महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
शल्यने कहा— भारत! नरश्रेष्ठ! मैंने भी देवश्रेष्ठ ब्रह्मा और महादेवजीके इस अलौकिक एवं दिव्य उपाख्यानको विद्वानोंके मुखसे सुना है कि किस प्रकार प्रपितामह ब्रह्माजीने महादेवजीका सारथि-कर्म किया था और कैसे एक ही बाणसे समस्त असुर मारे गये।।
कृष्णस्य चापि विदितं सर्वमेतत् पुरा ह्यभूत् ॥ ७ ॥ यथा पितामहो जज्ञे भगवान् सारथिस्तदा । भगवान् ब्रह्मा उस समय जिस प्रकार महादेवजीके सारथि हुए थे, यह सारा पुरातन वृत्तान्त श्रीकृष्णको भी विदित ही होगा ॥ ७१/२ ॥
अनागतमतिक्रान्तं वेद कृष्णोऽपि तत्त्वतः ॥ ८ ॥ एतदर्थं विदित्वापि सारथ्यमुपजग्मिवान् । स्वयंभूरिव रुद्रस्य कृष्णः पार्थस्य भारत ॥ ९ ॥ क्योंकि श्रीकृष्ण भी भूत और भविष्यको यथार्थरूपसे जानते हैं। भारत! इस विषयको अच्छी तरह जानकर ही रुद्रके सारथि ब्रह्माजीके समान श्रीकृष्ण पार्थके सारथि बने हुए हैं ॥ ८-९ ॥
यदि हन्याच्च कौन्तेयं सूतपुत्रः कथंचन । दृष्ट्वा पार्थं हि निहतं स्वयं योत्स्यति केशवः ॥ १० ॥ शङ्खचक्रगदापाणिर्धक्ष्यते तव वाहिनीम् । यदि सूतपुत्र कर्ण किसी प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुनको मार डालेगा तो अर्जुनको मारा गया देख श्रीकृष्ण स्वयं ही युद्ध करेंगे। उनके हाथमें शंख, चक्र और गदा होगी। वे तुम्हारी सेनाको जलाकर भस्म कर देंगे ॥ १०१/२ ॥
न चापि तस्य क्रुद्धस्य वार्ष्णेयस्य महात्मनः ॥ ११ ॥ स्थास्यते प्रत्यनीकेषु कश्चिदत्र नृपस्तव । महात्मा श्रीकृष्ण कुपित होकर जब हथियार उठायेंगे, उस समय तुम्हारे पक्षका कोई भी नरेश उनके सामने ठहर नहीं सकेगा ॥ १११/२ ॥
संजय उवाच
तं तथा भाषमाणं तु मद्रराजमरिंदमः ॥ १२ ॥ प्रत्युवाच महाबाहुरदीनात्मा सुतस्तव । संजय कहते हैं— राजन्! मद्रराज शल्यको ऐसी बातें करते देख आपके शत्रुदमन पुत्र महाबाहु दुर्योधनने मनमें तनिक भी दीनता न लाकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ १२१/२ ॥
मावमंस्था महाबाहो कर्णं वैकर्तनं रणे ॥ १३ ॥ सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं सर्वशास्त्रार्थपारगम् ।
‘महाबाहो! तुम रणक्षेत्रमें वैकर्तन कर्णका अपमान न करो। वह सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थका पारंगत विद्वान् है ।। १३१/२ ।।
यस्य ज्यातलनिर्घोषं श्रुत्वा भयंकरं महत् ।। १४ ।।
पाण्डवेयानि सैन्यानि विद्रवन्ति दिशो दश ।
‘यह वही वीर है जिसकी प्रत्यंचाकी अत्यन्त भयानक टंकार सुनकर पाण्डव-सेना दसों दिशाओंमें भागने लगती है ।। १४१/२ ।।
प्रत्यक्षं ते महाबाहो यथा रात्रौ घटोत्कचः ।। १५ ।।
मायाशतानि कुर्वाणो हतो मायापुरस्कृतः ।
‘महाबाहो! यह तो तुमने अपनी आँखों देखा था कि किस प्रकार उस दिन रातमें सैकड़ों मायाओंका प्रयोग करनेवाला मायावी घटोत्कच कर्णके हाथसे मारा गया ।। १५१/२ ।।
न चातिष्ठत बीभत्सुः प्रत्यनीके कथंचन ।। १६ ।।
एतांश्च दिवसान् सर्वान् भयेन महता वृतः ।
‘इन सारे दिनोंमें महान् भयसे घिरे हुए अर्जुन किसी तरह भी कर्णके सामने खड़े न हो सके थे ।। १६१/२ ।।
भीमसेनश्च बलवान् धनुष्कोट्याभिचोदितः ।। १७ ।।
उक्तश्च संज्ञया राजन् मूढ औदरिको यथा ।
‘राजन्! बलवान् भीमसेनको भी इसने अपने धनुषकी कोटिसे दबाकर युद्धके लिये प्रेरित किया था और उन्हें मूर्ख, पेटू आदि नामोंसे पुकारा था ।। १७१/२ ।।
माद्रीपुत्रौ तथा शूरौ येन जित्वा महारणे ।। १८ ।।
कमप्यर्थं पुरस्कृत्य न हतौ युधि मारिष ।
‘मान्यवर! इसने महासमरमें शूरवीर नकुल-सहदेवको भी परास्त करके किसी विशेष प्रयोजनको सामने रखकर उन दोनोंको युद्धमें मार नहीं डाला ।।
येन वृष्णिप्रवीरस्तु सात्यकिः सात्वतां वरः ।। १९ ।।
निर्जित्य समरे शूरो विरथश्च बलात् कृतः ।
‘इसने वृष्णिवंशके प्रमुख वीर सात्वतशिरोमणि शूरवीर सात्यकिको समरांगणमें परास्त करके उन्हें बलपूर्वक रथहीन कर दिया था ।। १९१/२ ।।
सृञ्जयाश्चेतरे सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।। २० ।।
असकृन्निर्जिताः संख्ये स्मयमानेन संयुगे ।
‘इसके सिवा धृष्टद्युम्न आदि समस्त सृञ्जयोको भी इसने युद्धस्थलमें हँसते-हँसते अनेक बार परास्त किया है ।। २०१/२ ।।
तं कथं पाण्डवा युद्धे विजेष्यन्ति महारथम् ।। २१ ।।
