महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1835, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदुर्योधन कहता हैं—तदनन्तर परशुरामने बहुत वर्षोंतक तपस्या, इन्द्रिय-संयम, मनोनिग्रह, पूजा, उपहार, भेंट, अर्पण, होम और मन्त्र-जप आदि साधनोंद्वारा भगवान् शिवकी आराधना की ।। १३६ ½ ।।
प्रसन्नश्च महादेवो भार्गवस्य महात्मनः ॥ १३७ ॥
अब्रवीत् तस्य बहुशो गुणान् देव्याः समीपतः ।
भक्तिमानेष सततं मयि रामो दृढव्रतः ॥ १३८ ॥
इससे महादेवजी महात्मा परशुरामपर प्रसन्न हो गये और उन्होंने पार्वती देवीके समीप उनके गुणोंका बारंबार वर्णन किया—'ये दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले परशुराम मेरे प्रति सदा भक्तिभाव रखते हैं' ।। १३७-१३८ ।।
एवं तस्य गुणान् प्रीतो बहुशोऽकथयत् प्रभुः ।
देवतानां पितॄणां च समक्षमरिसूदन ॥ १३९ ॥
शत्रुसूदन! इसी प्रकार प्रसन्न हुए भगवान् शिवने देवताओं और पितरोंके समक्ष भी बारंबार प्रसन्नतापूर्वक उनके गुणोंका वर्णन किया ।। १३९ ।।
एतस्मिन्नेव काले तु दैत्या ह्यासन् महाबलाः ।
तैस्तदा दर्पमोहाद्यैरबाध्यन्त दिवौकसः ॥ १४० ॥
इन्हीं दिनोंकी बात है, दैत्यलोग महान् बलसे सम्पन्न हो गये थे। वे दर्प और मोह आदिके वशीभूत हो उस समय देवताओंको सताने लगे ।। १४० ।।
ततः सम्भूय विबुधास्तान् हन्तुं कृतनिश्चयाः ।
चक्रुः शत्रुवधे यत्नं न शेकुर्जेतुमेव तान् ॥ १४१ ॥
तब सम्पूर्ण देवताओंने एकत्र हो उन्हें मारनेका निश्चय करके शत्रुओंके वधके लिये यत्न किया; परंतु वे उन्हें जीत न सके ।। १४१ ।।
अभिगम्य ततो देवा महेश्वरमुमापतिम् ।
प्रासादयंस्तदा भक्त्या जहि शत्रुगणानिति ॥ १४२ ॥
तत्पश्चात् देवताओंने उमावल्लभ महेश्वरके समीप जाकर भक्तिपूर्वक उन्हें प्रसन्न किया और कहा—'प्रभो! हमारे शत्रुओंका संहार कीजिये' ।। १४२ ।।
प्रतिज्ञाय ततो देवो देवतानां रिपुक्षयम् ।
रामं भार्गवमाहूय सोऽभ्यभाषत शङ्करः ॥ १४३ ॥
तब कल्याणकारी महादेवजीने देवताओंके समक्ष उनके शत्रुओंका संहार करनेकी प्रतिज्ञा करके भृगुनन्दन परशुरामको बुलाकर इस प्रकार कहा— ।। १४३ ।।
रिपून् भार्गव देवानां जहि सर्वान् समागतान् ।
लोकानां हितकामार्थं मत्प्रीत्यर्थं तथैव च ॥ १४४ ॥
'भार्गव! तुम तीनों लोकोंके हितकी इच्छासे तथा मेरी प्रसन्नताके लिये देवताओंके समस्त समागत शत्रुओंका वध करो' ।। १४४ ।।