महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सारथिं नवभिर्बाणैर्माद्रियस्य समर्पयत् ॥ १६ ॥ राजन्! इसके बाद दुःशासनने रणभूमिमें पाण्डुकुमार सहदेवको घायल करके उन माद्रीकुमारके सारथिको भी नौ बाण मारे ॥ १६ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज सहदेवः प्रतापवान् । समाधत्त शरं घोरं मृत्युकालान्तकोपमम् ॥ १७ ॥ महाराज! इससे कुपित होकर प्रतापी सहदेवने अपने धनुषपर मृत्यु, काल और यमराजके समान भयंकर बाण रखा ॥ १७ ॥
विकृष्य बलवच्चापं तव पुत्राय सोऽसृजत् । स तं निर्भिद्य वेगेन भित्त्वा च कवचं महत् ॥ १८ ॥ प्राविशद् धरणीं राजन् वल्मीकमिव पन्नगः । ततः सम्मुमुहे राजंस्तव पुत्रो महारथः ॥ १९ ॥ फिर उस धनुषको बलपूर्वक खींचकर उसने आपके पुत्रपर वह बाण छोड़ दिया। राजन्! वह बाण दुःशासनको तथा उसके विशाल कवचको भी वेगपूर्वक विदीर्ण करके बाँबीमें घुसनेवाले सर्पके समान धरतीमें समा गया। महाराज! इससे आपका महारथी पुत्र मूर्च्छित हो गया ॥ १८-१९ ॥
मूढं चैनं समालोक्य सारथिस्त्वरितो रथम् । अपोवाह भृशं त्रस्तो वध्यमानः शितैः शरैः ॥ २० ॥ उसे मूर्च्छित देख उसका सारथि तीखे बाणोंकी मार खाकर अत्यन्त भयभीत हो तुरंत ही रथको रणभूमिसे दूर हटा ले गया ॥ २० ॥
पराजित्य रणे तं तु कौरव्यं पाण्डुनन्दनः । दुर्योधनबलं दृष्ट्वा प्रममाथ समन्ततः ॥ २१ ॥ कुरुवंशी दुःशासनको रणभूमिमें पराजित करके पाण्डुनन्दन सहदेवने दुर्योधनकी सेनाको वहाँ उपस्थित देख उसे सब ओरसे मथ डाला ॥ २१ ॥
पिपीलिकपुटं राजन् यथा मृद्नन्नरो रुषा । तथा सा कौरवी सेना मृदिता तेन भारत ॥ २२ ॥ भरतवंशी नरेश! जैसे मनुष्य रोषमें आकर चींटियोंके दलको मसल डालता है, उसी प्रकार सहदेवने उस कौरव-सेनाको धूलमें मिला दिया ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि सहदेवदुःशासनयुद्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें सहदेव और दुःशासनका युद्धविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1734)
चतुर्विंशोऽध्यायः
नकुल और कर्णका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा नकुलकी पराजय और पांचाल-सेनाका संहार
संजय उवाच
नकुलं रभसं युद्धे द्रावयन्तं वरूथिनीम् ।
कर्णो वैकर्तनो राजन् वारयामास वै रुषा ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! युद्धस्थलमें कौरव-सेनाको खदेड़ते हुए वेगशाली वीर नकुलको वैकर्तन कर्णने रोषपूर्वक रोका ॥ १ ॥
नकुलस्तु ततः कर्णं प्रहसन्निदमब्रवीत् ।
चिरस्य बत दृष्टोऽहं दैवतैः सौम्यचक्षुषा ॥ २ ॥
पश्य मां त्वं रणे पाप चक्षुर्विषयमागतम् ।
त्वं हि मूलमनर्थानां वैरस्य कलहस्य च ॥ ३ ॥
त्वद्दोषात् कुरवः क्षीणाः समासाद्य परस्परम् ।
त्वामद्य समरे हत्वा कृतकृत्योऽस्मि विज्वरः ॥ ४ ॥
तब नकुलने कर्णसे हँसते हुए इस प्रकार कहा—'आज दीर्घकालके पश्चात् देवताओंने मुझे सौम्य दृष्टिसे देखा है; यह बड़े हर्षकी बात है। पापी कर्ण! मैं रणभूमिमें तेरी आँखोंके सामने आ गया हूँ। तू अच्छी तरह मुझे देख ले। तू ही इन सारे अनर्थोंकी तथा वैर एवं कलहकी जड़ है। तेरे ही दोषसे कौरव आपसमें लड़-भिड़कर क्षीण हो गये। आज मैं तुझे समरभूमिमें मारकर कृतकृत्य एवं निश्चिन्त हो जाऊँगा' ॥ २—४ ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच नकुलं सूतनन्दनः ।
सदृशं राजपुत्रस्य धन्विनश्च विशेषतः ॥ ५ ॥
प्रहरस्व च मे वीर पश्यामस्तव पौरुषम् ।
कर्म कृत्वा रणे शूर ततः कत्थितुमर्हसि ॥ ६ ॥
नकुलके ऐसा कहनेपर सूतनन्दन कर्णने उनसे कहा—'वीर! तुम एक राजपुत्रके विशेषतः धनुर्धर योद्धाके योग्य कार्य करते हुए मुझपर प्रहार करो। हम तुम्हारा पुरुषार्थ देखेंगे। शूर! पहले रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करके फिर उसके विषयमें तुम्हें बढ़-बढ़कर बातें बनानी चाहिये ॥ ५-६ ॥
अनुक्त्वा समरे तात शूरा युध्यन्ति शक्तितः ।
प्रयुध्यस्व मया शक्त्या हनिष्ये दर्पमेव ते ॥ ७ ॥
'तात! शूरवीर समरांगणमें बातें न बनाकर अपनी शक्तिके अनुसार युद्ध करते हैं। तुम पूरी शक्ति लगाकर मेरे साथ युद्ध करो। मैं तुम्हारा घमंड चूर कर दूँगा' ॥ ७ ॥
इत्युक्त्वा प्राहरत् तूर्णं पाण्डुपुत्राय सूतजः ।
विव्याध चैनं समरे त्रिसप्तत्या शिलीमुखैः ॥ ८ ॥
ऐसा कहकर सूतपुत्र कर्णने पाण्डुकुमार नकुलपर तुरंत ही प्रहार किया। उन्हें युद्धस्थलमें तिहत्तर बाणोंसे बींध डाला ॥ ८ ॥
नकुलस्तु ततो विद्धः सूतपुत्रेण भारत ।
अशीत्याशीविषप्रख्यैः सूतपुत्रमविध्यत ॥ ९ ॥
भारत! सूतपुत्रके द्वारा घायल होकर नकुलने उसे भी विषधर सर्पोंके समान अस्सी बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ९ ॥
तस्य कर्णो धनुश्छित्त्वा स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ।
त्रिंशता परमेष्वासः शरैः पाण्डवमर्दयत् ॥ १० ॥
तब महाधनुर्धर कर्णने शिलापर तेज किये हुए स्वर्णमय पंखवाले बाणोंसे नकुलके धनुषको काटकर उन्हें तीस बाणोंसे पीड़ित कर दिया ॥ १० ॥
ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ।
आशीविषा यथा नागा भित्त्वा गां सलिलं पपुः ॥ ११ ॥
जैसे विषधर नाग धरती फोड़कर जल पी लेते हैं, उसी प्रकार उन बाणोंने नकुलका कवच छिन्न-भिन्न करके युद्धस्थलमें उनका रक्त पी लिया ॥ ११ ॥