यो हन्यात् समरे क्रुद्धो वज्रहस्तं पुरंदरम् । 'जो कुपित होनेपर वज्रधारी इन्द्रको भी समरभूमिमें मार डालनेकी शक्ति रखता है, उस महारथी वीर कर्णको पाण्डवलोग युद्धमें कैसे जीत लेंगे? ।। २१ १/२ ।। त्वं च सर्वास्त्रविद् वीरः सर्वविद्यास्त्रपारगः ।। २२ ।। बाहुवीर्येण ते तुल्यः पृथिव्यां नास्ति कश्चन । 'आप भी सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, समस्त विद्याओं तथा अस्त्रोंके पारंगत विद्वान् एवं वीर हैं। इस भूतलपर बाहुबलके द्वारा आपकी समानता करनेवाला कोई नहीं है ।। २२ १/२ ।। त्वं शल्यभूतः शत्रूणामविषह्यः पराक्रमे ।। २३ ।। ततस्त्वमुच्यसे राजन् शल्य इत्यरिसूदन । 'शत्रुसूदन नरेश! आप पराक्रम प्रकट करते समय शत्रुओंके लिये असह्य हो उठते हैं, उनके लिये आप शल्यभूत (कण्टकस्वरूप) हैं; इसीलिये आपको शल्य कहा जाता है ।। २३ १/२ ।। तव बाहुबलं प्राप्य न शेकुः सर्वसात्वताः ।। २४ ।। तव बाहुबलाद् राजन् किं नु कृष्णो बलाधिकः । 'राजन्! आपके बाहुबलको सामने पाकर सम्पूर्ण सात्वतवंशी क्षत्रिय कभी युद्धमें टिक न सके हैं। क्या आपके बाहुबलसे श्रीकृष्णका बल अधिक है? ।। २४ १/२ ।। यथा हि कृष्णेन बलं धार्यं वै फाल्गुने हते ।। २५ ।। तथा कर्णात्ययीभावे त्वया धार्यं महत् बलम् । 'जैसे अर्जुनके मारे जानेपर श्रीकृष्ण पाण्डव-सेनाकी रक्षा करेंगे, उसी प्रकार यदि कर्ण मारा गया तो आपको मेरी विशाल वाहिनीका संरक्षण करना होगा ।। किमर्थं समरे सैन्यं वासुदेवो नवारयत् ।। २६ ।। किमर्थं च भवान् सैन्यं न हनिष्यति मारिष । 'मान्यवर! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण क्यों कौरव-सेनाका निवारण करेंगे और क्यों आप पाण्डव-सेनाका वध नहीं करेंगे? ।। २६ १/२ ।। त्वत्कृते पदवीं गन्तुमिच्छेयं युधि मारिष । सोदराणां च वीराणां सर्वेषां च महीक्षिताम् ।। २७ ।। 'माननीय नरेश! मैं तो आपके ही भरोसे युद्धमें मारे गये अपने वीर भाइयों तथा समस्त राजाओंके (ऋणसे मुक्त होनेके लिये उन्हींके) पथपर चलनेकी इच्छा करता हूँ' ।। २७ १/२ ।।
<center>शल्य उवाच</center>यन्मां ब्रवीषि गान्धारे अग्रे सैन्यस्य मानद । विशिष्टं देवकीपुत्रात् प्रीतिमानस्म्यहं त्वयि ।। २८ ।।
शल्यने कहा— मानद! गान्धारीनन्दन! तुम सम्पूर्ण सेनाके आगे जो मुझे देवकीपुत्र श्रीकृष्णसे बढ़कर बता रहे हो, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ २८ ॥
एष सारथ्यमातिष्ठे राधेयस्य यशस्विनः ।
युध्यतः पाण्डवाग्र्येण यथा त्वं वीर मन्यसे ॥ २९ ॥
वीर! मैं यशस्वी राधापुत्र कर्णका पाण्डवशिरोमणि अर्जुनके साथ युद्ध करते समय सारथ्य करूँगा जैसा कि तुम चाहते हो ॥ २९ ॥
समयश्च हि मे वीर कश्चिद् वैकर्तनं प्रति ।
उत्सृजेयं यथाश्रद्धमहं वाचोऽस्य संनिधौ ॥ ३० ॥
वीरवर! परंतु वैकर्तन कर्णको मेरी एक शर्तका पालन करना होगा। मैं इसके समीप जो जीमें आयेगा, वैसी बातें करूँगा ॥ ३० ॥
संजय उवाच
तथेति राजन् पुत्रस्ते सह कर्णेन मारिष ।
अब्रवीन्मद्रराजानं सर्वक्षत्रस्य संनिधौ ॥ ३१ ॥
संजय कहते हैं— माननीय नरेश! तब समस्त क्षत्रियोंके समीप कर्णसहित आपके पुत्रने मद्रराज शल्यसे कहा— 'बहुत अच्छा, आपकी शर्त स्वीकार है' ॥ ३१ ॥
सारथ्यस्याभ्युपगमाच्छल्येनाश्वासितस्तदा ।
दुर्योधनस्तदा हृष्टः कर्णं तमभिषस्वजे ॥ ३२ ॥
सारथ्य स्वीकार करके जब शल्यने आश्वासन दिया, तब राजा दुर्योधनने बड़े हर्षके साथ कर्णको हृदयसे लगा लिया ॥ ३२ ॥
अब्रवीच्च पुनः कर्णं स्तूयमानः सुतस्तव ।
जहि पार्थान् रणे सर्वान् महेन्द्रो दानवानिव ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् वन्दीजनोंद्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए आपके पुत्रने कर्णसे फिर कहा—'वीर! तुम रणक्षेत्रमें कुन्तीके समस्त पुत्रोंको उसी प्रकार मार डालो, जैसे देवराज इन्द्र दानवोंका संहार करते हैं' ॥ ३३ ॥
स शल्येनाभ्युपगते हयानां संनियच्छने ।
कर्णो हृष्टमना भूयो दुर्योधनमभाषत ॥ ३४ ॥
शल्यके द्वारा अश्वोंका नियन्त्रण स्वीकार कर लिये जानेपर कर्ण प्रसन्नचित्त हो पुनः दुर्योधनसे बोला— ॥ ३४ ॥
नातिहृष्टमना ह्येष मद्रराजोऽभिभाषते ।
राजन् मधुरया वाचा पुनरेनं ब्रवीहि वै ॥ ३५ ॥
'राजन्! ये मद्रराज शल्य अधिक प्रसन्न होकर बात नहीं कर रहे हैं; अतः तुम मधुर वाणीद्वारा इन्हें फिरसे समझाते हुए कुछ कहो' ॥ ३५ ॥
ततो राजा महाप्राज्ञः सर्वास्त्रकुशलो बली ।
दुर्योधनोऽब्रवीच्छल्यं मद्रराजं महीपतिम् ॥ ३६ ॥
पूरयन्निव घोषेण मेघगम्भीरया गिरा ।
