भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1864, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1864

श्यामानां निष्ककण्ठीनां गीतवाद्यविपश्चिताम् । 'यदि अर्जुनका पता बतानेवाला पुरुष उस धनको पूरा न समझे तो उसे दूसरा सोनेका बना हुआ रथ प्रदान करूँगा जिसमें हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट छः बैल जुते होंगे। साथ ही उसे वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सौ ऐसी स्त्रियाँ दूँगा, जो श्यामा (सोलह वर्षकी अवस्थावाली), सुवर्णमय कण्ठहारसे अलंकृत तथा गाने-बजानेकी कलामें विदुषी होंगी ।। ६-७ १/२ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।। ८ ।। तस्मै दद्यां शतं नागान् शतं ग्रामान् शतं रथान् । सुवर्णस्य च मुख्यस्य हयाग्र्येणां शतं शतान् ।। ९ ।। ऋद्ध्या गुणैः सुदान्तांश्च धुर्यवाहान् सुशिक्षितान् । 'अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष यदि उसे भी पूरा न समझे तो मैं उसे सौ हाथी, सौ गाँव, पक्के सोनेके बने हुए सौ रथ तथा दस हजार अच्छे घोड़े भी दूँगा। वे घोड़े हृष्ट-पुष्ट, गुणवान्, विनीत, सुशिक्षित तथा रथका भार वहन करनेमें समर्थ होंगे ।। ८-९ १/२ ।। तथा सुवर्णशृङ्गीणां गोधेनूनां चतुःशतम् ।। १० ।। दद्यां तस्मै सवत्सानां यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् । 'जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं चार सौ सवत्सा दुधारू गौएँ दूँगा, जिनके सींगोंमें सोने मढ़े होंगे ।। १० १/२ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।। ११ ।। अन्यदस्मै वरं दद्यां श्वेतान् पञ्चशतान् हयान् । हेमभाण्डपरिच्छन्नान् सुमृष्टमणिभूषणान् ।। १२ ।। 'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उस धनको पूर्ण नहीं समझेगा तो उसे और भी उत्तम धन, श्वेत रंगके पाँच सौ घोड़े दूँगा, जो सोनेके साज-बाजसे सुसज्जित तथा विशुद्ध मणियोंके आभूषणोंसे विभूषित होंगे ।। ११-१२ ।। सुदान्तानपि चैवाहं दद्यामष्टादशापरान् । रथं च शुभ्रं सौवर्णं दद्यां तस्मै स्वलंकृतम् ।। १३ ।। युक्तं परमकाम्बोजैर्यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् । 'इनके सिवा अठारह और भी घोड़े दूँगा, जो अच्छी तरह रथमें सधे हुए होंगे। जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा उसे मैं परम उज्ज्वल और अलंकारोंसे सजाया हुआ एक सुवर्णमय रथ दूँगा, जिसमें अच्छी नस्लके काबुली घोड़े जुते होंगे ।। १३ १/२ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।। १४ ।। अन्यदस्मै वरं दद्यां कुञ्जराणां शतानि षट् । काञ्चनैर्विविधैर्भाण्डैराच्छन्नान् हेममालिनः ।। १५ ।। उत्पन्नानपरान्तेषु विनीतान् हस्तिशिक्षकैः ।

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