महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1865, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पूरा न समझे तो उसे मैं और भी श्रेष्ठ धन दूँगा। नाना प्रकारके सुवर्णमय आभूषणोंसे सुशोभित तथा सोनेकी मालाओंसे अलंकृत छः सौ ऐसे हाथी प्रदान करूँगा जो भारतवर्षकी पश्चिमी सीमाके जंगलोंमें उत्पन्न हुए हैं और जिन्हें गजशिक्षकोंने अच्छी तरह सुशिक्षित कर लिया है।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिमान् ॥ १६ ॥ अन्यदस्मै वरं दद्यां वैश्यग्रामांश्चतुर्दश । सुस्फीतान् धनसंयुक्तान् प्रत्यासन्नवनोदकान् । अकुतोभयान् सुसम्पन्नान् राजभोज्यांश्चतुर्दश ॥ १७ ॥ 'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पूरा न समझे तो मैं उसे दूसरा श्रेष्ठ धन प्रदान करूँगा। जिनमें वैश्य निवास करते हों ऐसे चौदह समृद्धिशाली और धनसम्पन्न ग्राम दूँगा जिनके आसपास जंगल और जलकी सुविधा होगी और जहाँ किसी प्रकारका भय नहीं होगा। वे चौदहों गाँव अधिक सम्पन्न तथा राजोचित भोगोंसे परिपूर्ण होंगे ।। १६-१७ ।। दासीनां निष्ककण्ठीनां मागधीनां शतं तथा । प्रत्यग्रवयसां दद्यां यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् ॥ १८ ॥ 'जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं सोनेके कण्ठहारोंसे विभूषित मगधदेशकी सौ नवयुवती दासियाँ दूँगा ।। १८ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिमान् । अन्यं तस्मै वरं दद्यां यमसौ कामयेत् स्वयम् ॥ १९ ॥ 'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पर्याप्त न समझे तो मैं उसे दूसरा वर प्रदान करूँगा, जिसकी वह स्वयं इच्छा करे ।। १९ ।। पुत्रदारान् विहारांश्च यदन्यद् वित्तमस्ति मे । तच्च तस्मै पुनर्दद्यां यद् यच्च मनसेच्छति ॥ २० ॥ 'स्त्री, पुत्र, विहारस्थान तथा दूसरा भी जो कुछ धन-वैभव मेरे पास है, उसमेंसे जिस-जिस वस्तुको वह अपने मनसे चाहेगा, वह सब कुछ मैं उसे दे डालूँगा ।। २० ।। हत्वा च सहितौ कृष्णौ तयोर्वित्तानि सर्वशः । तस्मै दद्यामहं यो मे प्रब्रूयात् केशवार्जुनौ ॥ २१ ॥ 'जो मुझे श्रीकृष्ण और अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं उन दोनोंको मारकर उनका सारा धन-वैभव दे दूँगा' ।। २१ ।। एता वाचः सुबहुशः कर्ण उच्चारयन् युधि । दध्मौ सागरसम्भूतं सुस्वरं शङ्खमुत्तमम् ॥ २२ ॥ इन सब बातोंको बारंबार कहते हुए कर्णने युद्धस्थलमें समुद्रसे उत्पन्न हुए अपने उत्तम शंखको उच्च स्वरसे बजाया ।। २२ ।।