूमकेतु नामक उत्पातग्रह सम्पूर्ण भूमण्डलके लिये अनिष्टकारक होता है, उसी प्रकार उस भयंकर वीरने वहाँ शत्रुओंकी सम्पूर्ण सेनाको मथ डाला ॥ ५ ॥
सुकल्पितं दानवनागसंनिभं महाभ्रनिर्ह्रादममित्रमर्दनम् । रथाश्वमातङ्गगणान् सहस्रशः समास्थितो हन्ति शरैर्नरानपि ॥ ६ ॥ उनका हाथी खूब सजाया गया था, वह गजासुरके समान बलशाली, महामेघके समान गर्जना करनेवाला तथा शत्रुओंको रौंद डालनेवाला था। उसपर आरूढ़ होकर दण्डधार अपने बाणोंसे सहस्रों रथों, घोड़ों, मतवाले हाथियों और पैदल मनुष्योंका भी संहार करने लगे ॥ ६ ॥
रथानधिष्ठाय सवाजिसारथीन् नरांश्च पादैर्द्विरदो व्यपोथयत् । द्विपांश्च पद्भ्यां ममृदे करेण द्विपोत्तमो हन्ति च कालचक्रवत् ॥ ७ ॥ उनका वह हाथी रथोंपर पैर रखकर सारथि और घोड़ोंसहित उन्हें चूर-चूर कर डालता था। पैदल मनुष्योंको भी पैरोंसे ही कुचल डालता था। हाथियोंको भी दोनों पैरों तथा सूँड़से मसल देता था। इस प्रकार वह गजराज कालचक्रके समान शत्रु-सेनाका संहार करने लगा ॥ ७ ॥
नरांस्तु कार्ष्णायसवर्मभूषणान् निपात्य साश्वानपि पत्तिभिः सह । व्यपोथयद् दन्तिवरेण शुष्मिणा स शब्दवत् स्थूलनलं यथा तथा ॥ ८ ॥ वे अपने बलवान् एवं श्रेष्ठ गजराजके द्वारा लोहेके कवच तथा उत्तम आभूषण धारण करनेवाले घुड़सवारोंको घोड़ों और पैदलोंसहित पृथ्वीपर गिराकर कुचलवा देते थे। उस समय जैसे मोटे नरकुलोंके कुचले जाते समय ‘चर-चर' की आवाज होती है, उसी प्रकार उन सैनिकोंके कुचले जानेपर भी होती थी ॥ ८ ॥
अथार्जुनो ज्यातलनेमिनिःस्वने मृदङ्गभेरीबहुशङ्खनादिते । रथाश्वमातङ्गसहस्रसंकुले रथोत्तमेनाभ्यपतद् द्विपोत्तमम् ॥ ९ ॥ तदनन्तर जहाँ धनुषकी टंकार और पहियोंकी घर्घराहटका शब्द गूँज रहा था, मृदंग, भेरी और बहुसंख्यक शंखोंकी ध्वनि हो रही थी तथा जहाँ रथ, घोड़े और हाथी सहस्रोंकी संख्यामें भरे हुए थे, उस समरांगणमें पूर्वोक्त गजराजके समीप अर्जुन अपने उत्तम रथके द्वारा जा पहुँचे ॥ ९ ॥
ततोऽर्जुनं द्वादशभिः शरोत्तमै-
र्जनार्दनं षोडशभिः समर्पयत् ।
स दण्डधारस्तुरगांस्त्रिभिस्त्रिभि-
स्ततो ननाद प्रजहास चासकृत् ॥ १० ॥
तब दण्डधारने अर्जुनको बारह और भगवान् श्रीकृष्णको सोलह उत्तम बाण मारे। फिर तीन-तीन बाणोंसे उनके घोड़ोंको घायल करके वे बारंबार गर्जने और अट्टहास करने लगे ॥ १० ॥
ततोऽस्य पार्थः सगुणेषुकार्मुकं
चकर्त भल्लैर्ध्वजमप्यलंकृतम् ।
पुनर्नियन्तॄन् सह पादगोप्तृ-
