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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

उस श्रेष्ठ रथमें सूर्य और चन्द्रमाको दोनों पहिये बनाकर सुन्दर रात्रि और दिनको वहाँ पूर्वपक्ष और अपरपक्षके रूपमें प्रतिष्ठित किया ।। २७ ।।

दश नागपतीनीषां धृतराष्ट्रमुखांस्तदा ।
योक्त्राणि चक्रुर्नागांश्च निःश्वसन्तो महोरगान् ।। २८ ।।
धृतराष्ट्र आदि दस नागराजोंको भी ईषादण्डमें ही स्थान दिया। फुफकारते हुए बड़े-बड़े सर्पोंको उस रथके जोत बनाये ।। २८ ।।

द्यां युगं युगचर्माणि संवर्तकबलाहकान् ।
कालपृष्ठोऽथ नहुषः कर्कोटकधनंजयौ ।। २९ ।।
इतरे चाभवन् नागा हयानां बालबन्धनाः ।
दिशश्च प्रदिशश्चैव रश्मयो रथवाजिनाम् ।। ३० ।।
द्युलोकको भी जूएमें ही स्थान दिया। प्रलयकालके मेघोंको युगचर्म बनाया। कालपृष्ठ, नहुष, कर्कोटक, धनंजय तथा दूसरे-दूसरे नाग घोड़ोंके केसर बाँधनेकी रस्सी बनाये गये। दिशाओं और विदिशाओंने रथमें जुते हुए घोड़ोंकी बागडोरका भी रूप धारण किया ।। २९-३० ।।

संध्यां धृतिं च मेधां च स्थितिं संनतिमेव च ।
ग्रहनक्षत्रताराभिश्चर्म चित्रं नभस्तलम् ।। ३१ ।।
संध्या, धृति, मेधा, स्थिति और संनतिसहित आकाशको, जो ग्रह, नक्षत्र और तारोंसे विचित्र शोभा धारण करता है, चर्म (रथका ऊपरी आवरण) बनाया ।। ३१ ।।

सुराम्बुप्रेतवित्तानां पतींल्लोकैश्वरान् हयान् ।
सिनीवालीमनुमतिं कुहूं राकां च सुव्रताम् ।। ३२ ।।
योक्त्राणि चक्रुर्वाहानां रोहकांस्तत्र कण्टकान् ।
इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर—इन चार लोकपालोंको देवताओंने उस रथके घोड़े बनाये। सिनीवाली, अनुमति, कुहू तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली राका इनकी अधिष्ठात्री देवियोंको घोड़ोंके जोतेका रूप दिया और इनके अधिकारी देवताओंको घोड़ोंकी लगामोंके काँटे बनाया ।। ३२ १/२ ।।

धर्मः सत्यं तपोऽर्थश्च विहितास्तत्र रश्मयः ।। ३३ ।।
अधिष्ठानं मनश्चासीत् परिरथ्या सरस्वती ।
नानावर्णाश्च चित्राश्च पताकाः पवनेरिताः ।। ३४ ।।
विद्युदिन्द्रधनुर्नद्धं रथं दीप्तं व्यदीपयन् ।
धर्म, सत्य, तप और अर्थ—इनको वहाँ लगाम बनाया गया। रथकी आधारभूमि मन हुआ और सरस्वती देवी रथके आगे बढ़नेका मार्ग थीं। नाना रंगोंकी विचित्र पताकाएँ पवनसे प्रेरित होकर फहरा रही थीं, जो बिजली और इन्द्रधनुषसे बँधे हुए उस देदीप्यमान रथकी शोभा बढ़ाती थीं ।। ३३-३४ १/२ ।।

वषट्कारः प्रतोदोऽभूद् गायत्री शीर्षबन्धना ।। ३५ ।। वषट्कार घोड़ोंका चाबुक हुआ और गायत्री उस रथके ऊपरी भागकी बन्धन-रज्जु बनीं ।। ३५ ।। यो यज्ञे विहितः पूर्वमीशानस्य महात्मनः । संवत्सरो धनुस्तद् वै सावित्री ज्या महास्वना ।। ३६ ।। पूर्वकालमें जो महात्मा महादेवजीके यज्ञमें निर्मित हुआ था, वह संवत्सर ही उनके लिये धनुष बना और सावित्री उस धनुषकी महान् टंकार करनेवाली प्रत्यंचा बनी ।। ३६ ।। दिव्यं च वर्म विहितं महार्हं रत्नभूषितम् । अभेद्यं विरजस्कं वै कालचक्रबहिष्कृतम् ।। ३७ ।। महादेवजीके लिये एक दिव्य कवच तैयार किया गया जो बहुमूल्य, रत्नभूषित, रजोगुणरहित (अथवा धूलरहित स्वच्छ), अभेद्य तथा कालचक्रकी पहुँचसे परे था ।। ३७ ।। ध्वजयष्टिरभून्मेरुः श्रीमान् कनकपर्वतः । पताकाश्चाभवन् मेघास्तडिद्भिः समलङ्कृताः ।। ३८ ।। रेजुरध्वर्युमध्यस्था ज्वलन्त इव पावकाः । कान्तिमान् कनकमय मेरु पर्वत रथके ध्वजका दण्ड बना था। बिजलियोंसे विभूषित बादल ही पताकाओंका काम दे रहे थे, जो यजुर्वेदी ऋत्विजोंके बीचमें स्थित हुई अग्नियोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ।। ३८ १/२ ।। क्लृप्तं तु तं रथं दृष्ट्वा विस्मिता देवताऽभवन् ।। ३९ ।। सर्वलोकस्य तेजांसि दृष्ट्वैकस्थानि मारिष । युक्तं निवेदयामासुर्देवास्तस्मै महात्मने ।। ४० ।। मान्यवर! वह रथ क्या था, सम्पूर्ण जगत्के तेजका पुंज एकत्र हो गया था। उसे निर्मित हुआ देख सम्पूर्ण देवता आश्चर्यचकित हो उठे। फिर उन्होंने महात्मा महादेवजीसे यह निवेदन किया कि रथ तैयार है ।। ३९-४० ।। एवं तस्मिन् महाराज कल्पिते रथसत्तमे । देवैर्मनुजशार्दूल द्विषतामभिमर्दने ।। ४१ ।। स्वान्यायुधानि मुख्यानि न्यदधाच्छङ्करो रथे । ध्वजयष्टिं वियत् कृत्वा स्थापयामास गोवृषम् ।। ४२ ।। पुरुषसिंह! महाराज! इस प्रकार देवताओंद्वारा शत्रुओंका मर्दन करनेवाले उस श्रेष्ठ रथका निर्माण हो जानेपर भगवान् शंकरने उसके ऊपर अपने मुख्य-मुख्य अस्त्र-शस्त्र रख दिये और ध्वजदण्डको आकाशव्यापी बनाकर उसके ऊपर अपने वृषभ नन्दीको स्थापित कर दिया ।। ४१-४२ ।। ब्रह्मदण्डः कालदण्डो रुद्रदण्डस्तथा ज्वरः । परिस्कन्दा रथस्यासन् सर्वतोदिशमुद्यताः ।। ४३ ।।

