भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1766, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1766

मुहूर्तमेव तद् युद्धमासीन्मधुरदर्शनम् । तत उन्मत्तवद् राजन् निर्मर्यादमवर्तत ॥ १६ ॥ राजन्! दो ही घड़ीतक वह युद्ध देखनेमें मधुर जान पड़ा। फिर तो वहाँ उन्मत्तके समान मर्यादाशून्य बर्ताव होने लगा ॥ १६ ॥ रथी नागं समासाद्य दारयन् निशितैः शरैः । प्रेषयामास कालाय शरैः संनतपर्वभिः ॥ १७ ॥ रथी हाथीका सामना करके झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंद्वारा उसे विदीर्ण करते हुए कालके गालमें भेजने लगे ॥ १७ ॥ नागा हयान् समासाद्य विक्षिपन्तो बहून् रणे । दारयामासुरत्युग्रं तत्र तत्र तदा तदा ॥ १८ ॥ हाथी बहुत-से घोड़ोंको पकड़-पकड़कर रणभूमिमें इधर-उधर फेंकने और विदीर्ण करने लगे। उससे वहाँ उस समय बड़ा भयंकर दृश्य उपस्थित हो गया ॥ १८ ॥ हयारोहाश्च बहवः परिवार्य गजोत्तमान् । तलशब्दरवांश्चक्रुः सम्पतन्तस्ततस्ततः ॥ १९ ॥ धावमानांस्ततस्तांस्तु द्रवमाणान् महागजान् । पार्श्वतः पृष्ठतश्चैव निजघ्नुर्ह्ययसादिनः ॥ २० ॥ बहुत-से घुड़सवार उत्तम गजराजोंको चारों ओरसे घेरकर इधर-उधर दौड़ने और ताली पीटने लगे। इससे जब वे विशालकाय हाथी दौड़ने और भागने लगते, तब वे घुड़सवार अगल-बगलसे और पीछेकी ओरसे उनपर बाणोंकी चोट करते थे ॥ १९-२० ॥ विद्राव्य च बहूनश्वान् नागा राजन् मदोत्कटाः । विषाणैश्चापरे जघ्नुर्ममृदुश्चापरे भृशम् ॥ २१ ॥ राजन्! कितने ही मदोन्मत्त हाथी भी बहुत-से घोड़ोंको खदेड़कर उन्हें दाँतोंसे दबाकर मार डालते अथवा वेगपूर्वक पैरोंसे कुचल डालते थे ॥ २१ ॥ साश्वारोहांश्च तुरगान् विषाणैर्विव्यधू रुषा । अपरे चिक्षिपुर्वेगात् प्रगृह्यातिबलास्तदा ॥ २२ ॥ कितने ही हाथियोंने रोषमें भरकर सवारोंसहित घोड़ोंको अपने दाँतोंसे विदीर्ण कर डाला तथा कुछ अत्यन्त बलवान् गजराजोंने उन घोड़ोंको पकड़कर वेगपूर्वक दूर फेंक दिया ॥ २२ ॥ पादातैराहता नागा विवरेषु समन्ततः । चक्रुरार्तस्वरं घोरं दुद्रुवुश्च दिशो दश ॥ २३ ॥ प्रहारका अवसर मिलनेपर पैदल सैनिक भी चारों ओरसे हाथियोंको गहरी चोट पहुँचाते और वे घोर आर्तनाद करते हुए सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग जाते थे ॥ २३ ॥ पदातीनां तु सहसा प्रद्रुतानां महाहवे ।

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