महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1838, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवपुत्रमहं मन्ये क्षत्रियाणां कुलोद्भवम् ।
विसृष्टमवबोधार्थं कुलस्येति मतिर्मम ।। १६० ।।
राजन्! मैं किसी तरह इस बातपर विश्वास नहीं करता कि कर्ण सूतकुलमें उत्पन्न हुआ है। मैं इसे क्षत्रियकुलमें उत्पन्न देवपुत्र मानता हूँ। मेरा तो यह विश्वास है कि इसकी माताने अपने गुप्त रहस्यको छिपानेके लिये तथा इसे अन्य कुलका बालक विख्यात करनेके लिये ही सूतकुलमें छोड़ दिया होगा ।। १५९-१६० ।।
सर्वथा न ह्ययं शल्य कर्णः सूतकुलोद्भवः ।
सकुण्डलं सकवचं दीर्घबाहुं महारथम् ।। १६१ ।।
कथमादित्यसदृशं मृगी व्याघ्रं जनिष्यति ।
शल्य! मैं सर्वथा इस बातपर विश्वास करता हूँ कि इस कर्णका जन्म सूतकुलमें नहीं हुआ है। इस महाबाहु महारथी और सूर्यके समान तेजस्वी कुण्डल-कवचविभूषित पुत्रको सूतजातिकी स्त्री कैसे पैदा कर सकती है? क्या कोई हरिणी अपने पेटसे बाघको जन्म दे सकी है? ।। १६१ १/३ ।।
यथा ह्यस्य भुजौ पीनौ नागराजकरोपमौ ।। १६२ ।।
वक्षः पश्य विशालं च सर्वशत्रुनिबर्हणम् ।
न त्वेष प्राकृतः कश्चित् कर्णो वैकर्तनो वृषः ।
महात्मा ह्येष राजेन्द्र रामशिष्यः प्रतापवान् ।। १६३ ।।
राजेन्द्र! गजराजके शुण्डदण्डके समान जैसी इसकी मोटी भुजाएँ हैं तथा समस्त शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ जैसा इसका विशाल वक्षःस्थल है, उससे सूचित होता है कि परशुरामजीका यह प्रतापी शिष्य महामनस्वी धर्मात्मा वैकर्तन कर्ण कोई प्राकृत पुरुष नहीं है ।। १६२-१६३ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि त्रिपुरवधोपाख्याने चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें त्रिपुरवधोपाख्यानविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १७० १/३ श्लोक हैं)