तत्पश्चात् ब्रह्मदण्ड, कालदण्ड, रुद्रदण्ड तथा ज्वर—ये उस रथके पार्श्वरक्षक बनकर चारों ओर शस्त्र लेकर खड़े हो गये ॥ ४३ ॥ अथर्वाङ्गिरसावास्तां चक्ररक्षौ महात्मनः । ऋग्वेदः सामवेदश्च पुराणं च पुरःसराः ॥ ४४ ॥ अथर्वा और अंगिरा महात्मा शिवके उस रथके पहियोंकी रक्षा करने लगे। ऋग्वेद, सामवेद और समस्त पुराण उस रथके आगे चलनेवाले योद्धा हुए ॥ ४४ ॥ इतिहासयजुर्वेदौ पृष्ठरक्षौ बभूवतुः । दिव्या वाचश्च विद्याश्च परिपार्श्वचराः स्थिताः ॥ ४५ ॥ इतिहास और यजुर्वेद पृष्ठरक्षक हो गये तथा दिव्य वाणी और विद्याएँ पार्श्ववर्ती बनकर खड़ी हो गयीं ॥ ४५ ॥ स्तोत्रादयश्च राजेन्द्र वषट्कारस्तथैव च । ओंकारश्च मुखे राजन्नतिशोभाकरोऽभवत् ॥ ४६ ॥ राजेन्द्र! स्तोत्र-कवच आदि, वषट्कार तथा ओंकार—ये मुखभागमें स्थित होकर अत्यन्त शोभा बढ़ाने लगे ॥ ४६ ॥ विचित्रमृतुभिः षड्भिः कृत्वा संवत्सरं धनुः । छायामेवात्मनश्चक्रे धनुर्ज्यामक्षयां रणे ॥ ४७ ॥ छहों ऋतुओंसे युक्त संवत्सरको विचित्र धनुष बनाकर अपनी छायाको ही महादेवजीने उस धनुषकी प्रत्यंचा बनायी, जो रणभूमिमें कभी नष्ट होनेवाली नहीं थी ॥ ४७ ॥ कालो हि भगवान् रुद्रस्तस्य संवत्सरो धनुः । तस्माद् रौद्री कालरात्रिर्ज्या कृता धनुषोऽजरा ॥ ४८ ॥ भगवान् रुद्र ही काल हैं, अतः कालका अवयवभूत संवत्सर ही उनका धनुष हुआ। कालरात्रि भी रुद्रका ही अंश है, अतः उसीको उन्होंने अपने धनुषकी अटूट प्रत्यंचा बना लिया ॥ ४८ ॥ इषुश्चाप्यभवद् विष्णुर्ज्वलनः सोम एव च । अग्नीषोमौ जगत् कृत्स्नं वैष्णवं चोच्यते जगत् ॥ ४९ ॥ भगवान् विष्णु, अग्नि और चन्द्रमा—ये ही बाण हुए थे; क्योंकि सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोमका ही स्वरूप है। साथ ही सारा संसार वैष्णव (विष्णुमय) भी कहा जाता है ॥ ४९ ॥ विष्णुश्चात्मा भगवतो भवस्यामिततेजसः । तस्माद् धनुर्ज्यासंस्पर्शं न विषेहुर्हरस्य ते ॥ ५० ॥ अमिततेजस्वी भगवान् शंकरके आत्मा हैं विष्णु। अतः वे दैत्य भगवान् शिवके धनुषकी प्रत्यंचा एवं बाणका स्पर्श न सह सके ॥ ५० ॥ तस्मिन् शरे तिग्ममन्युं मुमोचासह्यमीश्वरः ।

भृग्वङ्गिरोमन्युभवं क्रोधाग्निमतिदुःसहम् ॥ ५१ ॥ महेश्वरने उस बाणमें अपने असह्य एवं प्रचण्ड कोपको तथा भृगु और अंगिराके रोषसे उत्पन्न हुई अत्यन्त दुःसह क्रोधाग्निको भी स्थापित कर दिया ॥ ५१ ॥

स नीललोहितो धूम्रः कृत्तिवासाभयंकरः । आदित्यायुतसंकाशस्तेजोज्वालावृतो ज्वलन् ॥ ५२ ॥ तत्पश्चात् धूम्रवर्ण, व्याघ्रचर्मधारी, देवताओंको अभय तथा दैत्योंको भय देनेवाले, सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी नीललोहित भगवान् शिव तेजोमयी ज्वालासे आवृत हो प्रकाशित होने लगे ॥ ५२ ॥

दुश्च्यावच्यावनो जेता हन्ता ब्रह्मद्विषां हरः । नित्यं त्राता च हन्ता च धर्माधर्माश्रितान् नरान् ॥ ५३ ॥ जिस लक्ष्यको मार गिराना अत्यन्त कठिन है, उसको भी गिरानेमें समर्थ, विजयशील, ब्रह्मद्रोहियोंके विनाशक भगवान् शिव धर्मका आश्रय लेनेवाले मनुष्योंकी सदा रक्षा और पापियोंका विनाश करनेवाले हैं ॥ ५३ ॥

प्रमाथिभिर्भीमबलैर्भीमरूपैर्मनोजवैः । विभाति भगवान् स्थाणुस्तैरेवात्मगुणैर्वृतः ॥ ५४ ॥ उनके जो अपने उपयोगमें आनेवाले रथ आदि गुणवान् उपकरण थे, वे शत्रुओंको मथ डालनेमें समर्थ, भयानक बलशाली, भयंकररूपधारी और मनके समान वेगवान् थे। उनसे घिरे हुए भगवान् शिवकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥

तस्याङ्गानि समाश्रित्य स्थितं विश्वमिदं जगत् । जङ्गमाजङ्गमं राजन् शुशुभेऽद्भुतदर्शनम् ॥ ५५ ॥ राजन्! उनके पंचभूतस्वरूप अंगोंका आश्रय लेकर ही यह अद्भुत दिखायी देनेवाला सारा चराचर जगत् स्थित एवं सुशोभित है ॥ ५५ ॥

दृष्ट्वा तु तं रथं युक्तं कवची स शरासनी । बाणमादाय तं दिव्यं सोमविष्ण्वग्निसम्भवम् ॥ ५६ ॥ उस रथको जुता हुआ देख भगवान् शंकर कवच और धनुषसे युक्त हो चन्द्रमा, विष्णु और अग्निसे प्रकट हुए उस दिव्य बाणको लेकर युद्धके लिये उद्यत हुए ॥ ५६ ॥

तस्य राजंस्तदा देवाः कल्पयाञ्चक्रिरे प्रभो । पुण्यगन्धवहं राजन् श्वसनं देवसत्तमम् ॥ ५७ ॥ राजन्! प्रभो! उस समय देवताओंने पवित्र सुगन्ध वहन करनेवाले देवश्रेष्ठ वायुको उनके लिये हवा करनेके कामपर नियुक्त किया ॥ ५७ ॥

तमास्थाय महादेवस्त्रासयन् दैवतान्यपि । आरुरोह तदा यत्तः कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ ५८ ॥

तब महादेवजी दानवोंके वधके लिये प्रयत्नशील हो देवताओंको भी डराते और पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से उस रथको थामकर उसपर चढ़ने लगे ॥ ५८ ॥ तमारुरुक्षुं देवेशं तुष्टुवुः परमर्षयः । गन्धर्वा दैवसङ्घाश्च तथैवाप्सरसां गणाः ॥ ५९ ॥ देवेश्वर शिव रथपर चढ़ना चाहते हैं, यह देखकर महर्षियों, गन्धर्वों, देवसमूहों तथा अप्सराओंके समुदायोंने उनकी स्तुति की ॥ ५९ ॥ ब्रह्मर्षिभिः स्तूयमानो वन्द्यमानश्च वन्दिभिः । तथैवाप्सरसां वृन्दैर्नृत्यद्भिर्नृत्यकोविदैः ॥ ६० ॥ स शोभमानो वरदः खड्गी बाणी शरासनी । हसन्निवाब्रवीद् देवान् सारथिः को भविष्यति ॥ ६१ ॥ ब्रह्मर्षियोंद्वारा प्रशंसित, वन्दीजनोंद्वारा वन्दित तथा नाचती हुई नृत्य-कुशल अप्सराओंसे सुशोभित होते हुए वरदायक भगवान् शिव खड्ग, बाण और धनुष ले देवताओंसे हँसते हुए-से बोले—‘मेरा सारथि कौन होगा?’ ॥ ६०-६१ ॥ तमब्रुवन् देवगणा यं भवान् संनियोक्ष्यते । स भविष्यति देवेश सारथिस्ते न संशयः ॥ ६२ ॥ यह सुनकर देवताओंने उनसे कहा—‘देवेश! आप जिसको इस कार्यमें नियुक्त करेंगे, वही आपका सारथि होगा, इसमें संशय नहीं है’ ॥ ६२ ॥ तानब्रवीत् पुनर्देवो मत्तः श्रेष्ठतरो हि यः । तं सारथिं कुरुध्वं मे स्वयं संचिन्त्य मा चिरम् ॥ ६३ ॥ तब महादेवजीने फिर कहा—‘तुमलोग स्वयं ही सोच-विचारकर जो मुझसे भी श्रेष्ठतर हो, उसे मेरा सारथि बना दो, विलम्ब न करो’ ॥ ६३ ॥ एतच्छ्रुत्वा ततो देवा वाक्यमुक्तं महात्मना । गत्वा पितामहं देवाः प्रसाद्येदं वचोऽब्रुवन् ॥ ६४ ॥ उन महात्माके कहे हुए इस वचनको सुनकर सब देवता ब्रह्माजीके पास गये और उन्हें प्रसन्न करके इस प्रकार बोले— ॥ ६४ ॥ यथा त्वत्कथितं देव त्रिदशारिविनिग्रहे । तथा च कृतमस्माभिः प्रसन्नो नो वृषध्वजः ॥ ६५ ॥ ‘देव! देवशत्रुओंका दमन करनेके विषयमें आपने जैसा कहा था, वैसा ही हमने किया है। भगवान् शंकर हमलोगोंपर प्रसन्न हैं’ ॥ ६५ ॥ रथश्च विहितोऽस्माभिर्विचित्रायुधसंवृतः । सारथिं च न जानीमः कः स्यात् तस्मिन् रथोत्तमे ॥ ६६ ॥ ‘हमने उनके लिये विचित्र आयुधोंसे सम्पन्न रथ तैयार कर दिया है; परंतु उस उत्तम रथपर कौन सारथि होकर बैठेगा? यह हम नहीं जानते हैं’ ॥ ६६ ॥