तब सम्पूर्ण अस्त्रोंके संचालनमें कुशल, परम बुद्धिमान् एवं बलवान् राजा दुर्योधनने मद्रदेशके राजा पृथ्वीपति शल्यको सम्बोधित करके अपने स्वरसे वहाँके प्रदेशको गुँजाते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीद्वारा इस प्रकार कहा— ॥ ३६ १/२ ॥
शल्य कर्णोऽर्जुनेनाद्य योद्धव्यमिति मन्यते ॥ ३७ ॥
तस्य त्वं पुरुषव्याघ्र नियच्छ तुरगान् युधि ।
‘शल्य! आज कर्ण अर्जुनके साथ युद्ध करनेकी इच्छा रखता है। पुरुषसिंह! आप रणस्थलमें इसके घोड़ोंको काबूमें रखें ॥ ३७ १/२ ॥
कर्णो हत्वेतरान् सर्वान् फाल्गुनं हन्तुमिच्छति ॥ ३८ ॥
तस्याभीषुग्रहे राजन् प्रयाचे त्वां पुनः पुनः ।
‘कर्ण अन्य सब शत्रुवीरोंका संहार करके अर्जुनका वध करना चाहता है। राजन्! आपसे उसके घोड़ोंकी बागडोर सँभालनेके लिये मैं बारंबार याचना करता हूँ ॥ ३८ १/२ ॥
पार्थस्य सचिवः कृष्णो यथाभीषुग्रहो वरः ।
तथा त्वमपि राधेयं सर्वतः परिपालय ॥ ३९ ॥
‘जैसे श्रीकृष्ण अर्जुनके श्रेष्ठ सचिव तथा सारथि हैं, उसी प्रकार आप भी राधापुत्र कर्णकी सर्वथा रक्षा कीजिये’ ॥ ३९ ॥
संजय उवाच
ततः शल्यः परिष्वज्य सुतं ते वाक्यमब्रवीत् ।
दुर्योधनममित्रघ्नं प्रीतो मद्राधिपस्तदा ॥ ४० ॥
संजय कहते हैं—महाराज! तब मद्रराज शल्यने प्रसन्न हो आपके पुत्र शत्रुसूदन दुर्योधनको हृदयसे लगाकर कहा ॥ ४० ॥
शल्य उवाच
एवं चेन्मन्यसे राजन् गान्धारे प्रियदर्शन ।
तस्मात् ते यत् प्रियं किंचित् तत् सर्वं करवाण्यहम् ॥ ४१ ॥
शल्य बोले—गान्धारीनन्दन! प्रियदर्शन नरेश! यदि तुम ऐसा समझते हो तो तुम्हारा जो कुछ प्रिय कार्य है, वह सब मैं करूँगा ॥ ४१ ॥
यत्रास्मि भरतश्रेष्ठ योग्यः कर्मणि कर्हिचित् ।
तत्र सर्वात्मना युक्तो वक्ष्ये कार्यधुरं तव ॥ ४२ ॥
भरतश्रेष्ठ! मैं जहाँ कहीं कभी भी जिस कर्मके योग्य होऊँ वहाँ उस कर्ममें तुम्हारे द्वारा नियुक्त कर दिये जानेपर मैं सम्पूर्ण हृदयसे उस कार्यभारको वहन करूँगा ॥ ४२ ॥
यत्तु कर्णमहं ब्रूयां हितकामः प्रियाप्रिये । मम तत् क्षमतां सर्वं भवान् कर्णश्च सर्वशः ॥ ४३ ॥ परंतु मैं हितकी इच्छा रखते हुए कर्णसे जो भी प्रिय अथवा अप्रिय वचन कहूँ, वह सब तुम और कर्ण सर्वथा क्षमा करो ॥ ४३ ॥
कर्ण उवाच
ईशानस्य यथा ब्रह्मा यथा पार्थस्य केशवः । तथा नित्यं हिते युक्तो मद्रराज भवस्व नः ॥ ४४ ॥ कर्णने कहा— मद्रराज! जैसे ब्रह्मा महादेवजीके और श्रीकृष्ण अर्जुनके हितमें सदा तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार आप भी निरन्तर हमारे हितसाधनमें संलग्न रहें ॥
शल्य उवाच
आत्मनिन्दाऽऽत्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः । अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम् ॥ ४५ ॥ शल्य बोले— अपनी निन्दा और प्रशंसा, परायी निन्दा और परायी स्तुति—ये चार प्रकारके बर्ताव श्रेष्ठ पुरुषोंने कभी नहीं किये हैं ॥ ४५ ॥ यत् तु विद्वन् प्रवक्ष्यामि प्रत्ययार्थमहं तव । आत्मनः स्तवसंयुक्तं तन्निबोध यथातथम् ॥ ४६ ॥ परंतु विद्वन्! मैं तुम्हें विश्वास दिलानेके लिये जो अपनी प्रशंसासे भरी बात कहता हूँ, उसे तु यथार्थरूपसे सुनो ॥ ४६ ॥ अहं शक्रस्य सारथ्ये योग्यो मातलिवत् प्रभो । अप्रमादात् प्रयोगाच्च ज्ञानविद्याचिकित्सनैः ॥ ४७ ॥ प्रभो! मैं सावधानी, अश्वसंचालन, ज्ञान, विद्या तथा चिकित्सा आदि सद्गुणोंकी दृष्टिसे इन्द्रके सारथि-कर्ममें नियुक्त मातलिके समान सुयोग्य हूँ ॥ ४७ ॥ ततः पार्थेन संग्रामे युध्यमानस्य तेऽनघ । वाहयिष्यामि तुरगान् विज्वरो भव सूतज ॥ ४८ ॥ निष्पाप सूतपुत्र कर्ण! जब तुम युद्धस्थलमें अर्जुनके साथ युद्ध करोगे, तब मैं तुम्हारे घोड़े अवश्य हाँकूँगा। तुम निश्चिन्त रहो ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यसारथ्यस्वीकारे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यके सारथिकर्मको स्वीकार करनेसे सम्बन्ध रखनेवाला पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1846)
षट्त्रिंशोऽध्यायः
कर्णका युद्धके लिये प्रस्थान और शल्यसे उसकी बातचीत
दुर्योधन उवाच
अयं ते कर्ण सारथ्यं मद्रराजः करिष्यति ।
कृष्णादभ्यधिको यन्ता देवेशस्येव मातलिः ॥ १ ॥
**दुर्योधन बोला—**कर्ण! ये मद्रराज शल्य तुम्हारा सारथ्यकर्म करेंगे। देवराज इन्द्रके सारथि मातलिके समान ये श्रीकृष्णसे भी श्रेष्ठ रथसंचालक हैं ॥ १ ॥
यथा हरिहयैर्युक्तं संगृह्णाति स मातलिः ।
शल्यस्तथा तवाद्यायं संयन्ता रथवाजिनाम् ॥ २ ॥
जैसे मातलि इन्द्रके घोड़ोंसे जुते हुए रथकी बागडोर सँभालते हैं, उसी प्रकार ये तुम्हारे रथके घोड़ोंको काबूमें रखेंगे ॥ २ ॥
