भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1833

नृपश्रेष्ठ! आप श्रीकृष्णसे, कर्णसे और अर्जुनसे भी श्रेष्ठ हैं, इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। १२२ ।।

युद्धे ह्ययं रुद्रकल्पस्त्वं च ब्रह्मसमो नये ।
तस्माच्छक्तो भवाज्जेतुं मच्छत्रूंस्तानिवासुरान् ।। १२३ ।।
यह कर्ण युद्धक्षेत्रमें रुद्रके समान है और आप भी नीतिमें ब्रह्माजीके तुल्य हैं; अतः आप उन असुरोंकी भाँति मेरे शत्रुओंको जीतनेमें समर्थ हैं ।। १२३ ।।

यथा शल्याद्य कर्णोऽयं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् ।
प्रमथ्य हन्यात् कौन्तेयं तथा शीघ्रं विधीयताम् ।। १२४ ।।
शल्य! आप शीघ्र ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे यह कर्ण उस श्वेतवाहन अर्जुनको, जिसके सारथि श्रीकृष्ण हैं, मथकर मार डाले ।। १२४ ।।

त्वयि मद्रेश राज्याशा जीविताशा तथैव च ।
विजयश्च तथैवाद्य कर्णसाचिव्यकारितः ।। १२५ ।।
मद्रराज! आपपर ही मेरी राज्यप्राप्तिविषयक अभिलाषा और जीवनकी आशा निर्भर है। आपके द्वारा कर्णका सारथिकर्म सम्पादित होनेपर जो आज विजय मिलनेवाली है, उसकी सफलता भी आपपर ही निर्भर है ।। १२५ ।।

त्वयि कर्णश्च राज्यं च वयं चैव प्रतिष्ठिताः ।
विजयश्चैव संग्रामे संयच्छाद्य हयोत्तमान् ।। १२६ ।।
आपपर ही कर्ण, राज्य, हम और हमारी विजय प्रतिष्ठित हैं। इसलिये आज संग्राममें आप इन उत्तम घोड़ोंको अपने वशमें कीजिये ।। १२६ ।।

इमं चाप्यपरं भूय इतिहासं निबोध मे ।
पितुर्मम सकाशे यद् ब्राह्मणः प्राह धर्मवित् ।। १२७ ।।
राजन्! आप मुझसे फिर यह दूसरा इतिहास भी सुनिये, जिसे एक धर्मज्ञ ब्राह्मणने मेरे पिताके समीप कहा था ।। १२७ ।।

श्रुत्वा चैतद् वचश्चित्रं हेतुकार्यार्थसंहितम् ।
कुरु शल्य विनिश्चित्य माभूदत्र विचारणा ।। १२८ ।।
शल्य! कारण और कार्यसे युक्त इस विचित्र ऐतिहासिक वार्ताको सुनकर आप अच्छी तरह सोच-विचार लेनेके पश्चात् मेरा कार्य करें, इस विषयमें आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये ।। १२८ ।।

भार्गवाणां कुले जातो जमदग्निर्महायशाः ।
तस्य रामेति विख्यातः पुत्रस्तेजोगुणान्वितः ।। १२९ ।।
भृगुवंशमें महायशस्वी महर्षि जमदग्नि प्रकट हुए थे, जिनके तेजस्वी और गुणवान् पुत्र परशुरामके नामसे विख्यात हैं ।। १२९ ।।

स तीव्रं तप आस्थाय प्रसादयितवान् भवम् ।