तस्माद् विधीयतां कश्चित् सारथिर्देवसत्तम ।
सफलां तां गिरं देव कर्तुमर्हसि नो विभो ॥ ६७ ॥
‘अतः देवश्रेष्ठ प्रभो! आप किसीको सारथि बनाइये। देव! आपने हमें जो वचन दिया है, उसे सफल कीजिये ॥

एवमस्मासु हि पुरा भगवन्नुक्तवानसि ।
हितकर्तास्मि भवतामिति तत् कर्तुमर्हसि ॥ ६८ ॥
‘भगवन्! आपने पहले हमलोगोंसे कहा था कि ‘मैं तुमलोगोंका हित करूँगा।’ अतः उसे पूर्ण कीजिये ॥

स देव युक्तो रथसत्तमो नो
दुराधरो द्रावणः शात्रवाणाम् ।
पिनाकपाणिर्विहितोऽत्र योद्धा
विभीषयन् दानवानुद्यतोऽसौ ॥ ६९ ॥
‘देव! हमारा तैयार किया हुआ वह श्रेष्ठ रथ शत्रुओंको मार भगानेवाला और दुर्धर्ष है। पिनाकपाणि भगवान् शंकरको उसपर योद्धा बनाकर बैठा दिया गया है और वे दानवोंको भयभीत करते हुए युद्धके लिये उद्यत हैं ॥ ६९ ॥

तथैव वेदाश्चतुरो हयाग्र्या
धरा सशैला च रथो महात्मनः ।
नक्षत्रवंशानुगतो वरूथी
हरो योद्धा सारथिर्नाभिलक्ष्यः ॥ ७० ॥
‘इसी प्रकार चारों वेद उन महात्माके उत्तम घोड़े हैं और पर्वतोंसहित पृथ्वी उनका उत्तम रथ बनी हुई है। नक्षत्रसमुदायरूपी ध्वजसे युक्त तथा आवरणसे सुशोभित भगवान् शिव उस रथपर रथी योद्धा बनकर बैठे हुए हैं; परंतु कोई सारथि नहीं दिखायी देता ॥ ७० ॥

तत्र सारथिरेष्टव्यः सर्वैरेतैर्विशेषवान् ।
तत्प्रतिष्ठो रथो देव हया योद्धा तथैव च ॥ ७१ ॥
‘देव! उस रथके लिये ऐसे सारथिका अनुसंधान करना चाहिये जो इन सबसे बढ़कर हो; क्योंकि रथ, घोड़े और योद्धा इन सबकी प्रतिष्ठा सारथिपर ही निर्भर है ॥ ७१ ॥

कवचानि सशस्त्राणि कार्मुकं च पितामह ।
त्वामृते सारथिं तत्र नान्यं पश्यामहे वयम् ॥ ७२ ॥
त्वं हि सर्वगुणैर्युक्तो दैवतेभ्योऽधिकः प्रभो ।
‘पितामह! कवच, शस्त्र और धनुषकी सफलता भी सारथिपर ही निर्भर है। हमलोग आपके सिवा दूसरे किसीको वहाँ सारथि होनेके योग्य नहीं देखते हैं। प्रभो! क्योंकि आप सभी देवताओंसे श्रेष्ठ और सर्वगुणसम्पन्न हैं ॥ ७२ ३/२ ॥

(त्वं देव शक्तो लोकेऽस्मिन् नियन्तुं प्रद्रुतानिमान् । वेदाश्वांस् चोपनिषदः सारथिर्भव नः स्वयम् ॥ ‘देव! आप ही इस जगत्में इन भागते हुए उपनिषत्सहित वेदरूपी अश्वोंको नियन्त्रणमें रख सकते हैं; अतः आप स्वयं ही सारथि हो जाइये। योद्धुं बलेन सत्त्वेन वीर्येण विनयेन च । अधिकः सारथिः कार्यो नास्ति चान्दोऽधिको भवात् ॥ ‘बल, धैर्य, पराक्रम और विनय इन सभी गुणोंद्वारा जो रथीसे भी श्रेष्ठ हो, उसे ही युद्धके लिये सारथि बनाना चाहिये; दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो भगवान् शंकरसे भी बढ़कर हो। स भवांस्तारयत्वस्मान् कुरु सारथ्यमव्ययम् । भवानभ्यधिकस्त्वत्तो नान्योऽस्तीह पितामह ॥ ‘पितामह! आप अक्षय सारथिकर्म कीजिये और हमें इस संकटसे उबारिये। आप ही सबसे श्रेष्ठ हैं; आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। त्वं हि देवेश सर्वैस्तु विशिष्टो वदतां वर ।) स रथं तूर्णमारुह्य संयच्छ परमान् हयान् ॥ ७३ ॥ जयाय त्रिदिवेशानां वधाय त्रिदशद्विषाम् । ‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वर! आप सभी गुणोंसे श्रेष्ठ हैं; इसलिये देवद्रोहियोंके वध और देवताओंकी विजयके लिये तुरंत रथपर आरूढ़ होकर इन उत्तम घोड़ोंको काबूमें रखिये ।। ७३ ।। (तव प्रसादाद् वध्येरन् देव दैवतकण्टकाः । स नो रक्ष महाबाहो दैत्येभ्यो महतो भयात् ।। ‘देव! आपके प्रसादसे देवताओंके लिये यह कण्टकरूप दैत्य मारे जायँगे। महाबाहो! आप दैत्योंके महान् भयसे हमारी रक्षा करें। त्वं हि नो गतिरव्यग्र त्वं नो गोप्ता महाव्रत । त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे पूज्यन्ते त्रिदिवे प्रभो ॥) ‘व्यग्रताशून्य महान् व्रतधारी प्रभो! आप ही हमारे आश्रय तथा संरक्षक हैं; आपकी कृपासे ही समस्त देवता स्वर्गलोकमें पूजित होते हैं’। इति ते शिरसा गत्वा त्रिलोकेशं पितामहम् ।। ७४ ।। देवाः प्रसादयामासुः सारथ्यायेति नः श्रुतम् । इस प्रकार देवताओंने तीनों लोकोंके ईश्वर पितामह ब्रह्माजीके आगे मस्तक टेककर उन्हें सारथि बननेके लिये प्रसन्न किया। यह बात हमारे सुननेमें आयी है ।। ७४ १/२ ।।

पितामह उवाच

नात्र किंचिन्मृषा वाक्यं यदुक्तं त्रिदिवौकसः ।। ७५ ।।
संयच्छामि हयानेष युध्यतो वै कपर्दिनः ।
**पितामह बोले—**देवताओ! तुमने जो कुछ कहा है, उसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। मैं युद्ध करते समय भगवान् शंकरके घोड़ोंको काबूमें रखूँगा ।। ७५½ ।।