स्ततः स चुक्रोध गिरिव्रजेश्वरः ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने अपने भल्लोंद्वारा प्रत्यंचा और बाणोंसहित दण्डधारके धनुष तथा सजे-सजाये ध्वजको भी काट गिराया। फिर हाथीके महावतों तथा पादरक्षकोंको भी मार डाला। इससे गिरिव्रजके स्वामी दण्डधार अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ ११ ॥
ततोऽर्जुनं भिन्नकटेन दन्तिना
घनाघनेनानिलतुल्यवर्चसा ।
अतीव चुक्षोभयिषुर्ज्नार्दनं
धनंजयं चाभिजघान तोमरैः ॥ १२ ॥
उन्होंने गण्डस्थलसे मदकी धारा बहानेवाले, वायुके समान वेगशाली, मदोन्मत्त गजराजके द्वारा अर्जुन और श्रीकृष्णको अत्यन्त घबराहटमें डालनेकी इच्छासे उसे उन दोनोंकी ओर बढ़ाया और तोमरोंसे उन दोनोंपर प्रहार किया ॥ १२ ॥
अथास्य बाहू द्विपहस्तसंनिभौ
शिरश्च पूर्णेन्दुनिभाननं त्रिभिः ।
क्षुरैः प्रचिच्छेद सहैव पाण्डव-
स्ततो द्विपं बाणशतैः समर्पयत् ॥ १३ ॥
तब अर्जुनने हाथीकी सूँड़के समान मोटी दण्डधारकी दोनों भुजाओं तथा पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले उनके मस्तकको भी तीन छुरोंसे एक साथ ही काट डाला। फिर उन्होंने उनके हाथको सौ बाण मारे ॥ १३ ॥
स पार्थबाणैस्तपनीयभूषणैः
समाचितः काञ्चनवर्मभृद् द्विपः ।
तथा चकाशे निशि पर्वतो यथा
दावाग्निना प्रज्वलितौषधिद्रुमः ॥ १४ ॥
उसके सारे शरीरमें अर्जुनके सुवर्णभूषित बाण चुभ गये थे। इससे सुवर्णमय कवच धारण करनेवाला वह हाथी उसी प्रकार शोभा पाने लगा, जैसे रात्रिमें दावानलसे जलती हुई
ओषधियों और वृक्षोंसे युक्त पर्वत प्रकाशित होता है ॥ १४ ॥ स वेदनातॉऽम्बुदनिस्वनो नदं- श्चरन् भ्रमन् प्रस्खलितान्तरोऽद्रवत् । पपात रुग्णः सनियन्तृकस्तथा यथा गिरिर्वज्रविदारितस्तथा ॥ १५ ॥ वह हाथी वेदनासे पीड़ित हो मेघके समान गर्जना करता, सब ओर विचरता, घूमता और बीच-बीचमें लड़खड़ाता हुआ भागने लगा। अधिक घायल हो जानेके कारण वह महावतोंके साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़ा; मानो वज्रद्वारा विदीर्ण किया हुआ पर्वत धराशायी हो गया हो ॥ १५ ॥ हिमावदातेन सुवर्णमालिना हिमाद्रिकूटप्रतिमेन दन्तिना । हते रणे भ्रातरि दण्ड आव्रज- ज्जिघांसुरिन्द्रावरजं धनंजयम् ॥ १६ ॥ रणभूमिमें अपने भाई दण्डधारके मारे जानेपर दण्ड श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध करनेकी इच्छासे बर्फके समान सफेद, सुवर्णमालाधारी तथा हिमालयके शिखरके समान विशालकाय गजराजके द्वारा वहाँ आ पहुँचा ॥ १६ ॥ स तोमरैरर्ककरप्रभैस्त्रिभि- र्जनार्दनं पञ्चभिरर्जुनं शितैः । समर्पयित्वा विननाद नर्दयं- स्ततोऽस्य बाहू निचकर्त पाण्डवः ॥ १७ ॥ उसने सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित होनेवाले तीन तीखे तोमरोंसे श्रीकृष्णको और पाँचसे अर्जुनको घायल करके बड़े जोरसे गर्जना की। इतनेहीमें पाण्डुपुत्र अर्जुनने उसकी दोनों बाँहें काट डालीं ॥ १७ ॥ क्षुरप्रकृत्तौ सुभृशं सतोमरौ शुभाङ्गदौ चन्दनरूषितौ भुजौ । गजात् पतन्तौ युगपद् विरेजतु- र्यथाद्रिशृङ्गाद् रुचिरौ महोरगौ ॥ १८ ॥ क्षुरसे कटी हुई, सुन्दर बाजूबन्दसे विभूषित, चन्दनचर्चित तथा तोमरसहित वे विशाल भुजाएँ हाथीसे एक साथ गिरते समय पर्वतके शिखरसे गिरनेवाले दो सुन्दर एवं बड़े-बड़े सर्पोंके समान विभूषित हुईं ॥ १८ ॥ तथार्धचन्द्रेण हतं किरीटिना पपात दण्डस्य शिरः क्षितिं द्विपात् । तच्छोणितार्द्रं निपतद् विरेजे
दिवाकरोऽस्तादिव पश्चिमां दिशम् ॥ १९ ॥
तत्पश्चात् किरीटधारी अर्जुनके चलाये हुए अर्धचन्द्रसे कटकर दण्डका मस्तक हाथीसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय खूनसे लथपथ हो गिरता हुआ वह मस्तक अस्ताचलसे पश्चिम दिशाकी ओर डूबते हुए सूर्यके समान शोभायमान हुआ ॥ १९ ॥
अथ द्विपं श्वेतवराभ्रसंनिभं
दिवाकरांशुप्रतिमैः शरोत्तमैः ।
बिभेद पार्थः स पपात नादयन्
हिमाद्रिकूटं कुलिशाहतं यथा ॥ २० ॥
इसके बाद अर्जुनने श्वेत महामेघके समान सफेद रंगवाले उस हाथीको सूर्यकी किरणोंके सदृश तेजस्वी उत्तम बाणोंद्वारा विदीर्ण कर डाला। फिर तो वह वज्रके मारे हुए हिमालयके शिखरके समान धमाकेकी आवाजके साथ धराशायी हो गया ॥ २० ॥
ततोऽपरे तत्प्रतिमा गजोत्तमा
जिगीषवः संयति सव्यसाचिना ।
तथा कृतास्ते च यथैव तौ द्विपौ
ततः प्रभग्नं सुमहद्रिपोर्बलम् ॥ २१ ॥
तदनन्तर उसीके समान जो दूसरे-दूसरे गजराज विजयकी इच्छासे युद्धके लिये आगे बढ़े, उन सबकी सव्यसाची अर्जुनने वैसी ही दशा कर डाली, जैसी कि पूर्वोक्त दोनों हाथियोंकी कर दी थी। इससे शत्रु की उस विशाल सेनामें भगदड़ मच गयी ॥ २१ ॥
गजा रथाश्वाः पुरुषाश्च संघशः
परस्परघ्नाः परिपेतुरहवे ।
परस्परं प्रस्खलिताः समाहिता
भृशं निपेतुर्बहुभाषिणो हताः ॥ २२ ॥
झुंड-के-झुंड हाथी, रथ, घोड़े और पैदल मनुष्य परस्पर आघात-प्रत्याघात करते हुए युद्धस्थलमें चारों ओरसे टूट पड़े थे। वे आपसमें एक-दूसरेकी चोटसे अत्यन्त घायल हो लड़खड़ाते और बहुत बकझक करते हुए मरकर गिर जाते थे ॥ २२ ॥
अथार्जुनं स्वे परिवार्य सैनिकाः
पुरन्दरं देवगणा इवाब्रुवन् ।
अभैष्म यस्मान्मरणादिव प्रजाः
स वीर दिष्ट्या निहतस्त्वया रिपुः ॥ २३ ॥