अथान्यद् धनुरादाय हेमपृष्ठं दुरासदम् ।
कर्णं विव्याध सप्तत्या सारथिं च त्रिभिः शरैः ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् नकुलने सोनेकी पीठवाला दूसरा दुर्जय धनुष हाथमें लेकर कर्णको सत्तर और उसके सारथिको तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १२ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज नकुलः परवीरहा ।
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन कर्णस्य धनुरच्छिनत् ॥ १३ ॥
महाराज! इसके बाद शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले नकुलने कुपित होकर एक अत्यन्त तीखे क्षुरप्रसे कर्णका धनुष काट दिया ॥ १३ ॥
अथैनं छिन्नधन्वानं सायकानां शतैस्त्रिभिः ।
आजघ्ने प्रहसन् वीरः सर्वलोकमहारथम् ॥ १४ ॥
धनुष कट जानेपर सम्पूर्ण लोकोंके विख्यात महारथी कर्णको वीर नकुलने हँसते-हँसते तीन सौ बाण मारे ॥ १४ ॥
कर्णमभ्यर्दितं दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रेण मारिष ।
विस्मयं परमं जग्मू रथिनः सह दैवतैः ॥ १५ ॥
मान्यवर! पाण्डुपुत्र नकुलके द्वारा कर्णको इस तरह पीड़ित हुआ देख देवताओंसहित सम्पूर्ण रथियोंको महान् आश्चर्य हुआ ॥ १५ ॥
अथान्यद् धनुरादाय कर्णो वैकर्तनस्तदा । नकुलं पञ्चभिर्बाणैर्जत्रुदेशे समर्पयत् ॥ १६ ॥
तब वैकर्तन कर्णने दूसरा धनुष लेकर नकुलके गलेकी हँसलीपर पाँच बाण मारे ॥ १६ ॥
तत्रस्थैरथ तैर्बाणैर्माद्रीपुत्रो व्यरोचत । स्वरश्मिभिरिवादित्यो भुवने विसृजन् प्रभाम् ॥ १७ ॥
वहाँ धँसे हुए उन बाणोंसे माद्रीकुमार नकुल उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे सम्पूर्ण जगत्में प्रभा बिखेरनेवाले भगवान् सूर्य अपनी किरणोंसे प्रकाशित होते हैं ॥ १७ ॥
नकुलस्तु ततः कर्णं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । अथास्य धनुषः कोटिं पुनश्चिच्छेद मारिष ॥ १८ ॥
माननीय नरेश! तदनन्तर नकुलने कर्णको सात बाणोंसे घायल करके उसके धनुषका एक कोना पुनः काट डाला ॥ १८ ॥
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय समरे वेगवत्तरम् । नकुलस्य ततो बाणैः सर्वतोऽवारयद् दिशः ॥ १९ ॥
तब कर्णने समरांगणमें दूसरा अत्यन्त वेगशाली धनुष लेकर नकुलके चारों ओर सम्पूर्ण दिशाओंको बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १९ ॥
संछाद्यमानः सहसा कर्णचापच्युतैः शरैः । चिच्छेद स शरांस्तूर्णं शरैरेव महारथः ॥ २० ॥
कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा सहसा आच्छादित होते हुए महारथी नकुलने तुरंत ही उसके बाणोंको अपने बाणोंद्वारा ही काट गिराया ॥ २० ॥
ततो बाणमयं जालं विततं व्योम्नि दृश्यते । खद्योतानामिव व्रातैः सम्पतद्भिर्र्यथा नभः ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् आकाशमें बाणोंका जाल-सा बिछा हुआ दिखायी देने लगा, मानो वहाँ जुगनुओंके समूह उड़ रहे हों ॥ २१ ॥
तैर्विमुक्तैः शरशतैश्छादितं गगनं तदा । शलभानां यथा व्रातैस्तद्वदासीद् विशाम्पते ॥ २२ ॥
प्रजानाथ! उस समय धनुषसे छूटे हुए सौ-सौ बाणोंद्वारा आच्छादित हुआ आकाश पतंगोंके समूहसे भरा हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ २२ ॥
ते शरा हेमविकृताः सम्पतन्तो मुहुर्मुहुः । श्रेणीकृता व्यकाशन्त क्रौञ्चाः श्रेणीकृता इव ॥ २३ ॥
बारंबार गिरते हुए वे सुवर्णभूषित बाण श्रेणिवद्ध होकर ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो बहुत-से क्रौंचपक्षी एक पंक्तिमें होकर उड़ रहे हों ।। २३ ।। बाणजालावृते व्योम्नि च्छादिते च दिवाकरे । न स्म सम्पतते भूम्यां किंचिदप्यन्तरिक्षगम् ।। २४ ।। बाणोंके जालसे आकाश और सूर्यके ढक जानेपर अन्तरिक्षकी कोई भी वस्तु उस समय पृथ्वीपर नहीं गिरती थी ।। २४ ।। निरुद्धे तत्र मार्गे च शरसंघैः समन्ततः । व्यरोचेतां महात्मानौ कालसूर्याविवोदितौ ।। २५ ।। बाणोंके समूहसे वहाँ सब ओरका मार्ग अवरुद्ध हो जानेपर वे दोनों महामनस्वी वीर नकुल और कर्ण प्रलयकालमें उदित हुए दो सूर्योंके समान प्रकाशित हो रहे थे ।। २५ ।। कर्णचापच्युतैर्बाणैर्वध्यमानास्तु सोमकाः । अवालीयन्त राजेन्द्र वेदनार्ता भृशार्दिताः ।। २६ ।। राजेन्द्र! कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाणोंकी मार खाकर सोमक-योद्धा वेदनासे कराह उठे और अत्यन्त पीड़ित हो इधर-उधर छिपने लगे ।। २६ ।। नकुलस्य तथा बाणैर्हन्यमाना चमूस्तव । व्यशीर्यत दिशो राजन् वातनुन्ना इवाम्बुदाः ।। २७ ।। राजन्! नकुलके बाणोंसे मारी जाती हुई आपकी सेना भी हवासे उड़ाये गये बादलोंके समान सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखर गयी ।। २७ ।। ते सेने हन्यमाने तु ताभ्यां दिव्यैर्महाशरैः । शरपातमपाक्रम्य तस्थतुः प्रेक्षिके तदा ।। २८ ।। उन दोनोंके दिव्य महाबाणोंद्वारा आहत होती हुई दोनों सेनाएँ उस समय उनके बाणोंके गिरनेके स्थानसे दूर हटकर खड़ी हो गयीं और दर्शक बनकर तमाशा देखने लगीं ।। २८ ।। प्रोत्सारितजने तस्मिन् कर्णपाण्डवयोः शरैः । अविध्येतां महात्मानावन्योन्यं शरवृष्टिभिः ।। २९ ।। कर्ण और नकुलके बाणोंद्वारा जब सब लोग वहाँसे दूर हटा दिये गये, तब वे दोनों महामनस्वी वीर अपने बाणोंकी वर्षासे एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे ।। २९ ।। विदर्शयन्तौ दिव्यानि शस्त्राणि रणमूर्धनि । छादयन्तौ च सहसा परस्परवधैषिणौ ।। ३० ।। युद्धके मुहानेपर वे दोनों दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंका प्रदर्शन करते हुए एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे सहसा बाणोंद्वारा आच्छादित करने लगे ।। ३० ।। नकुलेन शरा मुक्ताः कङ्कबर्हिणवाससः । सूतपुत्रमवच्छाद्य व्यतिष्ठन्त यथाम्बरे ।। ३१ ।। तथैव सूतपुत्रेण प्रेषिताः परमाहवे ।