ततः स भगवान् देवो लोकस्रष्टा पितामहः ।। ७६ ।।
(एवमुक्त्वा जटाभारं संयम्य प्रपितामहः ।
परिधायाजिनं गाढं संन्यस्य च कमण्डलुम् ।।
प्रतोदपाणिर्भगवानारुरोह रथ तदा ।)
तदनन्तर लोकस्रष्टा भगवान् पितामह देवने जो जगत्के प्रपितामह हैं, उपर्युक्त बात कहकर अपनी जटाओंके बोझको बाँध लिया और मृगचर्मके वस्त्रको अच्छी तरह कसकर कमण्डलुको अलग रख दिया। तत्पश्चात् वे भगवान् ब्रह्मा हाथमें चाबुक लेकर तत्काल उस रथपर जा चढ़े ।। ७६ ।।

सारथ्ये कल्पितो देवैरीशानस्य महात्मनः ।
तस्मिन्नारोहति क्षिप्रं स्यन्दने लोकपूजिते ।। ७७ ।।
शिरोभिरगमन् भूमिं ते हया वातरंहसः ।
इस प्रकार देवताओंने भगवान् शंकरके सारथिके पदपर उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया। जब उस लोकपूजित रथपर ब्रह्माजी चढ़ रहे थे, उस समय वायुके समान वेगशाली घोड़े धरतीपर माथा टेककर बैठ गये थे ।। ७७½ ।।

आरुह्य भगवान् देवो दीप्यमानः स्वतेजसा ।। ७८ ।।
अभीषून् हि प्रतोदं च संजग्राह पितामहः ।
अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए भगवान् ब्रह्माने रथारूढ़ होकर घोड़ोंकी बागडोर और चाबुक दोनों वस्तुएँ अपने हाथमें ले लीं ।। ७८½ ।।

तत उत्थाप्य भगवांस्तान् हयाननिलोपमान् ।। ७९ ।।
बभाषे च तदा स्थाणुमारोहेति सुरोत्तमः ।
तत्पश्चात् वायुके समान तीव्रगतिवाले उन घोड़ोंको उठाकर सुरश्रेष्ठ भगवान् ब्रह्माने महादेवजीसे कहा—'अब आप रथपर आरूढ़ होइये' ।। ७९½ ।।

ततस्तमिषुमादाय विष्णुसोमाग्निसम्भवम् ।। ८० ।।
आरुरोह तदा स्थाणुर्धनुषा कम्पयन् परान् ।
तब विष्णु, चन्द्रमा और अग्निसे उत्पन्न हुए उस बाणको हाथमें लेकर महादेवजी अपने धनुषके द्वारा शत्रुओंको कम्पित करते हुए उस रथपर चढ़ गये ।। ८०½ ।।

तमारूढं तु देवेशं तुष्टुवुः परमर्षयः ।। ८१ ।।
गन्धर्वा देवसंघाश्च तथैवाप्सरसां गणाः ।

रथपर आरूढ़ हुए देवेश्वर शिवकी महर्षियों, गन्धर्वों, देवसमूहों तथा अप्सराओंके समुदायोंने स्तुति की॥ ८१ ½ ॥ स शोभमानो वरदः खड्गी बाणी शरासनी ॥ ८२ ॥ प्रदीपयन् रथे तस्थौ त्रीँल्लोकान् स्वेन तेजसा। खड्ग, धनुष और बाण लेकर शोभा पाते हुए वरदायक महादेवजी अपने तेजसे तीनों लोकोंको प्रकाशित करते हुए रथपर स्थित हो गये॥ ८२ ½ ॥ ततो भूयोऽब्रवीद् देवो देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ८३ ॥ न हन्यादिति कर्तव्यो न शोको वः कथञ्चन। हतानित्येव जानीत बाणेनानेन चासुरान् ॥ ८४ ॥ तब महादेवजीने पुनः इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—'शायद ये दैत्योंको न मारें' ऐसा समझकर तुम्हें किसी प्रकार भी शोक नहीं करना चाहिये। तुमलोग असुरोंको इस बाणसे 'मरा हुआ' ही समझो'॥ ८३-८४॥ ते देवाः सत्यमित्याहुर्निहता इति चाब्रुवन्। न च तद् वचनं मिथ्या यदाह भगवान् प्रभुः ॥ ८५ ॥ इति संचिन्त्य वै देवाः परां तुष्टिमवाप्नुवन्। यह सुनकर उन देवताओंने कहा—'प्रभो! आपका कथन सत्य है। अवश्य ही वे दैत्य मारे गये। शक्तिशाली भगवान् जो कुछ कह रहे हैं, वह वचन मिथ्या नहीं हो सकता' यह सोचकर देवताओंको बड़ा संतोष हुआ॥ ८५ ½ ॥ ततः प्रयातो देवेशः सर्वैर्देवगणैर्वृतः ॥ ८६ ॥ रथेन महता राजन्नुपमा नास्ति यस्य ह। राजन्! तदनन्तर जिसकी कहीं उपमा नहीं थी, उस विशाल रथके द्वारा देवेश्वर महादेवजी समस्त देवताओंसे घिरे हुए वहाँसे चल दिये॥ ८६ ½ ॥ स्वैश्च पारिषदैर्देवः पूज्यमानो महायशाः ॥ ८७ ॥ नृत्यद्भिरपरैश्चैव मांसभक्षैर्दुरासदैः। धावमानैः समन्ताच्च तर्जमानैः परस्परम् ॥ ८८ ॥ उस समय उनके अपने पार्षद भी महायशस्वी महादेवजीकी पूजा कर रहे थे। शिवके वे दुर्धर्ष पार्षद नृत्य करते और परस्पर एक-दूसरेको डाँटते हुए चारों ओर दौड़ लगाते थे। अन्य कितने ही पार्षद (भूत-प्रेतादि) मांसभक्षी थे॥ ८७-८८॥ ऋषयश्च महाभागास्तपोयुक्ता महागुणाः। आशंसुर्वे जना देवा महादेवस्य सर्वशः ॥ ८९ ॥ महान् भाग्यशाली और उत्तम गुणसम्पन्न तपस्वी ऋषियों, देवताओं तथा अन्य लोगोंने भी सब प्रकारसे महादेवजीकी विजयके लिये शुभाशंसा की॥ ८९॥ एवं प्रयाते देवेशे लोकानामभयंकरे।

तुष्टमासीज्जगत् सर्वं देवताश्च नरोत्तम ॥ ९० ॥ नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण लोकोंको अभय देनेवाले देवेश्वर महादेवजीके इस प्रकार प्रस्थान करनेपर सारा जगत् संतुष्ट हो गया। देवता भी बड़े प्रसन्न हुए ॥ ९० ॥ ऋषयस्तत्र देवेशं स्तुवन्तो बहुभिः स्तवैः । तेजश्चास्मै वर्धयन्तो राजन्नासन् पुनः पुनः ॥ ९१ ॥ राजन्! ऋषिगण नाना प्रकारके स्तोत्रोंका पाठ करके देवेश्वर महादेवकी स्तुति करते हुए बारंबार उनका तेज बढ़ा रहे थे ॥ ९१ ॥ गन्धर्वाणां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । वादयन्ति प्रयाणेऽस्य वाद्यानि विविधानि च ॥ ९२ ॥ उनके प्रस्थानके समय सहस्रों, लाखों और अरबों गन्धर्व नाना प्रकारके बाजे बजा रहे थे ॥ ९२ ॥ ततोऽधिरूढे वरदे प्रयाते चासुरान् प्रति । साधु साध्विति विश्वेशः स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ ९३ ॥ रथपर आरूढ़ हो वरदायक भगवान् शंकर जब असुरोंकी ओर चले, तब वे विश्वनाथ ब्रह्माजीको साधुवाद देते हुए मुसकराकर बोले— ॥ ९३ ॥ याहि देव यतो दैत्याश्चोदयाश्वानतन्द्रितः । पश्य बाह्वोर्बलं मेऽद्य निघ्नतः शात्रवान् रणे ॥ ९४ ॥ 'देव! जिस ओर दैत्य हैं, उधर ही चलिये और सावधान होकर घोड़ोंको हाँकिये। आज रणभूमिमें जब मैं शत्रुसेनाका संहार करने लगूँ, उस समय आप मेरी इन दोनों भुजाओंका बल देखियेगा' ॥ ९४ ॥ ततोऽश्वांश्चोदयामास मनोमारुतरंहसः । येन तत् त्रिपुरं राजन् दैत्यदानवरक्षितम् ॥ ९५ ॥ राजन्! तब ब्रह्माजीने मन और पवनके समान वेगशाली घोड़ोंको उसी ओर बढ़ाया, जिस ओर दैत्यों और दानवोंद्वारा सुरक्षित वे तीनों पुर थे ॥ ९५ ॥ पिबद्भिरिव चाकाशं तैर्हयैर्लोकपूजितैः । जगाम भगवान् क्षिप्रं जयाय त्रिदिवौकसाम् ॥ ९६ ॥ वे लोकपूजित अश्व ऐसे तीव्र वेगसे चल रहे थे, मानो सारे आकाशको पी जायँगे। उस समय भगवान् शिव उन अश्वोंके द्वारा देवताओंकी विजयके लिये बड़ी शीघ्रताके साथ जा रहे थे ॥ ९६ ॥ प्रयाते रथमास्थाय त्रिपुराभिमुखे भवे । ननाद सुमहानादं वृषभः पूरयन् दिशः ॥ ९७ ॥ रथपर आरूढ़ हो जब महादेवजी त्रिपुरकी ओर प्रस्थित हुए, उस समय नन्दी वृषभने सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ९७ ॥

