भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1692

गर्जनेवाले वर्षाकालके मेघकी भाँति वह गम्भीर गर्जना करने लगा ।। १५ ।। तमर्जुनस्तांश्च पुनस्त्वदीया- नभ्यर्दितस्तैरभिसृत्य शस्त्रैः । बाणान्धकारं सहसैव कृत्वा विव्याध सर्वानिषुभिः सुपुङ्खैः ।। १६ ।। उसके बाणोंसे पीड़ित हुए अर्जुनने आगे बढ़कर सहसा शस्त्रोंद्वारा शत्रुके बाणजनित अन्धकारको नष्ट करके उत्तम पंखवाले अपने बाणोंद्वारा अश्वत्थामा तथा आपके अन्य समस्त सैनिकोंको पुनः घायल कर दिया ।। १६ ।। नाप्याददत् संदधन्नैव मुञ्चन् बाणान् रथेऽदृश्यत सव्यसाची । रथांश्च नागांस्तुरगान् पदातीन् संस्त्यूतदेहान् ददृशुर्हतांश्च ।। १७ ।। रथपर बैठे हुए सव्यसाची अर्जुन कब तरकससे बाण लेते, कब उन्हें धनुषपर रखते और कब छोड़ते हैं, यह नहीं दिखायी देता था। सब लोग यही देखते थे कि रथियों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंके शरीर उनके बाणोंसे गुँथे हुए हैं और वे प्राणशून्य हो गये हैं ।। १७ ।। संधाय नाराचवरान् दशाशु द्रौणिस्त्वरन्नेकमिवोत्ससर्ज । तेषां च पञ्चार्जुनमभ्यविध्यन् पञ्चाच्युतं निर्बिभिदुः सुपुङ्खाः ।। १८ ।। तब अश्वत्थामाने बड़ी उतावलीके साथ अपने धनुषपर दस उत्तम नाराच रखे और उन सबको एकके ही समान एक साथ छोड़ दिया। उनमेंसे पाँच सुन्दर पंखवाले नाराचोंने अर्जुनको बींध डाला और पाँचने श्रीकृष्णको क्षत-विक्षत कर दिया ।। १८ ।। तैराहतौ सर्वमनुष्यमुख्या- वसृक् स्रवन्तौ धनदेन्द्रकल्पौ । समाप्तविद्येन तथाभिभूतौ हतौ रणे ताविति मेनिरेऽन्ये ।। १९ ।। उन बाणोंसे आहत होकर सम्पूर्ण मनुष्योंमें श्रेष्ठ, कुबेर और इन्द्रके समान पराक्रमी वे दोनों वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने अंगोंसे रक्त बहाने लगे। जिसकी विद्या पूरी हो चुकी थी, उस अश्वत्थामाके द्वारा इस प्रकार पराभवको प्राप्त हुए उन दोनोंको अन्य सब लोगोंने यही समझा कि 'वे रणभूमिमें मारे गये' ।। १९ ।। अथार्जुनं प्राह दशार्हनाथः प्रमाद्यसे किं जहि योधमेतम् ।