महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1840, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशल्यने कहा— भारत! नरश्रेष्ठ! मैंने भी देवश्रेष्ठ ब्रह्मा और महादेवजीके इस अलौकिक एवं दिव्य उपाख्यानको विद्वानोंके मुखसे सुना है कि किस प्रकार प्रपितामह ब्रह्माजीने महादेवजीका सारथि-कर्म किया था और कैसे एक ही बाणसे समस्त असुर मारे गये।।
कृष्णस्य चापि विदितं सर्वमेतत् पुरा ह्यभूत् ॥ ७ ॥ यथा पितामहो जज्ञे भगवान् सारथिस्तदा । भगवान् ब्रह्मा उस समय जिस प्रकार महादेवजीके सारथि हुए थे, यह सारा पुरातन वृत्तान्त श्रीकृष्णको भी विदित ही होगा ॥ ७१/२ ॥
अनागतमतिक्रान्तं वेद कृष्णोऽपि तत्त्वतः ॥ ८ ॥ एतदर्थं विदित्वापि सारथ्यमुपजग्मिवान् । स्वयंभूरिव रुद्रस्य कृष्णः पार्थस्य भारत ॥ ९ ॥ क्योंकि श्रीकृष्ण भी भूत और भविष्यको यथार्थरूपसे जानते हैं। भारत! इस विषयको अच्छी तरह जानकर ही रुद्रके सारथि ब्रह्माजीके समान श्रीकृष्ण पार्थके सारथि बने हुए हैं ॥ ८-९ ॥
यदि हन्याच्च कौन्तेयं सूतपुत्रः कथंचन । दृष्ट्वा पार्थं हि निहतं स्वयं योत्स्यति केशवः ॥ १० ॥ शङ्खचक्रगदापाणिर्धक्ष्यते तव वाहिनीम् । यदि सूतपुत्र कर्ण किसी प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुनको मार डालेगा तो अर्जुनको मारा गया देख श्रीकृष्ण स्वयं ही युद्ध करेंगे। उनके हाथमें शंख, चक्र और गदा होगी। वे तुम्हारी सेनाको जलाकर भस्म कर देंगे ॥ १०१/२ ॥
न चापि तस्य क्रुद्धस्य वार्ष्णेयस्य महात्मनः ॥ ११ ॥ स्थास्यते प्रत्यनीकेषु कश्चिदत्र नृपस्तव । महात्मा श्रीकृष्ण कुपित होकर जब हथियार उठायेंगे, उस समय तुम्हारे पक्षका कोई भी नरेश उनके सामने ठहर नहीं सकेगा ॥ १११/२ ॥
संजय उवाच
तं तथा भाषमाणं तु मद्रराजमरिंदमः ॥ १२ ॥ प्रत्युवाच महाबाहुरदीनात्मा सुतस्तव । संजय कहते हैं— राजन्! मद्रराज शल्यको ऐसी बातें करते देख आपके शत्रुदमन पुत्र महाबाहु दुर्योधनने मनमें तनिक भी दीनता न लाकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ १२१/२ ॥
मावमंस्था महाबाहो कर्णं वैकर्तनं रणे ॥ १३ ॥ सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं सर्वशास्त्रार्थपारगम् ।