पाण्डुपुत्रमवच्छाद्य व्यतिष्ठन्ताम्बरे शराः ॥ ३२ ॥
नकुलके बाणोंमें कंक और मयूरके पंख लगे हुए थे। वे उनके धनुषसे छूटकर सूतपुत्रको आच्छादित करके जिस प्रकार आकाशमें स्थित होते थे, उसी प्रकार उस महासमरमें सूतपुत्रके चलाये हुए बाण पाण्डुकुमार नकुलको आच्छादित करके आकाशमें छा जाते थे ॥ ३१-३२ ॥
शरवेश्मप्रविष्टौ तौ ददृशाते न कैश्चन ।
सूर्य्याचन्द्रमसौ राजञ्छाद्यमानौ घनैख्रिव ॥ ३३ ॥
राजन्! जैसे मेघोंद्वारा ढक जानेपर सूर्य और चन्द्रमा दिखायी नहीं देते, उसी प्रकार बाणनिर्मित भवनमें प्रविष्ट हुए उन दोनों वीरोंपर किसीकी दृष्टि नहीं पड़ती थी ॥ ३३ ॥
ततः क्रुद्धो रणे कर्णः कृत्वा घोरतरं वपुः ।
पाण्डवं छादयामास समन्ताच्छरवृष्टिभिः ॥ ३४ ॥
तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए कर्णने रणभूमिमें अत्यन्त भयंकर स्वरूप प्रकट करके चारों ओरसे बाणोंकी वर्षाद्वारा पाण्डुपुत्र नकुलको ढक दिया ॥ ३४ ॥
सोऽतिच्छन्नो महाराज सूतपुत्रेण पाण्डवः ।
न चकार व्यथां राजन् भास्करो जलदैर्यथा ॥ ३५ ॥
महाराज! सूतपुत्रके द्वारा अत्यन्त आच्छन्न कर दिये जानेपर भी बादलोंसे ढके हुए सूर्यके समान नकुलने अपने मनमें तनिक भी व्यथाका अनुभव नहीं किया ॥ ३५ ॥
ततः प्रहस्याधिरथिः शरजालानि मारिष ।
प्रेषयामास समरे शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३६ ॥
मान्यवर! तत्पश्चात् सूतपुत्रने बड़े जोरसे हँसकर पुनः समरांगणमें बाणोंके जाल बिछा दिये। उसने सैकड़ों और हजारों बाण चलाये ॥ ३६ ॥
एकच्छायमभूत् सर्वं तस्य बाणैर्महात्मनः ।
अभ्रच्छायेव संजज्ञे सम्पतद्भिः शरोत्तमैः ॥ ३७ ॥
उस महामनस्वी वीरके गिरते हुए उत्तम बाणोंसे घिर जानेके कारण वहाँ सब कुछ एकमात्र अन्धकारमें निमग्न हो गया। ठीक उसी तरह जैसे बादलोंकी घोर घटा घिर आनेपर सब ओर अँधेरा छा जाता है ॥ ३७ ॥
ततः कर्णो महाराज धनुश्छित्त्वा महात्मनः ।
सारथिं पातयामास रथनीडाद्धसन्निव ॥ ३८ ॥
महाराज! तदनन्तर हँसते हुए-से कर्णने महामना नकुलका धनुष काटकर उनके सारथिको रथकी बैठकसे मार गिराया ॥ ३८ ॥
ततोऽश्वांश्चतुरश्चास्य चतुर्भिर्निशितैः शरैः ।
यमस्य भवनं तूर्णं प्रेषयामास भारत ॥ ३९ ॥
भारत! फिर चार तीखे बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको भी तुरंत ही यमराजके घर भेज दिया ॥ ३९ ॥ अथास्य तं रथं दिव्यं तिलशो व्यधमच्छरैः । पताकां चक्ररक्षांश्च गदां खड्गं च मारिष ॥ ४० ॥ शतचन्द्रं च तच्चर्म सर्वोपकरणानि च । मान्यवर! इसके बाद उसने अपने बाणोंद्वारा नकुलके उस दिव्य रथको तिल-तिल करके काट दिया और पताका, चक्ररक्षकों, गदा एवं खड्गको भी छिन्न-भिन्न कर दिया। साथ ही सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे सुशोभित उनकी ढाल तथा अन्य सब उपकरणोंको भी उसने नष्ट कर दिया ॥ ४० १/२ ॥ हताश्वो विरथश्चैव विवर्मा च विशाम्पते ॥ ४१ ॥ अवतीर्य रथात्तूर्णं परिघं गृह्य धिष्ठितः । प्रजापालक नरेश! घोड़े, रथ और कवचके नष्ट हो जानेपर नकुल तुरंत उस रथसे उतरकर हाथमें परिघ लिये खड़े हो गये ॥ ४१ १/२ ॥ तमुद्यतं महाघोरं परिघं तस्य सूतजः ॥ ४२ ॥ व्यहनत् सायकै राजन् सुतीक्ष्णैर्भारसाधनैः । राजन्! उनके उठे हुए उस महाभयंकर परिघको सूतपुत्रने अत्यन्त तीखे तथा दुष्कर कार्यको सिद्ध करनेवाले बाणोंद्वारा काट डाला ॥ ४२ १/२ ॥ व्यायुधं चैनमालक्ष्य शरैः संनतपर्वभिः ॥ ४३ ॥ आर्पयद् बहुभिः कर्णो न चैनं समपीडयत् । उन्हें अस्त्र-शस्त्रोंसे हीन देखकर कर्णने झुकी हुई गाँठवाले बहुसंख्यक बाणोंद्वारा और भी घायल कर दिया; परंतु उन्हें घातक पीड़ा नहीं दी ॥ ४३ १/२ ॥ स हन्यमानः समरे कृतास्त्रेण बलीयसा ॥ ४४ ॥ प्राद्रवत् सहसा राजन् नकुलो व्याकुलेन्द्रियः । अत्यन्त बलवान् तथा अस्त्रविद्याके विद्वान् कर्णके द्वारा समरांगणमें आहत हो सहसा नकुल भाग चले। उस समय उनकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो रही थीं ॥ ४४ १/२ ॥ तमभिद्रुत्य राधेयः प्रहसन् वै पुनः पुनः ॥ ४५ ॥ सज्यमस्य धनुः कण्ठे व्यवासृजत भारत । भारत! राधापुत्र कर्णने बारंबार हँसते हुए उनका पीछा करके उनके गलेमें प्रत्यंचासहित अपना धनुष डाल दिया ॥ ४५ १/२ ॥ ततः स शुशुभे राजन् कण्ठासक्तमहाधनुः ॥ ४६ ॥ परिवेषमनुप्राप्तो यथा स्याद् व्योम्नि चन्द्रमाः । यथैव चासितो मेघः शक्रचापेन शोभितः ॥ ४७ ॥
राजन्! कण्ठमें पड़े हुए उस महाधनुषसे युक्त नकुल ऐसी शोभा पाने लगे, मानो आकाशमें चन्द्रमापर घेरा पड़ गया हो अथवा कोई श्याम मेघ इन्द्रधनुषसे सुशोभित हो रहा हो ॥ ४६-४७ ॥