इसके बाद इन्द्रको घेरकर खड़े हुए देवताओंके समान अपनी ही सेनाके लोग अर्जुनको घेरकर इस प्रकार बोले—‘वीर! जैसे प्रजा मौतसे डरती है, उसी प्रकार हमलोग जिससे भयभीत हो रहे थे, उस शत्रुको आपने मार डाला; यह बड़े सौभाग्यकी बात है! ॥ २३ ॥
न चेदरक्षिष्य इमं जनं भयाद् द्विषद्भिरेवं बलिभिः प्रपीडितम् । तथा भविष्यद् विषतां प्रमोदनं यथा हतेष्वेविह नोऽरिसूदन ॥ २४ ॥ ‘शत्रुसूदन! यदि आप बलवान् शत्रुओंसे इस प्रकार पीड़ित हुए इन स्वजनोंकी भयसे रक्षा नहीं करते तो इन शत्रुओंको वैसी ही प्रसन्नता होती, जैसी इस समय इनके मारे जानेपर यहाँ हमलोगोंको हो रही है’ ॥ २४ ॥
इतीव भूयश्च सुहृद्भिरीरिता निशम्य वाचः सुमनास्ततोऽर्जुनः। यथानुरूपं प्रतिपूज्य तं जनं जगाम संशप्तकसंघहा पुनः ॥ २५ ॥ इस प्रकार अपने सुहृदोंकी कही हुई ये बातें बारंबार सुनकर अर्जुनको मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उन लोगोंका यथायोग्य आदर-सत्कार करके पुनः संशप्तकगणका वध करनेके लिये वहाँसे चल दिये ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि दण्डवधेऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें दण्डधार और दण्डका वधविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1701)
एकोनविंशोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा संशप्तक-सेनाका संहार, श्रीकृष्णका अर्जुनको युद्धस्थलका दृश्य दिखाते हुए उनके पराक्रमकी प्रशंसा करना तथा पाण्ड्यनरेशका कौरव-सेनाके साथ युद्धारम्भ
संजय उवाच
प्रत्यागत्य पुनर्जिष्णुर्जघ्ने संशप्तकान् बहून् ।
वक्रातिवक्रगमनादङ्गारक इव ग्रहः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! जैसे मंगल नामक ग्रह वक्र और अतिचार गतिसे चलकर लोकके लिये अनिष्टकारी होता है, उसी प्रकार विजयशील अर्जुनने दण्डधारकी सेनासे पुनः लौटकर बहुत-से संशप्तकोंका संहार आरम्भ कर दिया ॥ १ ॥
पार्थबाणहता राजन् नराश्वरथकुञ्जराः ।
विचेलुर्भ्रमुर्नेशुः पेतुर्मम्लुश्च भारत ॥ २ ॥
भरतवंशी नरेश! अर्जुनके बाणोंसे आहत हो हाथी, घोड़े, रथ और पैदल मनुष्य विचलित, भ्रान्त, पतित, मलिन तथा नष्ट होने लगे ॥ २ ॥
धुर्यान् धुर्यगतान् सूतान् ध्वजांश्चापासिसायकान् ।
पाणीन् पाणिगतं शस्त्रं बाहूनपि शिरांसि च ॥ ३ ॥
भल्लैः क्षुरैरर्धचन्द्रैर्वत्सदन्तैश्च पाण्डवः ।
चिच्छेदमित्रवीराणां समरे प्रतियुध्यताम् ॥ ४ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुनने भल्ल, क्षुर, अर्धचन्द्र और वत्सदन्त नामक अस्त्रोंद्वारा समरांगणमें सामना करनेवाले विपक्षी वीरोंके रथोंमें जुते हुए धुरंधर अश्वों, सारथियों, ध्वजों, धनुषों, सायकों, तलवारों, हाथों, हाथमें रखे हुए शस्त्रों, भुजाओं तथा मस्तकोंको भी काट डाला ॥ ३-४ ॥
