महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1733, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसारथिं नवभिर्बाणैर्माद्रियस्य समर्पयत् ॥ १६ ॥ राजन्! इसके बाद दुःशासनने रणभूमिमें पाण्डुकुमार सहदेवको घायल करके उन माद्रीकुमारके सारथिको भी नौ बाण मारे ॥ १६ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज सहदेवः प्रतापवान् । समाधत्त शरं घोरं मृत्युकालान्तकोपमम् ॥ १७ ॥ महाराज! इससे कुपित होकर प्रतापी सहदेवने अपने धनुषपर मृत्यु, काल और यमराजके समान भयंकर बाण रखा ॥ १७ ॥
विकृष्य बलवच्चापं तव पुत्राय सोऽसृजत् । स तं निर्भिद्य वेगेन भित्त्वा च कवचं महत् ॥ १८ ॥ प्राविशद् धरणीं राजन् वल्मीकमिव पन्नगः । ततः सम्मुमुहे राजंस्तव पुत्रो महारथः ॥ १९ ॥ फिर उस धनुषको बलपूर्वक खींचकर उसने आपके पुत्रपर वह बाण छोड़ दिया। राजन्! वह बाण दुःशासनको तथा उसके विशाल कवचको भी वेगपूर्वक विदीर्ण करके बाँबीमें घुसनेवाले सर्पके समान धरतीमें समा गया। महाराज! इससे आपका महारथी पुत्र मूर्च्छित हो गया ॥ १८-१९ ॥
मूढं चैनं समालोक्य सारथिस्त्वरितो रथम् । अपोवाह भृशं त्रस्तो वध्यमानः शितैः शरैः ॥ २० ॥ उसे मूर्च्छित देख उसका सारथि तीखे बाणोंकी मार खाकर अत्यन्त भयभीत हो तुरंत ही रथको रणभूमिसे दूर हटा ले गया ॥ २० ॥
पराजित्य रणे तं तु कौरव्यं पाण्डुनन्दनः । दुर्योधनबलं दृष्ट्वा प्रममाथ समन्ततः ॥ २१ ॥ कुरुवंशी दुःशासनको रणभूमिमें पराजित करके पाण्डुनन्दन सहदेवने दुर्योधनकी सेनाको वहाँ उपस्थित देख उसे सब ओरसे मथ डाला ॥ २१ ॥
पिपीलिकपुटं राजन् यथा मृद्नन्नरो रुषा । तथा सा कौरवी सेना मृदिता तेन भारत ॥ २२ ॥ भरतवंशी नरेश! जैसे मनुष्य रोषमें आकर चींटियोंके दलको मसल डालता है, उसी प्रकार सहदेवने उस कौरव-सेनाको धूलमें मिला दिया ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि सहदेवदुःशासनयुद्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें सहदेव और दुःशासनका युद्धविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