तमब्रवीत्ततः कर्णो व्यर्थं व्याहृतवानसि । वदेदानीं पुनर्दृष्टो वध्यमानः पुनः पुनः ॥ ४८ ॥ मा योत्सीः कुरुभिः सार्धं बलवद्भिश्च पाण्डव । सदृशैस्तात युध्यस्व व्रीडां मा कुरु पाण्डव ॥ ४९ ॥ गृहं वा गच्छ माद्रेय यत्र वा कृष्णफाल्गुनौ । एवमुक्त्वा महाराज व्यसर्जयत तं तदा ॥ ५० ॥
उस समय कर्णने नकुलसे कहा—'पाण्डुकुमार! तुमने व्यर्थ ही बढ़-चढ़कर बातें बनायी थीं। अब इस समय बारंबार मेरे बाणोंकी मार खाकर पुनः उसी हर्षके साथ तुम वैसी ही बातें करो तो सही। बलवान् कौरव-योद्धाओंके साथ आजसे युद्ध न करना। तात! जो तुम्हारे समान हों, उन्हींके साथ युद्ध किया करो। माद्रीकुमार! लज्जित न होओ। इच्छा हो तो घर चले जाओ अथवा जहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन हों, वहीं भाग जाओ।' महाराज! ऐसा कहकर उस समय कर्णने नकुलको छोड़ दिया ॥ ४८—५० ॥
वधप्राप्तं तु तं शूरो नाहनद् धर्मवित्तदा । स्मृत्वा कुन्त्या वचो राजंस्तत एनं व्यसर्जयत् ॥ ५१ ॥
राजन्! यद्यपि नकुल वधके योग्य अवस्थामें आ पहुँचे थे, तो भी कुन्तीको दिये हुए वचनको याद करके धर्मज्ञ वीर कर्णने उस समय उन्हें मारा नहीं, जीवित छोड़ दिया ॥ ५१ ॥
विसृष्टः पाण्डवो राजन् सूतपुत्रेण धन्विना । व्रीडन्निव जगामाथ युधिष्ठिररथं प्रति ॥ ५२ ॥
नरेश्वर! धनुर्धर सूतपुत्रके छोड़ देनेपर पाण्डुकुमार नकुल लजाते हुए-से वहाँसे युधिष्ठिरके रथके पास चले गये ॥ ५२ ॥
आरुरोह रथं चापि सूतपुत्रप्रतापितः । निःश्वसन् दुःखसंतप्तः कुम्भस्थ इव पन्नगः ॥ ५३ ॥
सूतपुत्रके द्वारा सताये हुए नकुल दुःखसे संतप्त हो घड़ेमें बंद किये हुए सर्पके समान दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए युधिष्ठिरके रथपर चढ़ गये ॥ ५३ ॥
तं विजित्याथ कर्णोऽपि पञ्चालांस्त्वरितो ययौ । रथेनातिपताकेन चन्द्रवर्णहयेन च ॥ ५४ ॥
इस प्रकार नकुलको पराजित करके कर्ण भी चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाले घोड़ों और ऊँची पताकाओंसे युक्त रथके द्वारा तुरंत ही पांचालोंकी ओर चला गया ॥ ५४ ॥
तत्राक्रन्दो महानासीत् पाण्डवानां विशाम्पते ।
दृष्ट्वा सेनापतिं यान्तं पञ्चालानां रथव्रजान् ॥ ५५ ॥ प्रजानाथ! कौरव-सेनापति कर्णको पांचाल रथियोंकी ओर जाते देख पाण्डव-सैनिकोंमें महान् कोलाहल मच गया ॥ ५५ ॥
तत्राकरोन्महाराज कदनं सूतनन्दनः । मध्यं प्राप्ते दिनकरे चक्रवद् विचरन् प्रभुः ॥ ५६ ॥ महाराज! दोपहर होते-होते शक्तिशाली सूतनन्दन कर्णने चक्रके समान चारों ओर विचरण करते हुए वहाँ पाण्डव-सैनिकोंका महान् संहार मचा दिया ॥ ५६ ॥
भग्नचक्रै रथैः कांश्चिच्छिन्नध्वजपताकिभिः । हताश्वैर्हतसूतैश्च भग्नाक्षैश्चैव मारिष ॥ ५७ ॥ ह्रियमाणानपश्याम पञ्चालानां रथव्रजान् । माननीय नरेश! उस समय हमलोगोंने कितने ही रथियोंको ऐसी अवस्थामें देखा कि उनके रथके पहिये टूट गये हैं, ध्वजा, पताकाएँ छिन्न-भिन्न हो गयी हैं, घोड़े और सारथि मारे गये हैं और उन रथोंके धुरे भी खण्डित हो गये हैं। उस अवस्थामें समूह-के-समूह पांचाल महारथी हमें भागते दिखायी दिये ॥ ५७ १/२ ॥
तत्र तत्र च सम्भ्रान्ता विचेरुर्मत्तकुञ्जराः ॥ ५८ ॥ दावाग्निपरिदग्धाङ्गा यथैव स्युर्महावने । बहुत-से मतवाले हाथी वहाँ बड़ी घबराहटमें पड़कर इधर-उधर चक्कर काट रहे थे, मानो किसी बड़े भारी जंगलमें दावानलसे उनके सारे अंग झुलस गये हों ॥ ५८ १/२ ॥
भिन्नकुम्भाद्रुधिराश्छिन्नहस्ताश्च वारणाः ॥ ५९ ॥ छिन्नगात्रावराश्चैव छिन्नवालधयोऽपरे । छिन्नाभ्राणीव सम्पेतुर्हन्यमाना महात्मना ॥ ६० ॥ कितने ही हाथियोंके कुम्भस्थल फट गये थे और वे खूनसे भींग गये थे। कितनोंकी सूँड़ें कट गयी थीं, कितनोंके कवच छिन्न-भिन्न हो गये थे, बहुतोंकी पूँछें कट गयी थीं और कितने ही हाथी महामना कर्णकी मार खाकर खण्डित हुए मेघोंके समान पृथ्वीपर गिर गये थे ॥ ५९-६० ॥
अपरे त्रासिता नागा नाराचशरतोमरैः । तमेवाभिमुखं जग्मुः शलभा इव पावकम् ॥ ६१ ॥ दूसरे बहुत-से गजराज कर्णके नाराचों, शरों और तोमरोंसे संत्रस्त हो जैसे पतंगे आगमें कूद पड़ते हैं, उसी प्रकार कर्णके सम्मुख चले जाते थे ॥ ६१ ॥
अपरे निष्टनन्तश्च व्यदृश्यन्त महाद्विपाः । क्षरन्तः शोणितं गात्रैर्नगा इव जलस्रवाः ॥ ६२ ॥ अन्य बहुत-से बड़े-बड़े हाथी झरने बहानेवाले पर्वतोंके समान अपने अंगोंसे रक्तकी धारा बहाते और आर्तनाद करते दिखायी देते थे ॥ ६२ ॥
उरश्छदैर्वियुक्तांश्च वालबन्धैश्च वाजिनः । राजतैश्च तथा कांस्यैः सौवर्णैश्चैव भूषणैः ।। ६३ ।। हीनांश्चाभरणैश्चैव खलीनैश्च विवर्जितान् । चामरैश्च कुथाभिश्च तूणीरैः पतितैरपि ।। ६४ ।। निहतैः सादिभिश्चैव शूरैराहवशोभितैः । अपश्याम रणे तत्र भ्राम्यमाणान् हयोत्तमान् ।। ६५ ।। कितने ही घोड़ोंके उनकी छातीको छिपानेवाले कवच कटकर गिर गये थे, बालाबन्ध छिन्न-भिन्न हो गये थे, सोने, चाँदी और कांस्यके आभूषण नष्ट हो गये थे, दूसरे साज-बाज भी चौपट हो गये थे, उनके मुखोंसे लगाम भी निकल गये थे, चँवर, झूल और तरकस धराशायी हो गये थे तथा संग्रामभूमिमें शोभा पानेवाले उनके शूरवीर सवार भी मारे जा चुके थे। ऐसी दशामें रणभूमिमें भ्रान्त होकर भटकते हुए बहुत-से उत्तम घोड़ोंको हमने देखा था ।। ६३—६५ ।।
