भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1765, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1765

हताश्वात्तु रथात्तस्मादवप्लुत्य सुतस्तव ॥ ७ ॥ उत्तमं व्यसनं प्राप्तो भूमावेवावतिष्ठत । उस अश्वहीन रथसे कूदकर आपका पुत्र भारी संकटमें पड़नेपर भी वहाँ पृथ्वीपर ही खड़ा रहा (युद्ध छोड़कर भागा नहीं) ॥ ७ १/२ ॥

तं तु कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा कर्णद्रौणिकृपादयः ॥ ८ ॥ अभ्यवर्तन्त सहसा परीप्सन्तो नराधिपम् । उसे संकटमें पड़ा देख कर्ण, अश्वत्थामा तथा कृपाचार्य आदि वीर अपने राजाकी रक्षा चाहते हुए सहसा युधिष्ठिरके सामने आ पहुँचे ॥ ८ १/२ ॥

अथ पाण्डुसुताः सर्वे परिवार्य युधिष्ठिरम् ॥ ९ ॥ अन्वयुः समरे राजंस्ततो युद्धमवर्तत । राजन्! तत्पश्चात् समस्त पाण्डव भी युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर उनका अनुसरण करने लगे; फिर तो दोनों दलोंमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ ९ १/२ ॥

ततस्तूर्यसहस्राणि प्रावाद्यन्त महामृधे ॥ १० ॥ ततः किलकिलाशब्दाः प्रादुरासन् महीपते । भूपाल! तदनन्तर उस महासमरमें सहस्रों बाजे बजने लगे और वहाँ किलकिलाहटकी आवाज गूँज उठी ॥ १० १/२ ॥

यत्राभ्यगच्छन् समरे पञ्चालाः कौरवैः सह ॥ ११ ॥ नरा नरैः समाजग्मुर्वारणा वरवारणैः । रथाश्च रथिभिः सार्धं हयाश्च हयसादिभिः ॥ १२ ॥ उस युद्धमें समस्त पांचाल कौरवोंके साथ भिड़ गये। पैदल पैदलोंके, हाथी हाथियोंके, रथी रथियोंके और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ११-१२ ॥

द्वन्द्वान्यासन् महाराज प्रेक्षणीयानि संयुगे । विविधान्यप्यचिन्त्यानि शस्त्रवन्त्युत्तमानि च ॥ १३ ॥ महाराज! उस रणभूमिमें होनेवाले नाना प्रकारके अचिन्तनीय, शस्त्रयुक्त तथा उत्तम द्वन्द्वयुद्ध देखने ही योग्य थे ॥ १३ ॥

ते शूराः समरे सर्वे चित्रं लघु च सुष्ठु च । अयुध्यन्त महावेगाः परस्परवधैषिणः ॥ १४ ॥ वे महान् वेगशाली समस्त शूरवीर समरांगणमें एक-दूसरेके वधकी इच्छासे विचित्र, शीघ्रतापूर्ण तथा सुन्दर रीतिसे युद्ध करने लगे ॥ १४ ॥

अन्योन्यं समरे जघ्नुर्योधव्रतमनुष्ठिताः । न हि ते समरं चक्रुः पृष्ठतो वै कथञ्चन ॥ १५ ॥ वे वीर योद्धाके व्रतका पालन करते हुए युद्धस्थलमें एक-दूसरेको मारते थे। उन्होंने किसी तरह भी युद्धमें पीठ नहीं दिखायी ॥ १५ ॥

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व · पृष्ठ 1765, कुल 3237 में से · BharatKosha