महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1691, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिरीटमाल्याभरणोज्ज्वलानि । भल्लार्धचन्द्रक्षुरकर्तितानि प्रपेतुरुर्व्यां नृशिरांस्यजस्रम् ॥ ११ ॥ जिनके मुखकमल, सूर्य और पूर्ण चन्द्रमाके समान सुन्दर, तेजस्वी एवं मनोरम थे तथा मुकुट, माला एवं आभूषणोंसे प्रकाशित हो रहे थे, ऐसे असंख्य नरमुण्ड भल्ल, अर्द्धचन्द्र तथा क्षुर नामक बाणोंसे कट-कटकर लगातार पृथ्वीपर गिर रहे थे ॥ ११ ॥
अथ द्विपैर्देवपतिद्विपाभै- र्देवारिदर्पापहमत्युदग्रम् । कलिङ्गवङ्गाङ्गनिशादवीरा जिघांसवः पाण्डवमभ्यधावन् ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् कलिंग, अंग, वंग और निषाद देशोंके वीर देवराज इन्द्रके ऐरावत हाथीके समान विशाल गजराजोंपर सवार हो, देवद्रोहियोंका दर्प दलन करनेवाले प्रचण्ड वीर पाण्डुकुमार अर्जुनपर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे चढ़ आये ॥ १२ ॥
तेषां द्विपानां निचकर्त पार्थो वर्माणि चर्माणि करान् नियन्तॄन् । ध्वजान् पताकांश्च ततः प्रपेतु- र्वज्राहतानीव गिरेः शिरांसि ॥ १३ ॥ कुन्तीकुमार अर्जुनने उनके हाथियोंके कवच, चर्म, सूँड़, महावत, ध्वजा और पताका—सबको काट डाला। इससे वे वज्रके मारे हुए पर्वतीय शिखरोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १३ ॥
तेषु प्रभग्नेषु गुरोस्तनूजं बाणैः किरीटी नवसूर्यवर्णैः । प्रच्छादयामास महाभ्रजालै- र्वायुः समुद्यन्तमिवांशुमन्तम् ॥ १४ ॥ उनके नष्ट हो जानेपर किरीटधारी अर्जुनने प्रभातकालके सूर्यकी कान्तिके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा गुरुपुत्र अश्वत्थामाको ढक दिया, मानो वायुने उगते हुए किरणोंवाले सूर्यको मेघोंकी बड़ी भारी घटाओंसे आच्छादित कर दिया हो ॥ १४ ॥
ततोऽर्जुनेषूनिषुभिर्निरस्य द्रौणिः शितैरर्जुनवासुदेवौ । प्रच्छादयित्वा दिवि चन्द्रसूर्यौ ननाद सोऽम्भोद इवातपान्ते ॥ १५ ॥ तब द्रोणकुमार अश्वत्थामाने अपने तीखे बाणोंद्वारा अर्जुनके बाणोंका निवारण करके श्रीकृष्ण और अर्जुनको ढक दिया और आकाशमें चन्द्रमा तथा सूर्यको आच्छादित करके