प्रासैः खड्गैश्च रहितानृष्टिभिश्चापि भारत । हयसादीनपश्याम कञ्चुकोष्णीषधारिणः ।। ६६ ।। निहतान् वध्यमानांश्च वेपमानांश्च भारत । नानाङ्गावयवहीनांस्तत्र तत्रैव भारत ।। ६७ ।। भारत! कवच और पगड़ी धारण करनेवाले कितने ही घुड़सवारोंको हमने प्रास, खड्ग और ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे रहित होकर मारा गया देखा। कितने ही कर्णके बाणोंकी मार खाते हुए थरथर काँप रहे थे और बहुत-से अपने शरीरके विभिन्न अवयवोंसे रहित हो यत्र-तत्र मरे पड़े थे ।। ६६-६७ ।।
रथान् हेमपरिष्कारान् संयुक्ताञ्जवनैर्हयैः । भ्राम्यमाणानपश्याम हतेषु रथिषु द्रुतम् ।। ६८ ।। वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए कितने ही सुवर्णभूषित रथ सारथि और रथियोंके मारे जानेसे वेगपूर्वक दौड़ते दिखायी देते थे ।। ६८ ।।
भग्नाक्षकूबरान् कांश्चिद् भग्नचक्रांश्च भारत । विपताकध्वजांश्चान्याञ्छिन्नेषादण्डबन्धुरान् ।। ६९ ।। भरतनन्दन! कितने ही रथोंके धुरे और कूबर टूट गये थे, पहिये टूक-टूक हो गये थे, पताका और ध्वज खण्डित हो गये थे तथा ईषादण्ड और बन्धुरोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे ।। ६९ ।।
विहतान् रथिनस्तत्र धावमानांस्ततस्ततः । सूतपुत्रशरैस्तीक्ष्णैर्हन्यमानान् विशाम्पते ।। ७० ।। विशस्त्रांश्च तथैवान्यान् सशस्त्रांश्च हतान् बहून् ।
प्रजानाथ! सूतपुत्रके तीखे बाणोंसे हताहत होकर बहुतेरे रथी वहाँ इधर-उधर भागते देखे गये। कितने ही रथी शस्त्रहीन होकर तथा दूसरे बहुत-से सशस्त्र रहकर ही मारे गये थे ।। ७० १/२ ।।
तारकाजालसंछन्नान् वरघण्टाविशोभितान् ।। ७१ ।।
नानावर्णविचित्राभिः पताकाभिरलंकृतान् ।
वारणाननुपश्याम धावमानान् समन्ततः ।। ७२ ।।
नक्षत्रसमूहोंके चिह्नवाले कवचोंसे आच्छादित, उत्तम घंटोंसे सुशोभित तथा अनेक रंगकी विचित्र ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत हाथियोंको हमने चारों ओर भागते देखा था ।।
शिरांसि बाहूनूरूंश्च च्छिन्नानन्यंस्तथैव च ।
कर्णचापच्युतैर्बाणैरपश्याम समन्ततः ।। ७३ ।।
हमने यह भी देखा कि कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा योद्धाओंके मस्तक, भुजाएँ और जाँघें कट-कटकर चारों ओर गिर रही हैं ।। ७३ ।।
महान् व्यतिकरो रौद्रो योधानामन्वपद्यत ।
कर्णसायकनुन्नानां युध्यतां च शितैः शरैः ।। ७४ ।।
कर्णके बाणोंसे आहत हो तीखे बाणोंसे युद्ध करते हुए योद्धाओंमें वहाँ अत्यन्त भयंकर और महान् संग्राम मच गया था ।। ७४ ।।
ते वध्यमानाः समरे सूतपुत्रेण सृञ्जयाः ।
तमेवाभिमुखं यान्ति पतङ्गा इव पावकम् ।। ७५ ।।
समरांगणमें सृंजयोंपर कर्णके बाणोंकी मार पड़ रही थी, तो भी पतंगे जैसे अग्निपर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार वे कर्णके ही सम्मुख बढ़ते जा रहे थे ।। ७५ ।।
तं दहन्तमनीकानि तत्र तत्र महारथम् ।
क्षत्रिया वर्जयामासुर्युगान्ताग्निमिवोल्बणम् ।। ७६ ।।
महारथी कर्ण प्रलयकालके प्रचण्ड अग्निके समान जहाँ-तहाँ पाण्डव-सेनाओंको दग्ध कर रहा था। उस समय क्षत्रिय लोग उसे छोड़कर दूर हट जाते थे ।। ७६ ।।
हतशेषास्तु ये वीराः पञ्चालानां महारथाः ।
तान् प्रभग्नान् द्रुतान् वीरः पृष्ठतो विकिरञ्छरैः ।। ७७ ।।
अभ्यधावत तेजस्वी विशीर्णकवचध्वजान् ।
तापयामास तान् बाणैः सूतपुत्रो महाबलः ।
मध्यंदिनमनुप्राप्तो भूतानीव तमोनुदः ।। ७८ ।।
पांचालोंके जो वीर महारथी मरनेसे बच गये थे, उन्हें भागते देख तेजस्वी वीर कर्ण पीछेसे उनपर बाणोंकी वर्षा करता हुआ उनकी ओर दौड़ा। उन योद्धाओंके कवच और ध्वज छिन्न-भिन्न हो गये थे। जैसे मध्याह्नकालका सूर्य सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनी
किरणोंद्वारा तपाता है, उसी प्रकार महाबली सूतपुत्र अपने बाणोंसे उन शत्रुसैनिकोंको संतप्त करने लगा ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णयुद्धे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णका युद्धविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1745)
पञ्चविंशोऽध्यायः
युयुत्सु और उलूकका युद्ध, युयुत्सुका पलायन, शतानीक और धृतराष्ट्रपुत्र श्रुतकर्माका तथा सुतसोम और शकुनिका घोर युद्ध एवं शकुनिद्वारा पाण्डव-सेनाका विनाश
संजय उवाच
युयुत्सुं तव पुत्रस्य द्रावयन्तं बलं महत् ।
उलूको न्यपतत्तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! दूसरी ओर युयुत्सु आपके पुत्रकी विशाल सेनाको खदेड़ रहा था। यह देख उलूक तुरंत वहाँ आ धमका और युयुत्सुसे बोला—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ १ ॥
युयुत्सुश्च ततो राजन् शितधारेण पत्रिणा ।
उलूकं ताडयामास वज्रेणेन्द्र इवाचलम् ॥ २ ॥
राजन्! तब युयुत्सुने तीखी धारवाले बाणसे महाबली उलूकको उसी प्रकार पीट दिया, जैसे इन्द्र पर्वतपर वज्रका प्रहार करते हैं ॥ २ ॥
उलूकस्तु ततः क्रुद्धस्तव पुत्रस्य संयुगे ।
क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा ताडयामास कर्णिना ॥ ३ ॥
इससे उलूकको बड़ा क्रोध हुआ। उसने युद्धस्थलमें एक क्षुरप्रके द्वारा आपके पुत्रका धनुष काटकर उसपर कर्णी नामक बाणका प्रहार किया ॥ ३ ॥
