महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1837, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्पृष्टःस्थाणुना सद्यो निर्व्रणः समजायत । प्रीतश्च भगवान् देवः कर्मणा तेन तस्य वै ॥ १५२ ॥ परंतु महादेवजीके हाथोंका स्पर्श पाकर परशुरामजीके सारे घाव तत्काल दूर हो गये। परशुरामके उस शत्रुविजयरूपी कर्मसे भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १५२ ॥ वरान् प्रादाद् बहुविधान् भार्गवाय महात्मने । उक्तश्च देवदेवेन प्रीतियुक्तेन शूलिना ॥ १५३ ॥ उन देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शिवने बड़ी प्रसन्नताके साथ महात्मा भार्गवको नाना प्रकारके वर प्रदान किये ॥ १५३ ॥ निपातात्तव शस्त्राणां शरीरे याभवद् रुजा । तया ते मानुषं कर्म व्यपोढं भृगुनन्दन ॥ १५४ ॥ गृहाणास्त्राणि दिव्यानि मत्सकाशाद् यथेप्सितम् । उन्होंने कहा—'भृगुनन्दन! दैत्योंके अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे तुम्हारे शरीरमें जो चोट पहुँची है, उससे तुम्हारा मानवोचित कर्म नष्ट हो गया (अब तुम देवताओंके ही समान हो गये); अतः मुझसे अपनी इच्छाके अनुसार दिव्यास्त्र ग्रहण करो' ॥ १५४ १/२ ॥
दुर्योधन उवाच
ततोऽस्त्राणि समस्तानि वरांश्च मनसेप्सितान् ॥ १५५ ॥ लब्ध्वा बहुविधान् रामः प्रणम्य शिरसा भवम् । अनुज्ञां प्राप्य देवेशाज्जगाम स महातपाः ॥ १५६ ॥ दुर्योधन कहता है—राजन्! तब रामने भगवान् शिवसे समस्त दिव्यास्त्र और नाना प्रकारके मनोवांछित वर पाकर उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया। फिर वे महातपस्वी परशुराम देवेश्वर शिवसे आज्ञा लेकर चले गये ॥ १५५-१५६ ॥ एवमेतत् पुरावृत्तं तदा कथितवानृषिः । भार्गवोऽपि ददौ दिव्यं धनुर्वेदं महात्मने ॥ १५७ ॥ कर्णाय पुरुषव्याघ्र सुप्रीतेनान्तरात्मना । राजन्! इस प्रकार यह पुरातन वृत्तान्त उस समय ऋषिने मेरे पिताजीसे कहा था। पुरुषसिंह! भृगुनन्दन परशुरामने भी अत्यन्त प्रसन्न हृदयसे महामना कर्णको दिव्य धनुर्वेद प्रदान किया है ॥ १५७ १/२ ॥ वृजिनं हि भवेत् किंचिद् यदि कर्णस्य पार्थिव ॥ १५८ ॥ नास्मै ह्यस्त्राणि दिव्यानि प्रादास्यद् भृगुनन्दनः । भूपाल! यदि कर्णमें कोई पाप या दोष होता तो भृगुनन्दन परशुराम इसे दिव्यास्त्र न देते ॥ १५८ १/२ ॥ नापि सूतकुले जातं कर्णं मन्ये कथंचन ॥ १५९ ॥