महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1836, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवमुक्तः प्रत्युवाच त्र्यम्बकं वरदं प्रभुम् ।
उनके ऐसा कहनेपर परशुरामने वरदायक भगवान् त्रिलोचनको इस प्रकार उत्तर दिया ॥ १४४ १/२ ॥
राम उवाच
का शक्तिर्मम देवेश अकृतास्त्रस्य संयुगे ॥ १४५ ॥
निहन्तुं दानवान् सर्वान् कृतास्त्रान् युद्धदुर्मदान् ।
**परशुराम बोले—**देवेश्वर! मैं तो अस्त्रविद्याका ज्ञाता नहीं हूँ। फिर युद्धस्थलमें अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा रणदुर्मद समस्त दानवोंका वध करनेके लिये मुझमें क्या शक्ति है? ॥ १४५ १/२ ॥
महेश्वर उवाच
गच्छ त्वं मदनुज्ञातो निहनिष्यसि शात्रवान् ॥ १४६ ॥
विजित्य च रिपून् सर्वान् गुणान् प्राप्स्यसि पुष्कलान् ।
**महेश्वरने कहा—**राम! तुम मेरी आज्ञासे जाओ। निश्चय ही देवशत्रुओंका संहार करोगे। उन समस्त वैरियोंपर विजय पाकर प्रचुर गुण प्राप्त कर लोगे ॥ १४६ १/२ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं प्रतिगृह्य च सर्वशः ॥ १४७ ॥
रामः कृतस्वस्त्ययनः प्रययौ दानवान् प्रति ।
अब्रवीद् देवशत्रूंस्तान् महादर्पबलान्वितान् ॥ १४८ ॥
उनकी यह बात सुनकर उसे सब प्रकारसे शिरोधार्य करके परशुराम स्वस्तिवाचन आदि मंगलकृत्य करनेके पश्चात् दानवोंका सामना करनेके लिये गये और महान् दर्प एवं बलसे सम्पन्न उन देवशत्रुओंसे इस प्रकार बोले— ॥ १४७-१४८ ॥
मम युद्धं प्रयच्छध्वं दैत्या युद्धमदोत्कटाः ।
प्रेषितो देवदेवेन वो निजेतुं महासुराः ॥ १४९ ॥
‘युद्धके मदसे उन्मत्त रहनेवाले दैत्यो! मुझे युद्ध प्रदान करो। महान् असुरगण! मुझे देवाधिदेव महादेवजीने तुम्हें परास्त करनेके लिये भेजा है’ ॥ १४९ ॥
इत्युक्ता भार्गवेणाथ दैत्या युद्धं प्रचक्रमुः ।
स तान् निहत्य समरे दैत्यान् भार्गवनन्दनः ॥ १५० ॥
वज्राशनिसमस्पर्शैः प्रहारैरेव भार्गवः ।
स दानवैः क्षततनुर्जामदग्न्यो द्विजोत्तमः ॥ १५१ ॥
भृगुवंशी परशुरामके ऐसा कहनेपर दैत्य उनके साथ युद्ध करने लगे। भार्गवनन्दन रामने समरांगणमें वज्र और विद्युत्के समान स्पर्शवाले प्रहारोंद्वारा उन दैत्योंका वध कर डाला। साथ ही उन द्विजश्रेष्ठ जमदग्निकुमारके शरीरको भी दानवोंने क्षत-विक्षत कर डाला ॥ १५०-१५१ ॥