वृषभस्यास्य निनदं श्रुत्वा भयकरं महत् ।
विनाशमगमंस्तत्र तारकाः सुरशत्रवः ॥ ९८ ॥
उस वृषभका वह अत्यन्त भयंकर सिंहनाद सुनकर बहुत-से देवशत्रु तारक नामवाले दैत्यगण वहीं विनष्ट हो गये ॥ ९८ ॥

अपरेऽवस्थितास्तत्र युद्धायाभिमुखास्तदा ।
ततः स्थाणुर्महाराज शूलधृक् क्रोधमूर्च्छितः ॥ ९९ ॥
दूसरे जो दैत्य वहाँ खड़े थे, वे युद्धके लिये महादेवजीके सामने आये। महाराज! तब त्रिशूलधारी महादेवजी क्रोधसे आतुर हो उठे ॥ ९९ ॥

त्रस्तानि सर्वभूतानि त्रैलोक्यं भूः प्रकम्पते ।
निमित्तानि च घोराणि तत्र संदधतः शरम् ॥ १०० ॥
तस्मिन् सोमाग्निविष्णूनां क्षोभेण ब्रह्मरुद्रयोः ।
स रथो धनुषः क्षोभादतीव ह्यवसीदति ॥ १०१ ॥
फिर तो समस्त प्राणी भयभीत हो उठे। सारी त्रिलोकी और भूमि काँपने लगी। जब वे वहाँ धनुषपर बाणका संधान करने लगे, तब उसमें चन्द्रमा, अग्नि, विष्णु, ब्रह्मा और रुद्रके क्षोभसे बड़े भयंकर निमित्त प्रकट हुए। धनुषके क्षोभसे वह रथ अत्यन्त शिथिल होने लगा ॥ १००-१०१ ॥

ततो नारायणस्तस्माच्छरभागाद् विनिःसृतः ।
वृषरूपं समास्थाय उज्जहार महारथम् ॥ १०२ ॥
तब भगवान् नारायणने उस बाणके एक भागसे बाहर निकलकर वृषभका रूप धारण करके भगवान् शिवके विशाल रथको ऊपर उठाया ॥ १०२ ॥

सीदमाने रथे चैव नर्दमानेषु शत्रुपु ।
स सम्भ्रमात् तु भगवान् नादं चक्रे महाबलः ॥ १०३ ॥
जब रथ शिथिल होने लगा और शत्रु गर्जना करने लगे, तब महाबली भगवान् शिवने बड़े वेगसे घोर गर्जना की ॥ १०३ ॥

वृषभस्य स्थितो मूर्ध्नि हयपृष्ठे च मानद ।
तदा स भगवान् रुद्रो निरैक्षद् दानवं पुरम् ॥ १०४ ॥
वृषभस्यास्थितो रुद्रो हयस्य च नरोत्तम ।
स्तनांस्तदाऽशातयत खुरांश्चैव द्विधाकरोत् ॥ १०५ ॥
मानद! उस समय वे वृषभके मस्तक और घोड़ेकी पीठपर खड़े थे। नरोत्तम! भगवान् रुद्रने वृषभ तथा घोड़ेकी भी पीठपर सवार हो उस दानव-नगरको देखा। तब उन्होंने वृषभके खुरोंको चीरकर उन्हें दो भागोंमें बाँट दिया और घोड़ोंके स्तन काट डाले ॥ १०४-१०५ ॥

ततःप्रभृति भद्रं ते गवां द्वैधीकृताः खुराः ।

हयानां च स्तना राजंस्तदाप्रभृति नाभवन् ।। १०६ ।। पीडितानां बलवता रुद्रेणाद्भुतकर्मणा । राजन्! आपका कल्याण हो। तभीसे बैलोंके दो खुर हो गये और तभीसे अद्भुत कर्म करनेवाले बलवान् रुद्रके द्वारा पीड़ित हुए घोड़ोंके स्तन नहीं उगे ।। १०६ १/२ ।। अथाधिज्यं धनुः कृत्वा शर्वः संधाय तं शरम् ।। १०७ ।। युक्त्वा पाशुपतास्त्रेण त्रिपुरं समचिन्तयत् । तदनन्तर भगवान् रुद्रने धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसके ऊपर पूर्वोक्त बाणको रखा और उसे पाशुपतास्त्रसे संयुक्त करके तीनों पुरोंके एकत्र होनेका चिन्तन किया ।। १०७ १/२ ।। तस्मिन् स्थिते महाराज रुद्रे विधृतकार्मुके ।। १०८ ।। पुराणि तानि कालेन जग्मुरेवैकतां तदा । महाराज! इस प्रकार जब रुद्रदेव धनुष चढ़ाकर खड़े हो गये, उसी समय कालकी प्रेरणासे वे तीनों पुर मिलकर एक हो गये ।। १०८ १/२ ।। एकीभावं गते चैव त्रिपुरत्वमुपागते ।। १०९ ।। बभूव तुमुलॊ हर्षो देवतानां महात्मनाम् । जब तीनों एक होकर त्रिपुर-भावको प्राप्त हुए, तब महामनस्वी देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ ।। १०९ १/२ ।। ततो देवगणाः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः ।। ११० ।। जयेति वाचो मुमुचुः संस्तुवन्तो महेश्वरम् । उस समय समस्त देवता, महर्षि और सिद्धगण महेश्वरकी स्तुति करते हुए उनकी जय-जयकार करने लगे ।। ११० १/२ ।। ततोऽग्रतः प्रादुरभूत् त्रिपुरं निघ्नतोऽसुरान् ।। १११ ।। अनिर्देश्योग्रवपुषो देवस्यासह्यतेजसः । तब असुरोंका संहार करते हुए अवर्णनीय भयंकर रूपवाले असह्य तेजस्वी महादेवजीके सामने वह तीनों पुरोंका समुदाय सहसा प्रकट हो गया ।। १११ १/२ ।। स तद् विकृष्य भगवान् दिव्यं लोकेश्वरो धनुः ।। ११२ ।। त्रैलोक्यसारं तमिषुं मुमोच त्रिपुरं प्रति । फिर तो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् रुद्रने अपने उस दिव्य धनुषको खींचकर उसपर रखे हुए त्रिलोकीके सारभूत उस बाणको त्रिपुरपर छोड़ दिया ।। ११२ १/२ ।। उत्सृष्टे वै महाभाग तस्मिन्निषुवरे तदा ।। ११३ ।। महानार्तस्वरो ह्यासीत् पुराणां पततां भुवि । तान् सोऽसुरगणान् दग्ध्वा प्राक्षिपत् पश्चिमार्णवे ।। ११४ ।।

महाभाग! उस समय उस श्रेष्ठ बाणके छूटते ही भूतलपर गिरते हुए उन तीनों पुरोंका महान् आर्तनाद प्रकट हुआ। भगवान्ने उन असुरोंको भस्म करके पश्चिम समुद्रमें डाल दिया ॥ ११३-११४ ॥