तदपास्य धनुश्छिन्नं युयुत्सुर्वेगवत्तरम् ।
अन्यदादत्त सुमहच्चापं संरक्तलोचनः ॥ ४ ॥
युयुत्सुने उस कटे हुए धनुषको फेंककर क्रोधसे आँखें लाल करके दूसरा अत्यन्त वेगशाली एवं विशाल धनुष हाथमें लिया ॥ ४ ॥
शाकुनिं तु ततः षष्ट्या विव्याध भरतर्षभ ।
सारथिं त्रिभिरानर्च्छत्तं च भूयो व्यविध्यत ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! उसने शकुनिपुत्र उलूकको साठ बाणोंसे बेध दिया और तीन बाणोंसे उसके सारथिको पीड़ित किया। तत्पश्चात् उसे और भी घायल कर दिया ॥ ५ ॥
उलूकस्तं तु विंशत्या विद्ध्वा स्वर्णविभूषितैः ।
अथास्य समरे क्रुद्धो ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ॥ ६ ॥
तब उलूकने संग्रामभूमिमें कुपित हो स्वर्णभूषित बीस बाणोंसे युयुत्सुको घायल करके उनके सुवर्णमय ध्वजको भी काट डाला ॥ ६ ॥ सच्छिन्नयष्टिः सुमहान् शीर्यमाणो महाध्वजः । पपात प्रमुखे राजन् युयुत्सोः काञ्चनध्वजः ॥ ७ ॥ राजन्! ध्वजका दण्ड कट जानेपर युयुत्सुका वह विशाल कांचनध्वज छिन्न-भिन्न हो उसके सामने ही गिर पड़ा ॥ ७ ॥ ध्वजमुन्मथितं दृष्ट्वा युयुत्सुः क्रोधमूर्च्छितः । उलूकं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे ॥ ८ ॥ अपने ध्वजका यह विध्वंस देखकर युयुत्सु क्रोधसे मूर्च्छित-सा हो गया और उसने पाँच बाणोंसे उलूककी छाती छेद डाली ॥ ८ ॥ उलूकस्तस्य समरे तैलधौतेन मारिष । शिरश्छिच्छेद भल्लेन यन्तुर्भरतसत्तम ॥ ९ ॥ माननीय भरतभूषण! उलूकने तेलसे साफ किये हुए भल्लके द्वारा युयुत्सुके सारथिका मस्तक काट डाला ॥ तच्छिन्नमपतद् भूमौ युयुत्सोः सारथेस्तदा । तारारूपं यथा चित्रं निपपात महीतले ॥ १० ॥ उस समय युयुत्सुके सारथिका वह कटा हुआ मस्तक पृथ्वीपर उसी भाँति गिरा, मानो आकाशसे भूत़लपर कोई विचित्र तारा टूट पड़ा हो ॥ १० ॥ जघान चतुरोऽश्वांश्च तं च विव्याध पञ्चभिः । सोऽतिविद्धो बलवता प्रत्यपायाद् रथान्तरम् ॥ ११ ॥ तत्पश्चात् उलूकने युयुत्सुके चारों घोड़ोंको भी मार डाला और पाँच बाणोंसे उसे भी घायल कर दिया। उस बलवान् वीरके द्वारा अत्यन्त घायल हो युयुत्सु दूसरे रथपर आरूढ़ हो वहाँसे भाग गया ॥ ११ ॥ तं निर्जित्य रणे राजन्नुलूकस्त्वरितो ययौ । पञ्चालान् सृञ्जयांश्चैव विनिघ्नन् निशितैः शरैः ॥ १२ ॥ राजन्! रणभूमिमें युयुत्सुको पराजित करके उलूक तुरंत ही पांचालों और सृंजयोंकी ओर चला गया और उन्हें तीखे बाणोंसे मारने लगा ॥ १२ ॥ शतानीकं महाराज श्रुतकर्मा सुतस्तव । व्यश्वसूतरथं चक्रे निमेषार्धादसम्भ्रमः ॥ १३ ॥ महाराज! दूसरी ओर आपके पुत्र श्रुतकर्माने बिना किसी घबराहटके आधे निमेषमें ही शतानीकके रथको घोड़ों और सारथिसे शून्य कर दिया ॥ १३ ॥ हताश्वे तु रथे तिष्ठन् शतानीको महारथः । गदां चिक्षेप संक्रुद्धस्तव पुत्रस्य मारिष ॥ १४ ॥
मान्यवर! महारथी शतानीकने कुपित होकर अपने अश्वहीन रथपर खड़े रहकर ही
आपके पुत्रके ऊपर गदाका प्रहार किया ॥ १४ ॥
सा कृत्वा स्यन्दनं भस्म हयांश्चैव ससारथीन् ।
पपात धरणीं तूर्णं दारयन्तीव भारत ॥ १५ ॥
भारत! वह गदा तुरंत ही श्रुतकर्मके रथ, घोड़ों और सारथिको भस्म करके पृथ्वीको
विदीर्ण करती हुई-सी गिर पड़ी ॥ १५ ॥
तावुभौ विरथौ वीरौ कुरूणां कीर्तिवर्धनौ ।
व्यपाक्रमेतां युद्धात्तु प्रेक्षमाणौ परस्परम् ॥ १६ ॥
कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले वे दोनों वीर रथहीन हो एक-दूसरेको देखते हुए
युद्धस्थलसे हट गये ॥ १६ ॥
पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तो विवित्सो रथमारुहत् ।
शतानीकोऽपि त्वरितः प्रतिविन्ध्यरथं गतः ॥ १७ ॥
आपका पुत्र श्रुतकर्मा घबरा गया था। वह विवित्सुके रथपर जा चढ़ा और शतानीक
भी तुरंत ही प्रतिविन्ध्यके रथपर चला गया ॥ १७ ॥
सुतसोमं तु शकुनिर्विद्ध्वा तु निशितैः शरैः ।
नाकम्पयत संक्रुद्धो वार्योघ इव पर्वतम् ॥ १८ ॥
दूसरी ओर शकुनि अत्यन्त कुपित हो अपने तीखे बाणोंसे सुतसोमको घायल करके
भी उसे विचलित न कर सका। ठीक उसी तरह जैसे जलका प्रवाह पर्वतको नहीं हिला
सकता ॥ १८ ॥
सुतसोमस्तु तं दृष्ट्वा पितुरत्यन्तवैरिणम् ।
शरैरनेकसाहस्रैश्छादयामास भारत ॥ १९ ॥
भरतनन्दन! सुतसोमने अपने पिताके अत्यन्त वैरी शकुनिको सामने देखकर उसे कई
हजार बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १९ ॥
ताञ्शराञ्शकुनिस्तूर्णं चिच्छेदान्यैः पतत्रिभिः ।
लघ्वस्त्रश्चित्रयोधी च जितकाशी च संयुगे ॥ २० ॥
निवार्य समरे चापि शरांस्तान् निशितैः शरैः ।
आजघान सुसंक्रुद्धः सुतसोमं त्रिभिः शरैः ॥ २१ ॥
परंतु शकुनिने तुरंत ही दूसरे बाणोंद्वारा सुतसोमके बाणोंको काट डाला। वह
शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाला, विचित्र युद्धमें कुशल और युद्धस्थलमें विजयश्रीसे
सुशोभित होनेवाला था। उसने समरांगणमें अपने तीखे बाणोंसे सुतसोमके बाणोंका
निवारण करके अत्यन्त कुपित हो तीन बाणोंद्वारा सुतसोमको भी घायल कर
दिया ॥ २०-२१ ॥
तस्याश्वान् केतनं सूतं तिलशो व्यधमच्छरैः ।
स्यालस्तव महाराज तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ॥ २२ ॥
महाराज! आपके सालेने सुतसोमके घोड़ोंको तथा ध्वज और सारथिको भी अपने बाणोंसे तिल-तिल करके काट डाला; इससे सब लोग हर्षसूचक कोलाहल करने लगे ॥ २२ ॥
