महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1841, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘महाबाहो! तुम रणक्षेत्रमें वैकर्तन कर्णका अपमान न करो। वह सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थका पारंगत विद्वान् है ।। १३१/२ ।।
यस्य ज्यातलनिर्घोषं श्रुत्वा भयंकरं महत् ।। १४ ।।
पाण्डवेयानि सैन्यानि विद्रवन्ति दिशो दश ।
‘यह वही वीर है जिसकी प्रत्यंचाकी अत्यन्त भयानक टंकार सुनकर पाण्डव-सेना दसों दिशाओंमें भागने लगती है ।। १४१/२ ।।
प्रत्यक्षं ते महाबाहो यथा रात्रौ घटोत्कचः ।। १५ ।।
मायाशतानि कुर्वाणो हतो मायापुरस्कृतः ।
‘महाबाहो! यह तो तुमने अपनी आँखों देखा था कि किस प्रकार उस दिन रातमें सैकड़ों मायाओंका प्रयोग करनेवाला मायावी घटोत्कच कर्णके हाथसे मारा गया ।। १५१/२ ।।
न चातिष्ठत बीभत्सुः प्रत्यनीके कथंचन ।। १६ ।।
एतांश्च दिवसान् सर्वान् भयेन महता वृतः ।
‘इन सारे दिनोंमें महान् भयसे घिरे हुए अर्जुन किसी तरह भी कर्णके सामने खड़े न हो सके थे ।। १६१/२ ।।
भीमसेनश्च बलवान् धनुष्कोट्याभिचोदितः ।। १७ ।।
उक्तश्च संज्ञया राजन् मूढ औदरिको यथा ।
‘राजन्! बलवान् भीमसेनको भी इसने अपने धनुषकी कोटिसे दबाकर युद्धके लिये प्रेरित किया था और उन्हें मूर्ख, पेटू आदि नामोंसे पुकारा था ।। १७१/२ ।।
माद्रीपुत्रौ तथा शूरौ येन जित्वा महारणे ।। १८ ।।
कमप्यर्थं पुरस्कृत्य न हतौ युधि मारिष ।
‘मान्यवर! इसने महासमरमें शूरवीर नकुल-सहदेवको भी परास्त करके किसी विशेष प्रयोजनको सामने रखकर उन दोनोंको युद्धमें मार नहीं डाला ।।
येन वृष्णिप्रवीरस्तु सात्यकिः सात्वतां वरः ।। १९ ।।
निर्जित्य समरे शूरो विरथश्च बलात् कृतः ।
‘इसने वृष्णिवंशके प्रमुख वीर सात्वतशिरोमणि शूरवीर सात्यकिको समरांगणमें परास्त करके उन्हें बलपूर्वक रथहीन कर दिया था ।। १९१/२ ।।
सृञ्जयाश्चेतरे सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।। २० ।।
असकृन्निर्जिताः संख्ये स्मयमानेन संयुगे ।
‘इसके सिवा धृष्टद्युम्न आदि समस्त सृञ्जयोको भी इसने युद्धस्थलमें हँसते-हँसते अनेक बार परास्त किया है ।। २०१/२ ।।
तं कथं पाण्डवा युद्धे विजेष्यन्ति महारथम् ।। २१ ।।