एवं तु त्रिपुरं दग्धं दानवाश्चाप्यशेषतः ।
महेश्वरेण क्रुद्धेन त्रैलोक्यस्य हितैषिणा ॥ ११५ ॥
इस प्रकार तीनों लोकोंका हित चाहनेवाले महेश्वरने कुपित होकर उन तीनों पुरों तथा उनमें निवास करनेवाले दानवोंको दग्ध कर दिया ॥ ११५ ॥

स चात्मक्रोधजो वह्निर्हाहेत्युक्त्वा निवारितः ।
मा कार्षीर्भस्मसाल्लोकानिति त्र्यक्षोऽब्रवीच्च तम् ॥ ११६ ॥
उनके अपने क्रोधसे जो अग्नि प्रकट हुई थी, उसे भगवान् त्रिलोचनने ‘हा-हा’ कहकर रोक दिया और उससे कहा—'तू सम्पूर्ण जगत्‌को भस्म न कर' ॥ ११६ ॥

ततः प्रकृतिमापन्ना देवा लोकास्त्वथर्षयः ।
तुष्टुवुर्वाग्भिरग्र्याभिः स्थाणुमप्रतिमौजसम् ॥ ११७ ॥
तब समस्त देवता, महर्षि तथा तीनों लोकोंके प्राणी स्वस्थ हो गये। सबने श्रेष्ठ वचनोंद्वारा अप्रतिम शक्तिशाली महादेवजीका स्तवन किया ॥ ११७ ॥

तेऽनुज्ञाता भगवता जग्मुः सर्वे यथागतम् ।
कृतकामाः प्रयत्नेन प्रजापतिमुखाः सुराः ॥ ११८ ॥
फिर भगवान्‌की आज्ञा लेकर अपने प्रयत्नसे पूर्णकाम हुए प्रजापति आदि सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे, वैसे चले गये ॥ ११८ ॥

एवं स भगवान् देवो लोकस्रष्टा महेश्वरः ।
देवासुरगणाध्यक्षो लोकानां विदधे शिवम् ॥ ११९ ॥
इस प्रकार देवताओं तथा असुरोंके भी अध्यक्ष जगत्स्रष्टा भगवान् महेश्वर देवने तीनों लोकोंका कल्याण किया था ॥ ११९ ॥

यथैव भगवान् ब्रह्मा लोकधाता पितामहः ।
सारथ्यमकरोत्तत्र रुद्रस्य परमोऽव्ययः ॥ १२० ॥
तथा भवानपि क्षिप्रं रुद्रस्येव पितामहः ।
संयच्छतु हयानस्य राधेयस्य महात्मनः ॥ १२१ ॥
वहाँ विश्वविधाता सर्वोत्कृष्ट अविनाशी पितामह भगवान् ब्रह्माने जिस प्रकार रुद्रका सारथि-कर्म किया था तथा जिस प्रकार उन पितामहने रुद्रदेवके घोड़ोंकी बागडोर सँभाली थी, उसी प्रकार आप भी शीघ्र ही इस महामनस्वी राधापुत्र कर्णके घोड़ोंको काबूमें कीजिये ॥ १२०-१२१ ॥

त्वं हि कृष्णाच्च कर्णाच्च फाल्गुनाच्च विशेषतः ।
विशिष्टो राजशार्दूल नास्ति तत्र विचारणा ॥ १२२ ॥

नृपश्रेष्ठ! आप श्रीकृष्णसे, कर्णसे और अर्जुनसे भी श्रेष्ठ हैं, इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। १२२ ।।

युद्धे ह्ययं रुद्रकल्पस्त्वं च ब्रह्मसमो नये ।
तस्माच्छक्तो भवाज्जेतुं मच्छत्रूंस्तानिवासुरान् ।। १२३ ।।
यह कर्ण युद्धक्षेत्रमें रुद्रके समान है और आप भी नीतिमें ब्रह्माजीके तुल्य हैं; अतः आप उन असुरोंकी भाँति मेरे शत्रुओंको जीतनेमें समर्थ हैं ।। १२३ ।।

यथा शल्याद्य कर्णोऽयं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् ।
प्रमथ्य हन्यात् कौन्तेयं तथा शीघ्रं विधीयताम् ।। १२४ ।।
शल्य! आप शीघ्र ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे यह कर्ण उस श्वेतवाहन अर्जुनको, जिसके सारथि श्रीकृष्ण हैं, मथकर मार डाले ।। १२४ ।।

त्वयि मद्रेश राज्याशा जीविताशा तथैव च ।
विजयश्च तथैवाद्य कर्णसाचिव्यकारितः ।। १२५ ।।
मद्रराज! आपपर ही मेरी राज्यप्राप्तिविषयक अभिलाषा और जीवनकी आशा निर्भर है। आपके द्वारा कर्णका सारथिकर्म सम्पादित होनेपर जो आज विजय मिलनेवाली है, उसकी सफलता भी आपपर ही निर्भर है ।। १२५ ।।

त्वयि कर्णश्च राज्यं च वयं चैव प्रतिष्ठिताः ।
विजयश्चैव संग्रामे संयच्छाद्य हयोत्तमान् ।। १२६ ।।
आपपर ही कर्ण, राज्य, हम और हमारी विजय प्रतिष्ठित हैं। इसलिये आज संग्राममें आप इन उत्तम घोड़ोंको अपने वशमें कीजिये ।। १२६ ।।

इमं चाप्यपरं भूय इतिहासं निबोध मे ।
पितुर्मम सकाशे यद् ब्राह्मणः प्राह धर्मवित् ।। १२७ ।।
राजन्! आप मुझसे फिर यह दूसरा इतिहास भी सुनिये, जिसे एक धर्मज्ञ ब्राह्मणने मेरे पिताके समीप कहा था ।। १२७ ।।

श्रुत्वा चैतद् वचश्चित्रं हेतुकार्यार्थसंहितम् ।
कुरु शल्य विनिश्चित्य माभूदत्र विचारणा ।। १२८ ।।
शल्य! कारण और कार्यसे युक्त इस विचित्र ऐतिहासिक वार्ताको सुनकर आप अच्छी तरह सोच-विचार लेनेके पश्चात् मेरा कार्य करें, इस विषयमें आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये ।। १२८ ।।

भार्गवाणां कुले जातो जमदग्निर्महायशाः ।
तस्य रामेति विख्यातः पुत्रस्तेजोगुणान्वितः ।। १२९ ।।
भृगुवंशमें महायशस्वी महर्षि जमदग्नि प्रकट हुए थे, जिनके तेजस्वी और गुणवान् पुत्र परशुरामके नामसे विख्यात हैं ।। १२९ ।।

स तीव्रं तप आस्थाय प्रसादयितवान् भवम् ।

अस्त्रहेतोः प्रसन्नात्मा नियतः संयतेन्द्रियः ॥ १३० ॥ उन्होंने अस्त्र-प्राप्तिके लिये मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए प्रसन्न हृदयसे भारी तपस्या करके भगवान् शंकरको प्रसन्न किया ॥ १३० ॥ तस्य तुष्टो महादेवो भक्त्या च प्रशमेन च । हृद्गतं चास्य विज्ञाय दर्शयामास शङ्करः ॥ १३१ ॥ (प्रत्यक्षेण महादेवः स्वां तनुं सर्वशङ्करः ।) उनकी भक्ति और मनःसंयमसे संतुष्ट हो सबका कल्याण करनेवाले महादेवजीने उनके मनोगत भावको जानकर उन्हें अपने दिव्य शरीरका प्रत्यक्ष दर्शन कराया ॥ १३१ ॥