हताश्वो विरथश्चैव छिन्नकेतुश्च मारिष ।
धन्वी धनुर्वरं गृह्य रथाद् भूमावतिष्ठत ॥ २३ ॥
मान्यवर! घोड़े, रथ और ध्वजके नष्ट हो जानेपर धनुर्धर सुतसोम अपने हाथमें श्रेष्ठ धनुष लिये रथसे उतरकर धरतीपर खड़ा हो गया ॥ २३ ॥
व्यसृजत् सायकांश्चैव स्वर्णपुङ्खान् शिलाशितान् ।
छादयामास समरे तव स्यालस्य तं रथम् ॥ २४ ॥
फिर उसने शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले बहुत-से बाण छोड़े। उन बाणोंद्वारा समरभूमिमें उसने आपके सालेके रथको ढक दिया ॥ २४ ॥
शलभानामिव व्राताञ्शरव्रातान् महारथः ।
रथोपगान् समीक्ष्यैवं विव्यथे नैव सौबलः ॥ २५ ॥
प्रममाथ शरांस्तस्य शरव्रातैर्महायशाः ।
उसके बाणसमूह टिड्डीदलोंके समान जान पड़ते थे। उन्हें अपने रथके समीप देखकर भी महारथी सुबलपुत्र शकुनिके मनमें तनिक भी व्यथा नहीं हुई। उस महायशस्वी वीरने अपने बाणसमूहोंद्वारा सुतसोमके सारे बाणोंको पूर्णतया मथ डाला ॥ २५ १/२ ॥
तत्रातुष्यन्त योधाश्च सिद्धाश्चापि दिवि स्थिताः ॥ २६ ॥
सुतसोमस्य तत् कर्म दृष्ट्वा श्रद्धेयमद्भुतम् ।
रथस्थं शकुनिं यस्तु पदातिः समयोधयत् ॥ २७ ॥
सुतसोम जो वहाँ पैदल होकर भी रथपर बैठे हुए शकुनिके साथ युद्ध कर रहा था। उसके इस अविश्वसनीय और अद्भुत कर्मको देखकर वहाँ खड़े हुए समस्त योद्धा तथा आकाशमें स्थित हुए सिद्धगण भी बहुत संतुष्ट हुए ॥ २६-२७ ॥
तस्य तीक्ष्णैर्महावेगैर्भल्लैः संनतपर्वभिः ।
व्यहनत् कार्मुकं राजंस्तूणीरांश्चैव सर्वशः ॥ २८ ॥
राजन्! उस समय शकुनिने अत्यन्त वेगशाली और झुकी हुई गाँठवाले तीखे भल्लोंद्वारा सुतसोमके धनुष, तरकस तथा अन्य सब उपकरणोंको भी नष्ट कर दिया ॥ २८ ॥
स छिन्नधन्वा विरथः खड्गमुद्यम्य चानदत् ।
वैदूर्योत्पलवर्णाभं दन्तिदन्तमयत्सरुम् ॥ २९ ॥
रथ तो नष्ट हो ही चुका था, जब धनुष भी कट गया, तब सुतसोमने वैदूर्यमणि तथा नील कमलके समान श्याम रंगवाले, हाथीके दाँतकी बनी हुई मूठसे युक्त खड्गको ऊपर उठाकर बड़े जोरसे गर्जना की ॥ २९ ॥
भ्राम्यमाणं ततस्तं तु विमलाम्बरवर्चसम् । कालदण्डोपमं मेने सुतसोमस्य धीमतः ॥ ३० ॥ बुद्धिमान् सुतसोमके उस निर्मल आकाशके समान कान्तिवाले खड्गको घुमाया जाता देख शकुनिने उसे अपने लिये कालदण्डके समान माना ॥ ३० ॥ सोऽचरत् सहसा खड्गी मण्डलानि समन्ततः । चतुर्दश महाराज शिक्षाबलसमन्वितः ॥ ३१ ॥ महाराज! सुतसोम शिक्षा और बल दोनोंसे सम्पन्न था, वह खड्ग लेकर सहसा उसके चौदह मण्डल (पैंतरे) दिखाता हुआ रणभूमिमें सब ओर विचरने लगा ॥ ३१ ॥ भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं सृतम् । सम्पातसमुदीर्णे च दर्शयामास संयुगे ॥ ३२ ॥ उसने युद्धस्थलमें भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, प्लुत, सृत, सम्पात और समुदीर्ण आदि गतियोंको दिखाया ॥ ३२ ॥ सौबलस्तु ततस्तस्य शरांश्चिक्षेप वीर्यवान् । तानापतत एवाशु चिच्छेद परमासिना ॥ ३३ ॥ तब पराक्रमी सुबलपुत्रने सुतसोमपर बहुत-से बाण चलाये; परंतु उसने अपने उत्तम खड्गसे निकट आते ही उन सब बाणोंको काट गिराया ॥ ३३ ॥ ततः क्रुद्धो महाराज सौबलः परवीरहा । प्राहिणोत् सुतसोमाय शरानाशीविषोपमान् ॥ ३४ ॥ महाराज! इससे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुबलपुत्र शकुनिको बड़ा क्रोध हुआ। उसने सुतसोमपर विषधर सर्पोंके समान बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३४ ॥ चिच्छेद तांस्तु खड्गेन शिक्षया च बलेन च । दर्शयँल्लाघवं युद्धे तार्क्ष्यतुल्यपराक्रमः ॥ ३५ ॥ परंतु गरुड़के तुल्य पराक्रमी सुतसोमने अपनी शिक्षा और बलके अनुसार युद्धमें फुर्ती दिखाते हुए खड्गसे उन सब बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ३५ ॥ तस्य संचरतो राजन् मण्डलावर्तने तदा । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन खड्गं चिच्छेद सुप्रभम् ॥ ३६ ॥ राजन्! सुतसोम जब अपनी चमकीली तलवारको मण्डलाकार घुमा रहा था, उसी समय शकुनिने तीखे क्षुरप्रसे उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ३६ ॥ स छिन्नः सहसा भूमौ निपपात महानसिः । अर्धमस्य स्थितं हस्ते सुत्सारोस्तत्र भारत ॥ ३७ ॥ वह महान् खड्ग कटकर सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। भारत! सुन्दर मूठवाले उस खड्गका आधा भाग सुतसोमके हाथमें ही रह गया ॥ ३७ ॥ छिन्नमाज्ञाय निस्त्रिंशमवप्लुत्य पदानि षट् ।
प्राविध्यत ततः शेषं सुतसोमो महारथः ॥ ३८ ॥
अपने उस खड्गको कटा हुआ जान महारथी सुतसोमने छः पग ऊँचे उछलकर उसके शेष भागको ही शकुनिपर दे मारा ॥ ३८ ॥
तच्छित्त्वा सगुणं चापं रणे तस्य महात्मनः ।
पपात धरणीं तूर्णं स्वर्णवज्रविभूषितम् ॥ ३९ ॥
वह स्वर्ण और हीरेसे विभूषित कटा हुआ खड्ग रणभूमिमें महामना शकुनिके धनुषको प्रत्यंचासहित काटकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३९ ॥
सुतसोमस्ततोऽगच्छच्छ्रुतकीर्तेर्महारथम् ।
सौबलोऽपि धनुर्गृह्य घोरमन्यत् सुदुर्जयम् ॥ ४० ॥
अभ्ययात् पाण्डवानीकं निघ्नञ्शत्रुगणान् बहून् ।
तत्पश्चात् सुतसोम श्रुतकीर्तिके विशाल रथपर चढ़ गया। उधर शकुनि भी दूसरा अत्यन्त दुर्जय एवं भयंकर धनुष लेकर बहुत-से शत्रुओंका संहार करता हुआ पाण्डव-सेनाकी ओर चल दिया ॥ ४० १/२ ॥