योधे त्वयि रथस्थे च मद्रराजे च सारथौ ।
रथश्रेष्ठो ध्रुवं संख्ये पार्थानभिभविष्यति ॥ ३ ॥
जब तुम योद्धा बनकर रथपर बैठोगे और मद्रराज शल्य सारथिके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे, उस समय वह श्रेष्ठ रथ निश्चय ही युद्धस्थलमें कुन्तीपुत्रोंको पराजित कर देगा ॥ ३ ॥
संजय उवाच
ततो दुर्योधनो भूयो मद्रराजं तरस्विनम् ।
उवाच राजन् संग्रामेऽव्युषिते पर्युपस्थिते ॥ ४ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर दुर्योधनने प्रातःकाल युद्ध उपस्थित होनेपर पुनः वेगशाली मद्रराज शल्यसे कहा— ॥ ४ ॥
कर्णस्य यच्छ संग्रामे मद्रराज हयोत्तमान् ।
त्वयाभिगुप्तो राधेयो विजेष्यति धनंजयम् ॥ ५ ॥
‘मद्रराज! आप संग्राममें कर्णके इन उत्तम घोड़ोंको वशमें कीजिये। आपसे सुरक्षित होकर राधापुत्र कर्ण निश्चय ही अर्जुनको जीत लेगा’ ॥ ५ ॥
इत्युक्तो रथमास्थाय तथेति प्राह भारत ।
शल्येऽभ्युपगते कर्णः सारथिं सुमनाब्रवीत् ॥ ६ ॥
त्वं सूत स्यन्दनं मह्यं कल्पयेत्यसकृत् त्वरन् ।
भारत! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर शल्यने रथका स्पर्श करके कहा—'तथास्तु।' जब शल्यने सारथि होना पूर्णरूपसे स्वीकार कर लिया, तब कर्णने प्रसन्नचित्त होकर बारंबार अपने पूर्व सारथिसे शीघ्रतापूर्वक कहा—'सूत! तुम मेरा रथ सजाकर तैयार करो' ॥ ६ १/२ ॥
ततो जैत्रं रथवरं गन्धर्वनगरोपमम् ॥ ७ ॥
विधिवत् कल्पितं भद्रं जयेत्युक्त्वा न्यवेदयत् ।
तब सारथिने गन्धर्वनगरके समान विशाल, विजयशील श्रेष्ठ और मंगलकारक रथको विधिपूर्वक सुसज्जित करके सूचित किया—'स्वामिन्! आपकी जय हो! रथ तैयार है' ॥ ७ १/२ ॥
तं रथं रथिनां श्रेष्ठः कर्णोऽभ्यर्च्य यथाविधि ॥ ८ ॥
सम्पादितं ब्रह्मविदा पूर्वमेव पुरोधसा ।
कृत्वा प्रदक्षिणं यत्नादुपस्थाय च भास्करम् ॥ ९ ॥
समीपस्थं मद्रराजमारोह त्वमथाब्रवीत् ।
रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णने वेदज्ञ पुरोहितद्वारा पहलेसे ही जिसका मांगलिक कृत्य सम्पन्न कर दिया गया था, उस रथकी विधिपूर्वक पूजा और प्रदक्षिणा की। तत्पश्चात् सूर्यदेवका प्रयत्नपूर्वक उपस्थान करके पास ही खड़े हुए मद्रराजसे कहा—'पहले आप रथपर बैठिये' ॥ ८-९ १/२ ॥
ततः कर्णस्य दुर्धर्षं स्यन्दनप्रवरं महत् ॥ १० ॥
आरुरोह महातेजाः शल्यः सिंह इवाचलम् ।
तदनन्तर जैसे सिंह पर्वतपर चढ़ता है, उसी प्रकार महातेजस्वी शल्य कर्णके दुर्जय, विशाल एवं श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हुए ॥ १० १/२ ॥
ततः शल्याश्रितं दृष्ट्वा कर्णः स्वं रथमुत्तमम् ॥ ११ ॥
अध्यतिष्ठद् यथाम्भोदं विद्युत्वन्तं दिवाकरः ।
कर्ण अपने उत्तम रथको सारथि शल्यसे सनाथ हुआ देख स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुआ, मानो सूर्यदेव बिजलियोंसे युक्त मेघपर प्रतिष्ठित हुए हों ॥ ११ १/२ ॥
तावेकरथमारूढावादित्याग्निसमत्विषौ ॥ १२ ॥
अभ्राजेतां यथा मेघं सूर्याग्नी सहितौ दिवि ।
जैसे आकाशमें किसी महान् मेघखण्डपर एक साथ बैठे हुए सूर्य और अग्नि प्रकाशित हो रहे हों, उसी प्रकार सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी कर्ण और शल्य उस एक ही रथपर आरूढ़ हो बड़ी शोभा पाने लगे ॥ १२ १/२ ॥
संस्तूयमानौ तौ वीरौ तदास्तां द्युतिमत्तमौ ॥ १३ ॥
ऋत्विक्सदस्यैरिन्द्राग्नी स्तूयमानाविवाध्वरे ।
उस समय उन दोनों परम तेजस्वी वीरोंकी उसी प्रकार स्तुति होने लगी, जैसे यज्ञमण्डपमें ऋत्विजों और सदस्योंद्वारा इन्द्र और अग्नि देवताका स्तवन किया जाता है॥ १३ १/२॥
स शल्यसंगृहीताश्वे रथे कर्णः स्थितो बभौ ॥ १४ ॥
धनुर्विस्फारयन् घोरं परिवेषीव भास्करः ।
शल्यने घोड़ोंकी बागडोर हाथमें ले ली। उस रथपर बैठा हुआ कर्ण अपने भयंकर धनुषको फैलाकर उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, मानो सूर्यमण्डलपर घेरा पड़ा हो॥ १४ १/२॥
आस्थितः स रथश्रेष्ठं कर्णः शरगभस्तिमान् ॥ १५ ॥
प्रबभौ पुरुषव्याघ्रो मन्दरस्थ इवांशुमान् ।
उस श्रेष्ठ रथपर चढ़ा हुआ पुरुषसिंह कर्ण अपनी बाणमयी किरणोंसे युक्त हो मन्दराचलके शिखरपर देदीप्यमान होनेवाले सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ १५ १/२ ॥
तं रथस्थं महाबाहुं युद्धायामिततेजसम् ॥ १६ ॥
दुर्योधनस्तु राधेयमिदं वचनमब्रवीत् ।