महेश्वर उवाच

राम तुष्टोऽस्मि भद्रं ते विदितं मे तवेप्सितम् । कुरुष्व पूतमात्मानं सर्वमेतदवाप्स्यसि ॥ १३२ ॥ **महादेवजी बोले—**राम! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम क्या चाहते हो, यह मुझे विदित है। अपने हृदयको शुद्ध करो। तुम्हें यह सब कुछ प्राप्त हो जायगा ॥ १३२ ॥ दास्यामि ते तदास्त्राणि यदा पूतो भविष्यसि । अपात्रमसमर्थं च दहन्त्यस्त्राणि भार्गव ॥ १३३ ॥ जब तुम पवित्र हो जाओगे, तब तुम्हें अपने अस्त्र दूँगा, भृगुनन्दन! अपात्र और असमर्थ पुरुषको तो ये अस्त्र जलाकर भस्म कर डालते हैं ॥ १३३ ॥ इत्युक्तो जामदग्न्यस्तु देवदेवेन शूलिना । प्रत्युवाच महात्मानं शिरसावनतः प्रभुम् ॥ १३४ ॥ त्रिशूलधारी देवाधिदेव महादेवजीके ऐसा कहनेपर जमदग्निनन्दन परशुरामने उन महात्मा भगवान् शिवको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ॥ १३४ ॥ यदा जानाति देवेशः पात्रं मामस्त्रधारणे । तदा शुश्रूषवेऽस्त्राणि भगवान् मे दातुमर्हति ॥ १३५ ॥ ‘यदि आप देवेश्वर प्रभु मुझे अस्त्रधारणाका पात्र समझें तभी मुझ सेवकको दिव्यास्त्र प्रदान करें’ ॥ १३५ ॥

दुर्योधन उवाच

ततः स तपसा चैव दमेन नियमेन च । पूजोपहारबलिभिर्होममन्त्रपुरस्कृतैः ॥ १३६ ॥ आराधयितवान् शर्वं बहून् वर्षगणांस्तदा ।

दुर्योधन कहता हैं—तदनन्तर परशुरामने बहुत वर्षोंतक तपस्या, इन्द्रिय-संयम, मनोनिग्रह, पूजा, उपहार, भेंट, अर्पण, होम और मन्त्र-जप आदि साधनोंद्वारा भगवान् शिवकी आराधना की ।। १३६ ½ ।।
प्रसन्नश्च महादेवो भार्गवस्य महात्मनः ॥ १३७ ॥
अब्रवीत् तस्य बहुशो गुणान् देव्याः समीपतः ।
भक्तिमानेष सततं मयि रामो दृढव्रतः ॥ १३८ ॥
इससे महादेवजी महात्मा परशुरामपर प्रसन्न हो गये और उन्होंने पार्वती देवीके समीप उनके गुणोंका बारंबार वर्णन किया—'ये दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले परशुराम मेरे प्रति सदा भक्तिभाव रखते हैं' ।। १३७-१३८ ।।
एवं तस्य गुणान् प्रीतो बहुशोऽकथयत् प्रभुः ।
देवतानां पितॄणां च समक्षमरिसूदन ॥ १३९ ॥
शत्रुसूदन! इसी प्रकार प्रसन्न हुए भगवान् शिवने देवताओं और पितरोंके समक्ष भी बारंबार प्रसन्नतापूर्वक उनके गुणोंका वर्णन किया ।। १३९ ।।
एतस्मिन्नेव काले तु दैत्या ह्यासन् महाबलाः ।
तैस्तदा दर्पमोहाद्यैरबाध्यन्त दिवौकसः ॥ १४० ॥
इन्हीं दिनोंकी बात है, दैत्यलोग महान् बलसे सम्पन्न हो गये थे। वे दर्प और मोह आदिके वशीभूत हो उस समय देवताओंको सताने लगे ।। १४० ।।
ततः सम्भूय विबुधास्तान् हन्तुं कृतनिश्चयाः ।
चक्रुः शत्रुवधे यत्नं न शेकुर्जेतुमेव तान् ॥ १४१ ॥
तब सम्पूर्ण देवताओंने एकत्र हो उन्हें मारनेका निश्चय करके शत्रुओंके वधके लिये यत्न किया; परंतु वे उन्हें जीत न सके ।। १४१ ।।
अभिगम्य ततो देवा महेश्वरमुमापतिम् ।
प्रासादयंस्तदा भक्त्या जहि शत्रुगणानिति ॥ १४२ ॥
तत्पश्चात् देवताओंने उमावल्लभ महेश्वरके समीप जाकर भक्तिपूर्वक उन्हें प्रसन्न किया और कहा—'प्रभो! हमारे शत्रुओंका संहार कीजिये' ।। १४२ ।।
प्रतिज्ञाय ततो देवो देवतानां रिपुक्षयम् ।
रामं भार्गवमाहूय सोऽभ्यभाषत शङ्करः ॥ १४३ ॥
तब कल्याणकारी महादेवजीने देवताओंके समक्ष उनके शत्रुओंका संहार करनेकी प्रतिज्ञा करके भृगुनन्दन परशुरामको बुलाकर इस प्रकार कहा— ।। १४३ ।।
रिपून् भार्गव देवानां जहि सर्वान् समागतान् ।
लोकानां हितकामार्थं मत्प्रीत्यर्थं तथैव च ॥ १४४ ॥
'भार्गव! तुम तीनों लोकोंके हितकी इच्छासे तथा मेरी प्रसन्नताके लिये देवताओंके समस्त समागत शत्रुओंका वध करो' ।। १४४ ।।

एवमुक्तः प्रत्युवाच त्र्यम्बकं वरदं प्रभुम् ।
उनके ऐसा कहनेपर परशुरामने वरदायक भगवान् त्रिलोचनको इस प्रकार उत्तर दिया ॥ १४४ १/२ ॥

राम उवाच

का शक्तिर्मम देवेश अकृतास्त्रस्य संयुगे ॥ १४५ ॥
निहन्तुं दानवान् सर्वान् कृतास्त्रान् युद्धदुर्मदान् ।
**परशुराम बोले—**देवेश्वर! मैं तो अस्त्रविद्याका ज्ञाता नहीं हूँ। फिर युद्धस्थलमें अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा रणदुर्मद समस्त दानवोंका वध करनेके लिये मुझमें क्या शक्ति है? ॥ १४५ १/२ ॥

महेश्वर उवाच

गच्छ त्वं मदनुज्ञातो निहनिष्यसि शात्रवान् ॥ १४६ ॥
विजित्य च रिपून् सर्वान् गुणान् प्राप्स्यसि पुष्कलान् ।
**महेश्वरने कहा—**राम! तुम मेरी आज्ञासे जाओ। निश्चय ही देवशत्रुओंका संहार करोगे। उन समस्त वैरियोंपर विजय पाकर प्रचुर गुण प्राप्त कर लोगे ॥ १४६ १/२ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं प्रतिगृह्य च सर्वशः ॥ १४७ ॥
रामः कृतस्वस्त्ययनः प्रययौ दानवान् प्रति ।
अब्रवीद् देवशत्रूंस्तान् महादर्पबलान्वितान् ॥ १४८ ॥
उनकी यह बात सुनकर उसे सब प्रकारसे शिरोधार्य करके परशुराम स्वस्तिवाचन आदि मंगलकृत्य करनेके पश्चात् दानवोंका सामना करनेके लिये गये और महान् दर्प एवं बलसे सम्पन्न उन देवशत्रुओंसे इस प्रकार बोले— ॥ १४७-१४८ ॥
मम युद्धं प्रयच्छध्वं दैत्या युद्धमदोत्कटाः ।
प्रेषितो देवदेवेन वो निजेतुं महासुराः ॥ १४९ ॥
‘युद्धके मदसे उन्मत्त रहनेवाले दैत्यो! मुझे युद्ध प्रदान करो। महान् असुरगण! मुझे देवाधिदेव महादेवजीने तुम्हें परास्त करनेके लिये भेजा है’ ॥ १४९ ॥
इत्युक्ता भार्गवेणाथ दैत्या युद्धं प्रचक्रमुः ।
स तान् निहत्य समरे दैत्यान् भार्गवनन्दनः ॥ १५० ॥
वज्राशनिसमस्पर्शैः प्रहारैरेव भार्गवः ।
स दानवैः क्षततनुर्जामदग्न्यो द्विजोत्तमः ॥ १५१ ॥
भृगुवंशी परशुरामके ऐसा कहनेपर दैत्य उनके साथ युद्ध करने लगे। भार्गवनन्दन रामने समरांगणमें वज्र और विद्युत्‌के समान स्पर्शवाले प्रहारोंद्वारा उन दैत्योंका वध कर डाला। साथ ही उन द्विजश्रेष्ठ जमदग्निकुमारके शरीरको भी दानवोंने क्षत-विक्षत कर डाला ॥ १५०-१५१ ॥

