महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1693, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुर्याद्धि दोषं समुपेक्षितोऽयं कष्टो भवेद् व्याधिरिवाक्रियावान् ॥ २० ॥ तब दशार्हवंशके स्वामी श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—‘पार्थ! तुम क्यों प्रमाद कर रहे हो? इस योद्धाको मार डालो। इसकी उपेक्षा की जायगी तो यह और भी नये-नये अपराध करेगा और जिसकी चिकित्सा न की गयी हो, उस रोगके समान अधिक कष्टदायक हो जायगा’ ॥
तथेति चोक्त्वाच्युतमप्रमादी द्रौणिं प्रयत्नादिषुभिस्ततक्ष । भुजौ वरौ चन्दनसारदिग्धौ वक्षः शिरोऽथाप्रतिमौ तथोरू ॥ २१ ॥ ‘बहुत अच्छा, ऐसा ही करूँगा’ श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर सतत सावधान रहनेवाले अर्जुन अपने बाणोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक अश्वत्थामाको—उसके चन्दनसारचर्चित श्रेष्ठ भुजाओं, वक्षःस्थल, सिर और अनुपम जाँघोंको क्षत-विक्षत करने लगे ॥ २१ ॥
गाण्डीवमुक्तैः कुपितोऽविकर्णै- र्द्रौणिं शरैः संयति निर्बिभेद । छित्त्वा तु रश्मींस्तुरगानविध्यत् ते तं रणाद्दूरमतीव दूरम् ॥ २२ ॥ क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए भेड़के कान-जैसे अग्रभागवाले बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें द्रोणपुत्रको विदीर्ण कर डाला। घोड़ोंकी बागडोर काटकर उन्हें अत्यन्त घायल कर दिया। इससे वे घोड़े अश्वत्थामाको रणभूमिसे बहुत दूर भगा ले गये ॥ २२ ॥
स तैर्हृतो वातजवैस्तुरङ्गै- र्द्रौणिर्दृढं पार्थशराभिभूतः । इयेष नावृत्य पुनस्तु योद्धुं पार्थेन सार्धं मतिमान् विमृश्य । जानञ्जयं नियतं वृष्णिवीरे धनंजये चाङ्गिरसां वरिष्ठः ॥ २३ ॥ अश्वत्थामा अर्जुनके बाणोंसे बहुत पीड़ित हो गया था। जब वायुके समान वेगशाली घोड़े उसे रणभूमिसे बहुत दूर हटा ले गये, तब उस बुद्धिमान् वीरने मन-ही-मन विचार करके पुनः लौटकर अर्जुनके साथ युद्ध करनेकी इच्छा त्याग दी। अंगिरा गोत्रवाले ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ अश्वत्थामा यह जान गया था कि वृष्णिवीर श्रीकृष्ण और अर्जुनकी विजय निश्चित है ॥ २३ ॥
नियम्य स हयान् द्रौणिः समाश्वास्य च मारिष । रथाश्वनरसम्बाधं कर्णस्य प्राविशद् बलम् ॥ २४ ॥