अकृतं द्रोणभीष्माभ्यां दुष्करं कर्म संयुगे ॥ १७ ॥ कुरुष्वाधिरथे वीर मिषतां सर्वधन्विनाम् । युद्धके लिये रथपर बैठे हुए अमिततेजस्वी महाबाहु राधापुत्र कर्णसे दुर्योधनने इस प्रकार कहा—'वीर! अधिरथकुमार! युद्धस्थलमें द्रोणाचार्य और भीष्म भी जिसे न कर सके, वही दुष्कर कर्म तुम सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते-देखते कर डालो ॥ १६-१७ १/२ ॥ मनोगतं मम ह्यासीद् भीष्मद्रोणौ महारथौ ॥ १८ ॥ अर्जुनं भीमसेनं च निहन्ताराविति ध्रुवम् । 'मेरे मनमें यह विश्वास था कि 'महारथी भीष्म और द्रोणाचार्य अर्जुन और भीमसेनको अवश्य ही मार डालेंगे ॥ १८ १/२ ॥ ताभ्यां यदकृतं वीर वीरकर्म महामृधे ॥ १९ ॥ तत् कर्म कुरु राधेय वज्रपाणिरिवापरः । 'वीर राधापुत्र! वे दोनों जिसे न कर सके, वही वीरोचित कर्म आज महासमरमें दूसरे वज्रधारी इन्द्रके समान तुम निश्चय ही पूर्ण करो ॥ १९ १/२ ॥ गृहाण धर्मराजं वा जहि वा त्वं धनंजयम् ॥ २० ॥ भीमसेनं च राधेय माद्रीपुत्रौ यमावपि । 'राधानन्दन! या तो तुम धर्मराज युधिष्ठिरको कैद कर लो या अर्जुन, भीमसेन तथा माद्रीकुमार नकुल-सहदेवको मार डालो ॥ २० १/२ ॥ जयश्च तेऽस्तु भद्रं ते प्रयाहि पुरुषर्षभ ॥ २१ ॥ पाण्डुपुत्रस्य सैन्यानि कुरु सर्वाणि भस्मसात् । 'पुरुषप्रवर! तुम्हारी जय हो। कल्याण हो। अब तुम जाओ और पाण्डुपुत्रकी सारी सेनाओंको भस्म करो' ॥ ततस्तूर्यसहस्राणि भेरीणामयुतानि च ॥ २२ ॥ वाद्यमानान्यराजन्त मेघशब्दो यथा दिवि । तदनन्तर सहस्रों तूर्य और कई सहस्र रणभेरियाँ बज उठीं, जो आकाशमें मेघोंकी गर्जनाके समान प्रतीत हो रही थीं ॥ २२ १/२ ॥ प्रतिगृह्य तु तद् वाक्यं रथस्थो रथसत्तमः ॥ २३ ॥ अभ्यभाषत राधेयः शल्यं युद्धविशारदम् । चोदयाश्वान् महाबाहो यावद्धन्मि धनंजयम् ॥ २४ ॥ भीमसेनं यमौ चोभौ राजानं च युधिष्ठिरम् । रथपर बैठे हुए रथियोंमें श्रेष्ठ राधापुत्र कर्णने दुर्योधनके उस आदेशको शिरोधार्य करके युद्धकुशल राजा शल्यसे कहा—'महाबाहो! मेरे घोड़ोंको बढ़ाइये, जिससे कि मैं अर्जुन, भीमसेन, दोनों भाई नकुल-सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरका वध कर सकूँ ॥ २३-२४ १/२ ॥
अद्य पश्यतु मे शल्य बाहुवीर्यं धनंजयः ॥ २५ ॥ अत्यतः कङ्कपत्राणां सहस्राणि शतानि च । ‘शल्य! आज सैकड़ों और सहस्रों कंकपत्रयुक्त बाणोंकी वर्षा करते हुए मुझ कर्णके बाहुबलको अर्जुन देखें ॥ २५ १/२ ॥ अद्य क्षेप्स्याम्यहं शल्य शरान् परमतेजनान् ॥ २६ ॥ पाण्डवानां विनाशाय दुर्योधनजयाय च । ‘शल्य! आज मैं पाण्डवोंके विनाश और दुर्योधनकी विजयके लिये अत्यन्त तीखे बाण चलाऊँगा’ ॥ २६ १/२ ॥
शल्य उवाच
सूतपुत्र कथं नु त्वं पाण्डवानवमन्यसे ॥ २७ ॥ सर्वास्त्रज्ञान् महेष्वासान् सर्वानैव महाबलान् । अनिवर्तिनो महाभागानजय्यान् सत्यविक्रमान् ॥ २८ ॥ **शल्यने कहा—**सूतपुत्र! तुम पाण्डवोंकी अवहेलना कैसे करते हो। वे सब-के-सब तो सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, महाधनुर्धर, महाबलवान्, युद्धसे पीछे न हटनेवाले, अजेय तथा सत्यपराक्रमी हैं ॥ २७-२८ ॥ अपि संतनयेयुर्ये भयं साक्षाच्छतक्रतोः । यदा श्रोष्यसि निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ २९ ॥ राधेय गाण्डिवस्याजौ तदा नैवं वदिष्यसि । वे साक्षात् इन्द्रके मनमें भी भय उत्पन्न कर सकते हैं। राधापुत्र! जब तुम युद्धस्थलमें वज्रकी गड़गड़ाहटके समान गाण्डीव धनुषका गम्भीर घोष सुनोगे, तब ऐसी बातें नहीं कहोगे ॥ २९ १/२ ॥ यदा द्रक्ष्यसि भीमेन कुञ्जरानीकमाहवे ॥ ३० ॥ विशीर्णदन्तं निहतं तदा नैवं वदिष्यसि । जब तुम देखोगे कि भीमसेनने संग्रामभूमिमें गजराजोंकी सेनाके दाँत तोड़-तोड़कर उसका संहार कर डाला है, तब तुम इस प्रकार नहीं बोल सकोगे ॥ ३० १/२ ॥ यदा द्रक्ष्यसि संग्रामे धर्मपुत्रं यमौ तथा ॥ ३१ ॥ शितैः पृषत्कैः कुर्वाणानभ्रच्छायामिवाम्बरे । अस्यतः क्षिण्वतश्चारीँल्लघुहस्तान् दुरासदान् । पार्थिवानपि चान्यांस्त्वं तदा नैवं वदिष्यसि ॥ ३२ ॥ जब तुम्हें यह दिखायी देगा कि संग्राममें धर्मपुत्र युधिष्ठिर, नकुल-सहदेव तथा अन्यान्य दुर्जय भूपाल बड़ी शीघ्रताके साथ हाथ चला रहे हैं, अपने तीखे बाणोंद्वारा आकाशमें
मेघोंकी छायाके समान छाया कर रहे हैं, निरन्तर बाण-वर्षा करते और शत्रुओंका संहार किये डालते हैं, तब तुम ऐसी बातें मुँहसे न निकाल सकोगे ॥ ३१-३२ ॥
संजय उवाच
अनादृत्य तु तद् वाक्यं मद्रराजेन भाषितम् ।