संस्पृष्टःस्थाणुना सद्यो निर्व्रणः समजायत । प्रीतश्च भगवान् देवः कर्मणा तेन तस्य वै ॥ १५२ ॥ परंतु महादेवजीके हाथोंका स्पर्श पाकर परशुरामजीके सारे घाव तत्काल दूर हो गये। परशुरामके उस शत्रुविजयरूपी कर्मसे भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १५२ ॥ वरान् प्रादाद् बहुविधान् भार्गवाय महात्मने । उक्तश्च देवदेवेन प्रीतियुक्तेन शूलिना ॥ १५३ ॥ उन देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शिवने बड़ी प्रसन्नताके साथ महात्मा भार्गवको नाना प्रकारके वर प्रदान किये ॥ १५३ ॥ निपातात्तव शस्त्राणां शरीरे याभवद् रुजा । तया ते मानुषं कर्म व्यपोढं भृगुनन्दन ॥ १५४ ॥ गृहाणास्त्राणि दिव्यानि मत्सकाशाद् यथेप्सितम् । उन्होंने कहा—'भृगुनन्दन! दैत्योंके अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे तुम्हारे शरीरमें जो चोट पहुँची है, उससे तुम्हारा मानवोचित कर्म नष्ट हो गया (अब तुम देवताओंके ही समान हो गये); अतः मुझसे अपनी इच्छाके अनुसार दिव्यास्त्र ग्रहण करो' ॥ १५४ १/२ ॥

दुर्योधन उवाच

ततोऽस्त्राणि समस्तानि वरांश्च मनसेप्सितान् ॥ १५५ ॥ लब्ध्वा बहुविधान् रामः प्रणम्य शिरसा भवम् । अनुज्ञां प्राप्य देवेशाज्जगाम स महातपाः ॥ १५६ ॥ दुर्योधन कहता है—राजन्! तब रामने भगवान् शिवसे समस्त दिव्यास्त्र और नाना प्रकारके मनोवांछित वर पाकर उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया। फिर वे महातपस्वी परशुराम देवेश्वर शिवसे आज्ञा लेकर चले गये ॥ १५५-१५६ ॥ एवमेतत् पुरावृत्तं तदा कथितवानृषिः । भार्गवोऽपि ददौ दिव्यं धनुर्वेदं महात्मने ॥ १५७ ॥ कर्णाय पुरुषव्याघ्र सुप्रीतेनान्तरात्मना । राजन्! इस प्रकार यह पुरातन वृत्तान्त उस समय ऋषिने मेरे पिताजीसे कहा था। पुरुषसिंह! भृगुनन्दन परशुरामने भी अत्यन्त प्रसन्न हृदयसे महामना कर्णको दिव्य धनुर्वेद प्रदान किया है ॥ १५७ १/२ ॥ वृजिनं हि भवेत् किंचिद् यदि कर्णस्य पार्थिव ॥ १५८ ॥ नास्मै ह्यस्त्राणि दिव्यानि प्रादास्यद् भृगुनन्दनः । भूपाल! यदि कर्णमें कोई पाप या दोष होता तो भृगुनन्दन परशुराम इसे दिव्यास्त्र न देते ॥ १५८ १/२ ॥ नापि सूतकुले जातं कर्णं मन्ये कथंचन ॥ १५९ ॥

देवपुत्रमहं मन्ये क्षत्रियाणां कुलोद्भवम् ।
विसृष्टमवबोधार्थं कुलस्येति मतिर्मम ।। १६० ।।
राजन्! मैं किसी तरह इस बातपर विश्वास नहीं करता कि कर्ण सूतकुलमें उत्पन्न हुआ है। मैं इसे क्षत्रियकुलमें उत्पन्न देवपुत्र मानता हूँ। मेरा तो यह विश्वास है कि इसकी माताने अपने गुप्त रहस्यको छिपानेके लिये तथा इसे अन्य कुलका बालक विख्यात करनेके लिये ही सूतकुलमें छोड़ दिया होगा ।। १५९-१६० ।।
सर्वथा न ह्ययं शल्य कर्णः सूतकुलोद्भवः ।
सकुण्डलं सकवचं दीर्घबाहुं महारथम् ।। १६१ ।।
कथमादित्यसदृशं मृगी व्याघ्रं जनिष्यति ।
शल्य! मैं सर्वथा इस बातपर विश्वास करता हूँ कि इस कर्णका जन्म सूतकुलमें नहीं हुआ है। इस महाबाहु महारथी और सूर्यके समान तेजस्वी कुण्डल-कवचविभूषित पुत्रको सूतजातिकी स्त्री कैसे पैदा कर सकती है? क्या कोई हरिणी अपने पेटसे बाघको जन्म दे सकी है? ।। १६१ १/३ ।।
यथा ह्यस्य भुजौ पीनौ नागराजकरोपमौ ।। १६२ ।।
वक्षः पश्य विशालं च सर्वशत्रुनिबर्हणम् ।
न त्वेष प्राकृतः कश्चित् कर्णो वैकर्तनो वृषः ।
महात्मा ह्येष राजेन्द्र रामशिष्यः प्रतापवान् ।। १६३ ।।
राजेन्द्र! गजराजके शुण्डदण्डके समान जैसी इसकी मोटी भुजाएँ हैं तथा समस्त शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ जैसा इसका विशाल वक्षःस्थल है, उससे सूचित होता है कि परशुरामजीका यह प्रतापी शिष्य महामनस्वी धर्मात्मा वैकर्तन कर्ण कोई प्राकृत पुरुष नहीं है ।। १६२-१६३ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि त्रिपुरवधोपाख्याने चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें त्रिपुरवधोपाख्यानविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १७० १/३ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 1839)

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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

शल्य और दुर्योधनका वार्तालाप, कर्णका सारथि होनेके लिये शल्यकी स्वीकृति

दुर्योधन उवाच

एवं स भगवान् देवः सर्वलोकपितामहः ।
सारथ्यमकरोत् तत्र ब्रह्मा रुद्रोऽभवद् रथी ॥ १ ॥
**दुर्योधन बोला—**राजन्! इस प्रकार सर्वलोक-पितामह भगवान् ब्रह्माने वहाँ सारथिका कार्य किया और रथी हुए रुद्र ॥ १ ॥

रथिनोऽभ्यधिको वीर कर्तव्यो रथसारथिः ।
तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र नियच्छ तुरगान् युधि ॥ २ ॥
वीर! रथका सारथि तो उसीको बनाना चाहिये जो रथीसे भी बढ़कर हो। अतः पुरुषसिंह! आप युद्धमें कर्णके घोड़ोंको काबूमें रखिये ॥ २ ॥

यथा देवगणैस्तत्र वृतो यत्नात् पितामहः ।
तथास्माभिर्भवान् यत्नात् कर्णादभ्यधिको वृतः ॥ ३ ॥
जैसे देवताओंने वहाँ यत्नपूर्वक ब्रह्माजीका वरण किया था, उसी प्रकार हमलोगोंने विशेष चेष्टा करके कर्णसे भी अधिक बलवान् आपका सारथि-कर्मके लिये वरण किया ॥ ३ ॥

यथा देवैर्महाराज ईश्वरादधिको वृतः ।
तथा भवानपि क्षिप्रं रुद्रस्येव पितामहः ॥ ४ ॥
नियच्छ तुरगान् युद्धे राधेयस्य महाद्युते ।
महाराज! जैसे देवताओंने महादेवजीसे भी बड़े ब्रह्माजीको उनका सारथि चुना था, उसी प्रकार हमने भी आपको चुना है। अतः महातेजस्वी नरेश! आप युद्धमें राधापुत्र कर्णके घोड़ोंका नियन्त्रण कीजिये ॥ ४ ½ ॥

शल्य उवाच

मयाप्येतन्नरश्रेष्ठ बहुशोऽमरसिंहयोः ॥ ५ ॥
कथ्यमानं श्रुतं दिव्यमाख्यानमतिमानुषम् ।
यथा च चक्रे सारथ्यं भवस्य प्रपितामहः ॥ ६ ॥
यथासुराश्च निहता इषुणैकेन भारत ।