वासितार्थे युयुत्सन्तो वृषभा वृषभं यथा ।
निपतन्त्यर्जुनं शूराः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ५ ॥
जैसे मैथुनकी वासनावाली गायके लिये युद्धकी इच्छासे बहुतेरे साँड़ किसी एक साँड़पर टूट पड़ते हों, उसी प्रकार सैकड़ों और हजारों शूरवीर अर्जुनपर धावा बोलने लगे ॥ ५ ॥
तेषां तस्य च तद् युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
त्रैलोक्यविजये यादृग् दैत्यानां सह वज्रिणा ॥ ६ ॥
उन योद्धाओं तथा अर्जुनका वह युद्ध वैसा ही रोमांचकारी था, जैसा कि त्रैलोक्य-विजयके समय वज्रधारी इन्द्रके साथ दैत्योंका हुआ था ॥ ६ ॥
तमविध्यत् त्रिभिर्बाणैर्दन्दशूकैरिवाहिभिः ।
उग्रायुधसुतस्तस्य शिरः कायादपाहरत् ॥ ७ ॥
उस समय उग्रायुधके पुत्रने अत्यन्त डँस लेनेके स्वभाववाले सर्पोंके समान तीन बाणोंद्वारा अर्जुनको बींध डाला। तब अर्जुनने उसके सिरको धड़से उतार लिया ॥ ७ ॥
तेऽर्जुनं सर्वतः क्रुद्धा नानाशस्त्रैरवीवृषन् ।
मरुद्भिः प्रेरिता मेघा हिमवन्तमिवोष्णगे ॥ ८ ॥
वे संशप्तक योद्धा कुपित हो अर्जुनपर सब ओरसे नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे, मानो वर्षाकालमें पवनप्रेरित मेघ हिमालयपर जलकी वृष्टि कर रहे हों ॥ ८ ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य द्विषतां सर्वतोऽर्जुनः ।
सम्यगस्तैः शरैः सर्वानहितानहनद् बहून् ॥ ९ ॥
अर्जुनने अपने अस्त्रोंद्वारा शत्रुओंके अस्त्रोंका सब ओरसे निवारण करके अच्छी तरह चलाये हुए बाणोंद्वारा समस्त विपक्षियोंमेंसे बहुतोंको मार डाला ॥ ९ ॥
छिन्नत्रिवेणुसंघातान् हताश्वान् पार्ष्णिसारथीन् ।
विस्रस्तहस्ततूणीरान् विचक्ररथकेतनान् ॥ १० ॥
संछिन्नरश्मियोक्त्राक्षान् व्यनुकर्षयुगान् रथान् ।
विध्वस्तसर्वसंनाहान् बाणैश्चक्रेऽर्जुनस्तदा ॥ ११ ॥
अर्जुनने उस समय अपने बाणोंद्वारा शत्रुओंके रथोंकी बड़ी बुरी दशा कर डाली। उनके त्रिवेणुसमूह काट डाले, घोड़ों और पार्श्वोंरक्षकोंको मार डाला। उन योद्धाओंके हाथोंसे खिसककर तूणीर गिर गये तथा उनके रथोंके पहिये और ध्वज भी नष्ट हो गये। घोड़ोंकी बागडोर, जोत और रथके धुरे भी काट डाले गये। उनके अनुकर्ष और जूए भी चौपट हो गये थे ॥ १०-११ ॥
ते रथास्तत्र विध्वस्ताः परार्घ्या भान्त्यनेकशः ।
धनिनामिव वेश्मानि हतान्यग्न्यनिलाम्बुभिः ॥ १२ ॥