याहीत्येवाब्रवीत् कर्णो मद्रराजं तरस्विनम् ॥ ३३ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! मद्रराजकी कही हुई उस बातकी उपेक्षा करके कर्णने उन वेगशाली मद्रनरेशसे कहा—‘चलिये, चलिये’ ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यसंवादे षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यसंवादविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन
संजय उवाच
दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं युयुत्सुं समवस्थितम् ।
चुक्रुशुः कुरवः सर्वे हृष्टरूपाः समन्ततः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! जब महाधनुर्धर कर्ण युद्धकी इच्छासे समरांगणमें डटकर खड़ा हो गया, तब समस्त कौरव बड़े हर्षमें भरकर सब ओर कोलाहल करने लगे ॥
ततो दुन्दुभिनिर्घोषैर्भेरीणां निनदेन च ।
बाणशब्दैश्च विविधैर्गर्जितैश्च तरस्विनाम् ॥ २ ॥
निर्ययुस्तावका युद्धे मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ।
तदनन्तर आपके पक्षके समस्त वीर दुन्दुभि और भेरियोंकी ध्वनि, बाणोंकी सनसनाहट और वेगशाली वीरोंकी विविध गर्जनाओंके साथ युद्धके लिये निकल पड़े। उनके मनमें यह निश्चय था कि अब मौत ही हमें युद्धसे निवृत्त कर सकेगी ॥ २ १/२ ॥
प्रयाते तु ततः कर्णे योधेषु मुदितेषु च ॥ ३ ॥
चचाल पृथिवी राजन् ववाश च सुविस्तरम् ।
राजन्! कर्ण और कौरव योद्धाओंके प्रसन्नतापूर्वक प्रस्थान करनेपर धरती डोलने और बड़े जोर-जोरसे अव्यक्त शब्द करने लगी ॥ ३ १/२ ॥
निःसरन्तो व्यदृश्यन्त सूर्यात् सप्त महाग्रहाः ॥ ४ ॥
उल्कापाताश्च संजज्ञुर्दिशां दाहास्तथैव च ।
शुष्काशन्यश्च सम्पेतुर्युवार्ताश्च भैरवाः ॥ ५ ॥
उस समय सूर्यमण्डलसे सात बड़े-बड़े ग्रह निकलते दिखायी दिये, उल्कापात होने लगे, दिशाओंमें आग-सी जल उठी, बिना वर्षाके ही बिजलियाँ गिरने लगीं और भयानक आँधी चलने लगी ॥ ४-५ ॥
मृगपक्षिगणाश्चैव पृतनां बहुशस्तव ।
अपसव्यं तदा चक्रुर्वेदयन्तो महाभयम् ॥ ६ ॥
बहुतेरे मृग और पक्षी महान् भयकी सूचना देते हुए अनेक बार आपकी सेनाको दाहिने करके चले गये ॥ ६ ॥
प्रस्थितस्य च कर्णस्य निपेतुस्तुरगा भुवि ।
अस्थिवर्षं च पतितमन्तरिक्षाद् भयानकम् ॥ ७ ॥
कर्णके प्रस्थान करते ही उसके घोड़े पृथ्वीपर गिर पड़े और आकाशसे हड्डियोंकी भयंकर वर्षा होने लगी ॥ ७ ॥ जज्वलुश्चैव शस्त्राणि ध्वजाश्चैव चकम्पिरे । अश्रूणि च व्यमुञ्चन्त वाहनानि विशाम्पते ॥ ८ ॥ प्रजानाथ! कौरवोंके शस्त्र जल उठे, ध्वज हिलने लगे और वाहन आँसू बहाने लगे ॥ ८ ॥ एते चान्ये च बहव उत्पातास्तत्र दारुणाः । सम्पतेतुर्विनाशाय कौरवाणां सुदारुणाः ॥ ९ ॥ ये तथा और भी बहुत-से भयंकर उत्पात वहाँ प्रकट हुए, जो कौरवोंके विनाशकी सूचना दे रहे थे ॥ ९ ॥ न च तान् गणयामासुः सर्वे दैवेन मोहिताः । प्रस्थितं सूतपुत्रं च जयेत्यूचुर्नराधिपाः । निर्जितान् पाण्डवांश्चैव मेनिरे तत्र कौरवाः ॥ १० ॥ परंतु दैवसे मोहित होनेके कारण उन सबने उन उत्पातोंको कुछ गिना ही नहीं। सूतपुत्रके प्रस्थान करनेपर सब राजा उसकी जय-जयकार बोलने लगे। कौरवोंको यह विश्वास हो गया कि अब पाण्डव परास्त हो जायँगे ॥ १० ॥ ततो रथस्थः परवीरहन्ता भीष्मद्रोणावस्तवीर्यौ समीक्ष्य । समुज्ज्वलद्भास्करपावकाभो वैकर्तनोऽसौ रथकुञ्जरो नृप ॥ ११ ॥ स शल्यमाभाष्य जगाद वाक्यं पार्थस्य कर्मातिशयं विचिन्त्य । मानेन दर्पेण विदह्यमानः क्रोधेन दीप्यन्निव निःश्वसंश्च ॥ १२ ॥ नरेश्वर! तदनन्तर प्रकाशमान सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी, शत्रुवीरोंका संहार करनेमें समर्थ एवं रथपर बैठा हुआ रथिश्रेष्ठ कर्ण यह देखकर कि भीष्म और द्रोणाचार्यके पराक्रमका लोप हो गया, अर्जुनके अलौकिक कर्मका चिन्तन करके अभिमान और दर्पसे दग्ध हो उठा तथा क्रोधसे जलता हुआ-सा लंबी-लंबी साँस खींचने लगा। उस समय उसने शल्यको सम्बोधित करके कहा— ॥ ११-१२ ॥ नाहं महेन्द्रादपि वज्रपाणेः क्रुद्धाद् बिभेम्यायुधवान् रथस्थः । दृष्ट्वा हि भीष्मप्रमुखाञ्शयाना- नतीव मां ह्यस्थिरता जहाति ॥ १३ ॥
‘राजन्! मैं हाथमें आयुध लेकर रथपर बैठा रहूँ, उस अवस्थामें यदि वज्र धारण करनेवाले इन्द्र भी कुपित होकर आ जायँ तो उनसे भी मुझे भय न होगा। भीष्म आदि महारथियोंको रणभूमिमें सदाके लिये सोया हुआ देखकर भी अस्थिरता (घबराहट) मुझसे दूर ही रहती है॥
महेन्द्रविष्णुप्रतिमावनिन्दितौ
रथाश्वनागप्रवरप्रमाथिनौ।
अवध्यकल्पौ निहतौ यदा परै-
स्ततो न मेऽप्यस्ति रणेऽद्य साध्वसम् ॥ १४ ॥
