भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1834, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1834

अस्त्रहेतोः प्रसन्नात्मा नियतः संयतेन्द्रियः ॥ १३० ॥ उन्होंने अस्त्र-प्राप्तिके लिये मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए प्रसन्न हृदयसे भारी तपस्या करके भगवान् शंकरको प्रसन्न किया ॥ १३० ॥ तस्य तुष्टो महादेवो भक्त्या च प्रशमेन च । हृद्गतं चास्य विज्ञाय दर्शयामास शङ्करः ॥ १३१ ॥ (प्रत्यक्षेण महादेवः स्वां तनुं सर्वशङ्करः ।) उनकी भक्ति और मनःसंयमसे संतुष्ट हो सबका कल्याण करनेवाले महादेवजीने उनके मनोगत भावको जानकर उन्हें अपने दिव्य शरीरका प्रत्यक्ष दर्शन कराया ॥ १३१ ॥

महेश्वर उवाच

राम तुष्टोऽस्मि भद्रं ते विदितं मे तवेप्सितम् । कुरुष्व पूतमात्मानं सर्वमेतदवाप्स्यसि ॥ १३२ ॥ **महादेवजी बोले—**राम! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम क्या चाहते हो, यह मुझे विदित है। अपने हृदयको शुद्ध करो। तुम्हें यह सब कुछ प्राप्त हो जायगा ॥ १३२ ॥ दास्यामि ते तदास्त्राणि यदा पूतो भविष्यसि । अपात्रमसमर्थं च दहन्त्यस्त्राणि भार्गव ॥ १३३ ॥ जब तुम पवित्र हो जाओगे, तब तुम्हें अपने अस्त्र दूँगा, भृगुनन्दन! अपात्र और असमर्थ पुरुषको तो ये अस्त्र जलाकर भस्म कर डालते हैं ॥ १३३ ॥ इत्युक्तो जामदग्न्यस्तु देवदेवेन शूलिना । प्रत्युवाच महात्मानं शिरसावनतः प्रभुम् ॥ १३४ ॥ त्रिशूलधारी देवाधिदेव महादेवजीके ऐसा कहनेपर जमदग्निनन्दन परशुरामने उन महात्मा भगवान् शिवको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ॥ १३४ ॥ यदा जानाति देवेशः पात्रं मामस्त्रधारणे । तदा शुश्रूषवेऽस्त्राणि भगवान् मे दातुमर्हति ॥ १३५ ॥ ‘यदि आप देवेश्वर प्रभु मुझे अस्त्रधारणाका पात्र समझें तभी मुझ सेवकको दिव्यास्त्र प्रदान करें’ ॥ १३५ ॥

दुर्योधन उवाच

ततः स तपसा चैव दमेन नियमेन च । पूजोपहारबलिभिर्होममन्त्रपुरस्कृतैः ॥ १३६ ॥ आराधयितवान् शर्वं बहून् वर्षगणांस्तदा ।