वे बहुमूल्य और बहुसंख्यक रथ, जो वहाँ टूट-फूटकर गिरे पड़े थे, आग, हवा और पानीसे नष्ट हुए धनवानोंके घरोंके समान जान पड़ते थे ॥ १२ ॥
द्विपाः सम्भिन्नवर्माणो वज्राशनिसमैः शरैः ।
पेतुर्गिर्यग्रवेश्मानि वज्रवाताग्निभिर्यथा ॥ १३ ॥
वज्र और बिजलीके समान तेजस्वी बाणोंसे कवच विदीर्ण हो जानेके कारण हाथी वज्र, वायु तथा आगसे नष्ट हुए पर्वत-शिखरोंपर बने हुए गृहोंके समान गिर पड़ते थे ॥ १३ ॥
सारोहास्तुरगाः पेतुर्बहवोऽर्जुनताडिताः ।
निर्जिह्वान्त्राः क्षितौ क्षीणा रुधिराद्राः सुदुर्दृशः ॥ १४ ॥ अर्जुनके मारे हुए बहुसंख्यक घोड़े और घुड़सवार पृथ्वीपर क्षत-विक्षत होकर पड़े थे। उनकी जीभ तथा आँतें बाहर निकल आयी थीं। वे खूनसे लथपथ हो रहे थे। उनकी ओर देखना अत्यन्त कठिन हो गया था ॥ १४ ॥ नराश्वनागा नाराचैः संस्यूताः सव्यसाचिना । बभ्रमुश्चस्खलुः पेतुर्नेदुर्मम्लुश्च मारिष ॥ १५ ॥ मान्यवर! सव्यसाची अर्जुनके नाराचोंसे गुथे हुए हाथी, घोड़े और मनुष्य चक्कर काटते, लड़खड़ाते, गिरते, चिल्लाते और मन मारकर रह जाते थे ॥ १५ ॥ अनेकैश्च शिलाधौतैर्वज्राशनिविषोपमैः । शरैर्निजघ्निवान् पार्थो महेन्द्र इव दानवान् ॥ १६ ॥ जैसे देवराज इन्द्र दानवोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुनने शिलापर तेज किये हुए वज्र, अशनि तथा विषके तुल्य अनेक भयंकर बाणोंद्वारा उन संशप्तक वीरोंका वध कर डाला ॥ १६ ॥ महार्हवर्माभरणा नानारूपाम्बरायुधाः । सरथाः सध्वजा वीरा हताः पार्थेन शेरते ॥ १७ ॥ अर्जुनद्वारा मारे गये संशप्तक वीर बहुमूल्य कवच, आभूषण, भाँति-भाँतिके वस्त्र, आयुध, रथ और ध्वजोंसहित रणभूमिमें सो रहे थे ॥ १७ ॥ विजिताः पुण्यकर्माणो विशिष्टाभिजनश्रुताः । गताः शरीरैर्वसुधामूर्जितैः कर्मभिर्दिवम् ॥ १८ ॥ वे पुण्यात्मा, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा विशिष्ट शास्त्रज्ञानसे सम्पन्न वीर पराजित होकर अपने शरीरोंसे तो पृथ्वीपर गिरे, परंतु प्रबल उत्तम कर्मोंके द्वारा स्वर्गलोकमें जा पहुँचे ॥ १८ ॥ अथार्जुनं रथवरं त्वदीयाः समभिद्रवन् । नानाजनपदाध्यक्षाः सगणा जातमन्यवः ॥ १९ ॥ तदनन्तर आपके सैनिक रथियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनपर टूट पड़े। वे विभिन्न जनपदोंके अधिपति थे और अपने दलबलके साथ कुपित होकर चढ़ आये थे ॥ १९ ॥ उह्यमाना रथाश्वेभैः पत्तयश्च जिघांसवः । समभ्यधावन्नस्यन्तो विविधं क्षिप्रमायुधम् ॥ २० ॥ रथों, घोड़ों और हाथियोंके सवार तथा पैदल सैनिक उन्हें मार डालनेकी इच्छासे नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए शीघ्रतापूर्वक धावा बोलने लगे ॥ २० ॥ तदायुधमहावर्षं मुक्तं योधमहाम्बुदैः । व्यधमन्निशितैर्बाणैः क्षिप्रमर्जुनमारुतः ॥ २१ ॥