तत्र नादो महानासीत् पाण्डवानां विशाम्पते ॥ ४१ ॥
सौबलं समरे दृष्ट्वा विचरन्तमभीतवत् ।
प्रजानाथ! सुबलपुत्र शकुनिको समरभूमिमें निर्भयसे विचरते देख पाण्डव-दलमें महान् सिंहनाद होने लगा ॥ ४१ १/२ ॥
तान्यनीकानि दृप्तानि शस्त्रवन्ति महान्ति च ॥ ४२ ॥
द्राव्यमाणान्यदृश्यन्त सौबलेन महात्मना ।
महामना शकुनिने घमंडमें भरे हुए उन शस्त्रसम्पन्न महान् सैनिकोंको भगा दिया। यह सब हमने अपनी आँखों देखा ॥ ४२ १/२ ॥
यथा दैत्यचमूं राजन् देवराजो ममर्द ह ।
तथैव पाण्डवीं सेनां सौबलेयो व्यनाशयत् ॥ ४३ ॥
राजन्! जिस प्रकार देवराज इन्द्रने दैत्योंकी सेनाको कुचल दिया था, उसी प्रकार सुबलपुत्र शकुनिने पाण्डव-सेनाका विनाश कर डाला ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि सुतसोमसौबलयुद्धे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें सुतसोम और शकुनिका युद्धविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1751)
षड्विंशोऽध्यायः
कृपाचार्यसे धृष्टद्युम्नका भय तथा कृतवर्माके द्वारा शिखण्डीकी पराजय
संजय उवाच
धृष्टद्युम्नं कृपो राजन् वारयामास संयुगे ।
यथा दृष्ट्वा वने सिंहं शरभो वारयेद् युधि ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! कृपाचार्यने धृष्टद्युम्नको आक्रमण करते देख युद्धभूमिमें उसी प्रकार उन्हें आगे बढ़नेसे रोका, जैसे वनमें शरभ* सिंहको रोक देता है ॥
निरुद्धः पार्षतस्तेन गौतमेन बलीयसा ।
पदात् पदं विचलितुं नाशकत्तत्र भारत ॥ २ ॥
भारत! अत्यन्त बलवान् गौतमगोत्रीय कृपाचार्यसे अवरुद्ध होकर धृष्टद्युम्न एक पग भी चलनेमें समर्थ न हो सका ॥ २ ॥
गौतमस्य रथं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नरथं प्रति ।
वित्रेसुः सर्वभूतानि क्षयं प्राप्तं च मेनिरे ॥ ३ ॥
कृपाचार्यके रथको धृष्टद्युम्नके रथकी ओर जाते देख समस्त प्राणी भयसे थर्रा उठे और धृष्टद्युम्नको नष्ट हुआ ही मानने लगे ॥ ३ ॥
तत्रावोचन् विमनसो रथिनः सादिनस्तथा ।
द्रोणस्य निधनान्नूनं संक्रुद्धो द्विपदां वरः ॥ ४ ॥
शारद्वतो महातेजा दिव्यास्त्रविदुदारधीः ।
अपि स्वस्ति भवेदद्य धृष्टद्युम्नस्य गौतमात् ॥ ५ ॥
वहाँ सभी रथी और घुड़सवार उदास होकर कहने लगे कि ‘निश्चय ही द्रोणाचार्यके मारे जानेसे दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता, उदारबुद्धि, महातेजस्वी, नरश्रेष्ठ, शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य अत्यन्त कुपित हो उठे होंगे। क्या आज कृपाचार्यसे धृष्टद्युम्न कुशलपूर्वक सुरक्षित रह सकेंगे? ॥ ४-५ ॥
अपीयं वाहिनी कृत्स्ना मुच्येत महतो भयात् ।
अप्ययं ब्राह्मणः सर्वान् न नो हन्यात् समागतान् ॥ ६ ॥
‘क्या यह सारी सेना महान् भयसे मुक्त हो सकती है? कहीं ऐसा न हो कि ये ब्राह्मण देवता यहाँ आये हुए हम सब लोगोंका वध कर डालें? ॥ ६ ॥
यादृशं दृश्यते रूपमन्तकप्रतिमं भृशम् ।
गमिष्यत्यद्य पदवीं भारद्वाजस्य गौतमः ॥ ७ ॥
‘इनका यमराजके समान जैसा अत्यन्त भयंकर रूप दिखायी देता है, उससे जान पड़ता है, आज कृपाचार्य भी द्रोणाचार्यके पथपर ही चलेंगे ॥ ७ ॥ आचार्यः क्षिप्रहस्तश्च विजयी च सदा युधि । अस्त्रवान् वीर्यसम्पन्नः क्रोधेन च समन्वितः ॥ ८ ॥ ‘कृपाचार्य शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले तथा युद्धमें सर्वथा विजय प्राप्त करनेवाले हैं। वे अस्त्रवेत्ता, पराक्रमी और क्रोधसे युक्त हैं ॥ ८ ॥ पार्षतश्च महायुद्धे विमुखोऽद्याभिलक्ष्यते । इत्येवं विविधा वाचस्तावकानां परैः सह ॥ ९ ॥ व्यश्रूयन्त महाराज तयोस्तत्र समागमे । ‘आज इस महायुद्धमें धृष्टद्युम्न विमुख होता दिखायी देता है।’ महाराज! इस प्रकार वहाँ धृष्टद्युम्न और कृपाचार्यका समागम होनेपर आपके सैनिकोंकी शत्रुओंके साथ होनेवाली नाना प्रकारकी बातें सुनायी देने लगीं ॥ ९ १/२ ॥ विनिःश्वस्य ततः क्रोधात् कृपः शारद्वतो नृप ॥ १० ॥ पार्षतं चार्दयामास निश्चेष्टं सर्वमर्मसु । नरेश्वर! तदनन्तर शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने क्रोधसे लंबी साँस खींचकर निश्चेष्ट खड़े हुए धृष्टद्युम्नके सम्पूर्ण मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १० १/२ ॥ स हन्यमानः समरे गौतमेन महात्मना ॥ ११ ॥ कर्तव्यं न स्म जानाति मोहेन महताऽऽवृतः । समरांगणमें महामना कृपाचार्यके द्वारा आहत होनेपर भी धृष्टद्युम्नको कोई कर्तव्य नहीं सूझता था। वे महान् मोहसे आच्छन्न हो गये ॥ ११ १/२ ॥ तमब्रवीत्ततो यन्ता कच्चित् क्षेमं तु पार्षत ॥ १२ ॥ ईदृशं व्यसनं युद्धे न ते दृष्टं मया क्वचित् । तब उनके सारथिने उनसे कहा—‘द्रुपदनन्दन! कुशल तो है न? युद्धमें आपपर कभी ऐसा संकट आया हो, यह मैंने नहीं देखा है ॥ १२ १/२ ॥ दैवयोगात्तु ते बाणा नापतन् मर्मभेदिनः ॥ १३ ॥ प्रेषिता द्विजमुख्येन मर्माण्युद्दिश्य सर्वतः । ‘द्विजश्रेष्ठ कृपाचार्यने सब ओरसे आपके मर्मस्थानोंको लक्ष्य करके बाण चलाये थे; परंतु दैवयोगसे ही वे मर्मभेदी बाण आपके मर्मस्थानोंपर नहीं पड़े हैं ॥ १३ १/२ ॥ व्यावर्तये रथं तूर्णं नदीवेगमिवार्णवात् ॥ १४ ॥ अवध्यं ब्राह्मणं मन्ये येन ते विक्रमो हतः ।