महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1839, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चत्रिंशोऽध्यायः
शल्य और दुर्योधनका वार्तालाप, कर्णका सारथि होनेके लिये शल्यकी स्वीकृति
दुर्योधन उवाच
एवं स भगवान् देवः सर्वलोकपितामहः ।
सारथ्यमकरोत् तत्र ब्रह्मा रुद्रोऽभवद् रथी ॥ १ ॥
**दुर्योधन बोला—**राजन्! इस प्रकार सर्वलोक-पितामह भगवान् ब्रह्माने वहाँ सारथिका कार्य किया और रथी हुए रुद्र ॥ १ ॥
रथिनोऽभ्यधिको वीर कर्तव्यो रथसारथिः ।
तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र नियच्छ तुरगान् युधि ॥ २ ॥
वीर! रथका सारथि तो उसीको बनाना चाहिये जो रथीसे भी बढ़कर हो। अतः पुरुषसिंह! आप युद्धमें कर्णके घोड़ोंको काबूमें रखिये ॥ २ ॥
यथा देवगणैस्तत्र वृतो यत्नात् पितामहः ।
तथास्माभिर्भवान् यत्नात् कर्णादभ्यधिको वृतः ॥ ३ ॥
जैसे देवताओंने वहाँ यत्नपूर्वक ब्रह्माजीका वरण किया था, उसी प्रकार हमलोगोंने विशेष चेष्टा करके कर्णसे भी अधिक बलवान् आपका सारथि-कर्मके लिये वरण किया ॥ ३ ॥
यथा देवैर्महाराज ईश्वरादधिको वृतः ।
तथा भवानपि क्षिप्रं रुद्रस्येव पितामहः ॥ ४ ॥
नियच्छ तुरगान् युद्धे राधेयस्य महाद्युते ।
महाराज! जैसे देवताओंने महादेवजीसे भी बड़े ब्रह्माजीको उनका सारथि चुना था, उसी प्रकार हमने भी आपको चुना है। अतः महातेजस्वी नरेश! आप युद्धमें राधापुत्र कर्णके घोड़ोंका नियन्त्रण कीजिये ॥ ४ ½ ॥
शल्य उवाच
मयाप्येतन्नरश्रेष्ठ बहुशोऽमरसिंहयोः ॥ ५ ॥
कथ्यमानं श्रुतं दिव्यमाख्यानमतिमानुषम् ।
यथा च चक्रे सारथ्यं भवस्य प्रपितामहः ॥ ६ ॥
यथासुराश्च निहता इषुणैकेन भारत ।