भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1842

यो हन्यात् समरे क्रुद्धो वज्रहस्तं पुरंदरम् । 'जो कुपित होनेपर वज्रधारी इन्द्रको भी समरभूमिमें मार डालनेकी शक्ति रखता है, उस महारथी वीर कर्णको पाण्डवलोग युद्धमें कैसे जीत लेंगे? ।। २१ १/२ ।। त्वं च सर्वास्त्रविद् वीरः सर्वविद्यास्त्रपारगः ।। २२ ।। बाहुवीर्येण ते तुल्यः पृथिव्यां नास्ति कश्चन । 'आप भी सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, समस्त विद्याओं तथा अस्त्रोंके पारंगत विद्वान् एवं वीर हैं। इस भूतलपर बाहुबलके द्वारा आपकी समानता करनेवाला कोई नहीं है ।। २२ १/२ ।। त्वं शल्यभूतः शत्रूणामविषह्यः पराक्रमे ।। २३ ।। ततस्त्वमुच्यसे राजन् शल्य इत्यरिसूदन । 'शत्रुसूदन नरेश! आप पराक्रम प्रकट करते समय शत्रुओंके लिये असह्य हो उठते हैं, उनके लिये आप शल्यभूत (कण्टकस्वरूप) हैं; इसीलिये आपको शल्य कहा जाता है ।। २३ १/२ ।। तव बाहुबलं प्राप्य न शेकुः सर्वसात्वताः ।। २४ ।। तव बाहुबलाद् राजन् किं नु कृष्णो बलाधिकः । 'राजन्! आपके बाहुबलको सामने पाकर सम्पूर्ण सात्वतवंशी क्षत्रिय कभी युद्धमें टिक न सके हैं। क्या आपके बाहुबलसे श्रीकृष्णका बल अधिक है? ।। २४ १/२ ।। यथा हि कृष्णेन बलं धार्यं वै फाल्गुने हते ।। २५ ।। तथा कर्णात्ययीभावे त्वया धार्यं महत् बलम् । 'जैसे अर्जुनके मारे जानेपर श्रीकृष्ण पाण्डव-सेनाकी रक्षा करेंगे, उसी प्रकार यदि कर्ण मारा गया तो आपको मेरी विशाल वाहिनीका संरक्षण करना होगा ।। किमर्थं समरे सैन्यं वासुदेवो नवारयत् ।। २६ ।। किमर्थं च भवान् सैन्यं न हनिष्यति मारिष । 'मान्यवर! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण क्यों कौरव-सेनाका निवारण करेंगे और क्यों आप पाण्डव-सेनाका वध नहीं करेंगे? ।। २६ १/२ ।। त्वत्कृते पदवीं गन्तुमिच्छेयं युधि मारिष । सोदराणां च वीराणां सर्वेषां च महीक्षिताम् ।। २७ ।। 'माननीय नरेश! मैं तो आपके ही भरोसे युद्धमें मारे गये अपने वीर भाइयों तथा समस्त राजाओंके (ऋणसे मुक्त होनेके लिये उन्हींके) पथपर चलनेकी इच्छा करता हूँ' ।। २७ १/२ ।।

<center>शल्य उवाच</center>

यन्मां ब्रवीषि गान्धारे अग्रे सैन्यस्य मानद । विशिष्टं देवकीपुत्रात् प्रीतिमानस्म्यहं त्वयि ।। २८ ।।