‘भीष्म और द्रोणाचार्य देवराज इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी, सबके द्वारा प्रशंसित, रथों, घोड़ों और गजराजोंको भी मथ डालनेवाले तथा अवध्य-तुल्य थे, जब उन्हें भी शत्रुओंने मार डाला, तब मेरी क्या गिनती है? यह सोचकर भी आज मुझे रणभूमिमें कोई भय नहीं हो रहा है॥ १४॥
समीक्ष्य संख्येऽतिबलान् नराधिपान्
ससूतमातङ्गरथान् परैर्हतान्।
कथं न सर्वानहितान्रणेऽवधीद्
महास्त्रविद् ब्राह्मणपुङ्गवो गुरुः ॥ १५ ॥
‘युद्धस्थलमें अत्यन्त बलवान् नरेशोंको सारथि, रथ और हाथियोंसहित शत्रुओंद्वारा मारा गया देखकर भी महान् अस्त्रवेत्ता ब्राह्मणशिरोमणि आचार्य द्रोणने रणभूमिमें समस्त शत्रुओंका वध क्यों नहीं कर डाला? ॥
स संस्मरन् द्रोणमहं महाहवे
ब्रवीमि सत्यं कुरवो निबोधत।
न वा मदन्यः प्रसहेद् रणेऽर्जुनं
समागतं मृत्युमिवोग्ररूपिणम् ॥ १६ ॥
‘अतः महासमरमें मारे गये द्रोणाचार्यका स्मरण करके मैं सत्य कहता हूँ, कौरवो! तुमलोग ध्यान देकर सुनो। मेरे सिवा दूसरा कोई रणभूमिमें अर्जुनका वेग नहीं सह सकता। वे सामने आये हुए भयानक रूपधारी मृत्युके समान हैं॥ १६॥
शिक्षाप्रमादश्च बलं धृतिश्च
द्रोणे महास्त्राणि च संनतिश्च।
स चेदगान्मृत्युवशं महात्मा
सर्वानन्यानातुरानद्य मन्ये ॥ १७ ॥
‘शिक्षा, सावधानी, बल, धैर्य, महान् अस्त्र और विनय—ये सभी सद्गुण द्रोणाचार्यमें विद्यमान थे। वे महात्मा द्रोण भी यदि मृत्युके वशमें पड़ गये तो अन्य सब लोगोंको भी मैं मरणासन्न ही समझता हूँ॥ १७॥
नेह ध्रुवं किंचिदपि प्रचिन्तयन् विद्यां लोके कर्मणो नित्ययोगात् । सूर्योदये को हि विमुक्तसंशयो भावं कुर्वीताद्य गुरौ निपातिते ॥ १८ ॥ ‘बहुत सोचनेपर भी मैं कर्म-सम्बन्धकी अनित्यताके कारण इस लोकमें किसी भी वस्तुको नित्य नहीं मानता। जब आचार्य द्रोण भी मार दिये गये, तब कौन संदेहरहित होकर आगामी सूर्योदयतक जीवित रहनेका दृढ़ विश्वास कर सकता है? ॥ १८ ॥
न नूनमस्त्राणि बलं पराक्रमः क्रियाः सुनीतं परमायुधानि वा । अलं मनुष्यस्य सुखाय वर्तितुं तथा हि युद्धे निहतः परैर्गुरुः ॥ १९ ॥ ‘निश्चय ही अस्त्र, बल, पराक्रम, क्रिया, अच्छी नीति अथवा उत्तम आयुध आदि किसी मनुष्यको सुख पहुँचानेके लिये पर्याप्त नहीं हैं; क्योंकि इन सब साधनोंके होते हुए भी आचार्यको शत्रुओंने युद्धमें मार डाला है ॥ १९ ॥
हुताशनादित्यसमानतेजसं पराक्रमे विष्णुपुरन्दरोपमम् । नये बृहस्पत्युशनोः सदा समं न चैनमस्त्रं तदुपास्त दुःसहम् ॥ २० ॥ ‘अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी, विष्णु और इन्द्रके समान पराक्रमी तथा सदा बृहस्पति और शुक्राचार्यके समान नीतिमान् इन गुरुदेवको बचानेके लिये इनके दुःसह अस्त्र आदि पास न आ सके अर्थात् उनकी रक्षा नहीं कर सके ॥ २० ॥
सम्प्राक्रुष्टे रुदितस्त्रीकुमारे पराभूते पौरुषे धार्तराष्ट्रे । मया कृत्यमिति जानामि शल्य प्रयाहि तस्माद् द्विषतामनीकम् ॥ २१ ॥ ‘शल्य! (द्रोणाचार्यके मारे जानेपर) जब सब ओर त्राहि-त्राहिकी पुकार हो रही है, स्त्रियाँ और बच्चे बिलख-बिलखकर रो रहे हैं तथा दुर्योधनका पुरुषार्थ दब गया है, ऐसे समयमें दुर्योधनको मेरी सहायताकी विशेष आवश्यकता है। मैं अपने इस कर्तव्यको अच्छी तरह समझता हूँ। इसलिये तुम शत्रुओंकी सेनाकी ओर चलो ॥ २१ ॥
यत्र राजा पाण्डवः सत्यसंधो व्यवस्थितो भीमसेनार्जुनौ च । वासुदेवः सात्यकिः सृञ्जयाश्च यमौ च कस्तान् विषहेन्मदन्यः ॥ २२ ॥
‘जहाँ सत्यप्रतिज्ञ पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े हैं, जहाँ भीमसेन, अर्जुन, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण, सात्यकि, सृंजय वीर तथा नकुल और सहदेव डटे हुए हैं, वहाँ मेरे सिवा दूसरा कौन उन वीरोंका वेग सह सकता है? ।। २२ ।। तस्मात् क्षिप्रं मद्रपते प्रयाहि रणे पञ्चालान् पाण्डवान् सृञ्जयांश्च । तान् वा हनिष्यामि समेत्य संख्ये यास्यामि वा द्रोणपथा यमाय ।। २३ ।। ‘इसलिये मद्रराज! तुम शीघ्र ही रणभूमिमें पांचाल, पाण्डव तथा सृंजय वीरोंकी ओर रथ ले चलो। आज युद्धस्थलमें उन सबके साथ भिड़कर या तो उन्हें ही मार डालूँगा या स्वयं ही द्रोणाचार्यके मार्गसे यमलोक चला जाऊँगा ।। २३ ।। न त्वेवाहं न गमिष्यामि मध्ये तेषां शूराणामिति मां शल्य विद्धि । मित्रद्रोहो मर्षणीयो न मेऽयं त्यक्त्वा प्राणाननुयास्यामि द्रोणम् ।। २४ ।। ‘शल्य! मैं उन शूरवीरोंके बीचमें नहीं जाऊँगा, ऐसा मुझे न समझो; क्योंकि संग्रामसे पीछे हटनेपर मित्रद्रोह होगा और यह मित्रद्रोह मेरे लिये असह्य है। इसलिये मैं प्राणोंका परित्याग करके द्रोणाचार्यका ही अनुसरण करूँगा ।। २४ ।। प्राज्ञस्य मूढस्य च जीवितान्ते नास्ति प्रमोक्षोऽन्तकसत्कृतस्य । अतो विद्वन्नभियास्यामि पार्थान् दिष्टं न शक्यं व्यतिवर्तितुं वै ।। २५ ।। ‘विद्वान् हो या मूर्ख, आयुकी समाप्ति होनेपर सभीका यमराजके द्वारा यथायोग्य सत्कार होता है। उससे किसीको छुटकारा नहीं मिलता। अतः विद्वन्! मैं कुन्तीके पुत्रोंपर अवश्य चढ़ाई करूँगा। निश्चय ही दैवके विधानको कोई पलट नहीं सकता ।। २५ ।। कल्याणवृत्तः सततं हि राजा वैचित्रवीर्यस्य सुतो ममासीत् । तस्यार्थसिद्ध्यर्थमहं त्यजामि प्रियान् भोगान् दुस्त्यजं जीवितं च ।। २६ ।। ‘धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन सदा ही मेरे कल्याण-साधनमें तत्पर रहा है; अतः आज उसके मनोरथकी सिद्धिके लिये मैं अपने प्रिय भोगोंको और जिसे त्यागना अत्यन्त कठिन है, उस जीवनको भी त्याग दूँगा ।। २६ ।। वैयाघ्रचर्माणमकूजनाक्षं हैमत्रिकोषं रजतत्रिवेणुम् ।
रथप्रबर्हं तुरगप्रबर्है- र्युक्तं प्रादान्मह्यमिमं हि रामः ॥ २७ ॥ ‘गुरुवर परशुरामजीने मुझे यह व्याघ्रचर्मसे आच्छादित और उत्तम अश्वोंसे जुता हुआ श्रेष्ठ रथ प्रदान किया है। इसमें तीन सुवर्णमय कोष और रजतमय त्रिवेणु सुशोभित हैं। इसके धुरों और पहियोंसे कोई आवाज नहीं निकलती है ॥ २७ ॥ धनूंषि चित्राणि निरीक्ष्य शल्य ध्वजान् गदाः सायकांश्चोग्ररूपान् । असिं च दीप्तं परमायुधं च शङ्खं च शुभ्रं स्वनवन्तमुग्रम् ॥ २८ ॥ ‘शल्य! तत्पश्चात् उन्होंने भलीभाँति इस रथका निरीक्षण करके बहुत-से विचित्र धनुष, भयंकर बाण, ध्वज, गदा, खड्ग, चमचमाते हुए उत्तम आयुध तथा गम्भीर ध्वनिसे युक्त भयंकर श्वेत शंख भी दिये थे ॥ २८ ॥ पताकिनं वज्रनिपातनिःस्वनं सिताश्वयुक्तं शुभतूणशोभितम् । इमं समास्थाय रथं रथर्षभं रणे हनिष्याम्यहमर्जुनं बलात् ॥ २९ ॥ ‘यह रथ सब रथोंसे उत्तम है। इसमें पताकाएँ फहरा रही हैं, सफेद घोड़े जुते हुए हैं और सुन्दर तरकस इसकी शोभा बढ़ाते हैं। चलते समय इस रथकी धमकसे वज्रपातके समान शब्द होता है। मैं इस रथपर बैठकर रणभूमिमें अर्जुनको बलपूर्वक मार डालूँगा ॥ २९ ॥ तं चेन्मृत्युः सर्वहरोऽभिरक्षेत् सदाप्रमत्तः समरे पाण्डुपुत्रम् । तं वा हनिष्यामि रणे समेत्य यास्यामि वा भीष्ममुखो यमाय ॥ ३० ॥ ‘यदि सबका संहार करनेवाली मृत्यु सदा सावधान रहकर समरांगणमें पाण्डुपुत्र अर्जुनकी रक्षा करे तो रणक्षेत्रमें उससे भी भिड़कर या तो मैं उसे ही मार डालूँगा या स्वयं ही भीष्मके सम्मुख यमलोकको चला जाऊँगा ॥ ३० ॥ यमवरुणकुबेरवासवा वा यदि युगपत्सगणा महाहवे । जुगुपिषव इहैत्य पाण्डवं किमु बहुना सह तैर्जयामि तम् ॥ ३१ ॥ ‘अधिक कहनेसे क्या लाभ? यदि इस महासमरमें अपने गणोंसहित यम, वरुण, कुबेर और इन्द्र भी एक साथ आकर यहाँ पाण्डुपुत्र अर्जुनकी रक्षा करना चाहें तो मैं उन सबके
साथ ही उन्हें जीत लूँगा' ।। ३१ ।।
संजय उवाच
इति रणरभसस्य कत्थत- स्तदुत निशम्य वचः स मद्रराट् । अवहसदवमन्य वीर्यवान् प्रतिषिषिधे च जगाद चोत्तरम् ।। ३२ ।।
**संजय कहते हैं—**राजन्! पराक्रमी मद्रराज शल्य युद्धके उत्साहमें भरकर बढ़-बढ़कर बातें बनानेवाले कर्णके उस कथनको सुनकर उसकी अवहेलना करके उपहास करने लगे। उन्होंने फिर ऐसी बातें कहनेसे कर्णको रोका और इस प्रकार उत्तर दिया ।। ३२ ।।
शल्य उवाच
विरम विरम कर्ण कत्थना- दतिरभसोऽप्यतिवाचमुक्तवान् । क्व च हि नरवरो धनंजयः क्व पुनरहो पुरुषाधमो भवान् ।। ३३ ।।
**शल्यने कहा—**कर्ण! बस, अब बढ़-बढ़कर बातें बनाना बंद करो, बंद करो। तुम अधिक जोशमें आकर अपनी शक्तिसे बहुत बड़ी बात कह गये। भला, कहाँ नरश्रेष्ठ अर्जुन और कहाँ मनुष्योंमें अधम तुम? ।। ३३ ।।
यदुसदनमुपेन्द्रपालितं
त्रिदशमिवामरराजरक्षितम् ।
प्रसभमतिविलोद्य को हरेत्
पुरुषवरावरजामृतेऽर्जुनात् ॥ ३४ ॥
बताओ तो सही, अर्जुनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर है, जो साक्षात् विष्णु भगवान्से सुरक्षित यदुवंशियोंकी पुरीको, जिसकी उपमा देवराज इन्द्रद्वारा पालित देवनगरी अमरावतीसे दी जाती है, बलपूर्वक मथकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी छोटी बहिन सुभद्राका अपहरण कर सके ॥
त्रिभुवनविभुमीश्वरेश्वरं
क इह पुमान् भवमाह्वयेद् युधि ।
मृगवधकलहे ऋतेऽर्जुनात्
सुरपतिवीर्यसमप्रभावतः ॥ ३५ ॥
देवराज इन्द्रके समान बल और प्रभाव रखनेवाले अर्जुनको छोड़कर इस संसारमें दूसरा कौन ऐसा वीर पुरुष है, जो एक वन्य पशुको मारनेके विषयमें उठे हुए विवादके