परंतु अर्जुनरूपी वायुने संशप्तक सैनिकरूपी महामेघोंद्वारा की हुई अस्त्र-शस्त्रोंकी उस महावृष्टिको तीखे बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ २१ ॥
साश्वपत्तिद्विपस्थं महाशस्त्रौघसम्प्लवम् । सहसा संतितीर्षन्तं पार्थं शस्त्रास्त्रसेतुना ॥ २२ ॥ अथाब्रवीद् वासुदेवः पार्थ किं क्रीडसेऽनघ । संशप्तकान् प्रमथ्यैनांस्ततः कर्णवधे त्वर ॥ २३ ॥
अर्जुन हाथी, घोड़े, रथ और पैदलसमूहोंसे युक्त तथा महान् अस्त्र-शस्त्रोंके प्रवाहसे परिपूर्ण उस सैन्य-समुद्रको अपने अस्त्र-शस्त्ररूपी पुलके द्वारा सहसा पार कर जाना चाहते थे। उस समय भगवान् श्रीकृष्णने उनसे कहा—‘निष्पाप पार्थ! यह क्या खिलवाड़ कर रहे हो? इन संशप्तकोंका संहार करके कर्णके वधका शीघ्रतापूर्वक प्रयत्न करो’ ॥ २२-२३ ॥
तथेत्युक्त्वार्जुनः कृष्णं शिष्टान् संशप्तकांस्तदा । आक्षिप्य शस्त्रेण बलाद् दैत्यानिन्द्र इवावधीत् ॥ २४ ॥
तब श्रीकृष्णसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर अर्जुन दैत्योंका वध करनेवाले इन्द्रके समान उस समय शेष संशप्तक-सेनाको अस्त्र-शस्त्रोंसे छिन्न-भिन्न करके उसका बलपूर्वक विनाश करने लगे ॥ २४ ॥
आददत् संदधन्नेषून् दृष्टः कैश्चिद् रणेऽर्जुनः । विमुञ्चन् वा शरान् शीघ्रं दृश्यन्ते वै नरा हताः ॥ २५ ॥
उस समय रणभूमिमें किसीने यह नहीं देखा कि अर्जुन कब बाण लेते, कब उनका संधान करते अथवा कब उन्हें छोड़ते हैं? केवल उनके द्वारा शीघ्रतापूर्वक मारे गये मनुष्य ही दृष्टिगोचर होते थे ॥ २५ ॥
आश्चर्यमिति गोविन्दो ब्रुवन्नश्वानचोदयत् । हंसांशुगौरास्ते सेनां हंसाः सर इवाविशन् ॥ २६ ॥
‘आश्चर्य है’ ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने घोड़ोंको आगे बढ़ाया। हंस तथा चन्द्र-किरणोंके समान श्वेतवर्णवाले वे घोड़े शत्रुसेनामें उसी प्रकार घुस गये, जैसे हंस तालाबमें प्रवेश करते हैं ॥ २६ ॥
ततः संग्रामभूमिं च वर्तमाने जनक्षये । अवेक्षमाणो गोविन्दः सव्यसाचिनमब्रवीत् ॥ २७ ॥
जब इस प्रकार जनसंहार होने लगा, उस समय रणभूमिकी ओर देखते हुए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ २७ ॥
एष पार्थ महारौद्रो वर्तते भरतक्षयः । पृथिव्यां पार्थिवानां वै दुर्योधनकृते महान् ॥ २८ ॥
‘पार्थ! दुर्योधनके कारण यह भूमण्डलके भूपालों तथा भरतवंशियोंकी सेनाका महाभयंकर एवं महान् संहार हो रहा है ॥ २८ ॥