महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1866, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंता वाचः सूतपुत्रस्य तथा युक्ता निशम्य तु । दुर्योधनो महाराज संहृष्टः सानुगोऽभवत् ॥ २३ ॥ महाराज! सूतपुत्रकी कही हुई उस अवसरके अनुरूप उन बातोंको सुनकर दुर्योधन अपने सेवकोंसहित बड़ा प्रसन्न हुआ ॥ २३ ॥ ततो दुन्दुभिनिर्घोषो मृदङ्गानां च सर्वशः । सिंहनादः सवादित्रः कुञ्जराणां च निःस्वनः ॥ २४ ॥ फिर तो सब ओर दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी, मृदंग बजने लगे, वाद्योंकी ध्वनिके साथ-साथ वीरोंका सिंहनाद तथा हाथियोंके चिग्घाड़नेका शब्द वहाँ गूँज उठा ॥ २४ ॥ प्रादुरासीत् तदा राजन् सैन्येषु पुरुषर्षभ । योधानां सम्प्रहृष्टानां तथा समभवत् स्वनः ॥ २५ ॥ पुरुषप्रवर नरेश! उस समय सभी सेनाओंमें हर्ष और उत्साहसे भरे हुए योद्धाओंका गम्भीर गर्जन होने लगा ॥ २५ ॥ तथा प्रहृष्टे सैन्ये तु प्लवमानं महारथम् । विकत्थमानं च तदा राधेयमरिकर्षणम् । मद्रराजः प्रहस्येदं वचनं प्रत्यभाषत ॥ २६ ॥ इस प्रकार हर्षसे उल्लसित हुई सेनामें जाते और बढ़-बढ़कर बातें बनाते हुए शत्रुसूदन राधापुत्र महारथी कर्णसे मद्रराज शल्यने हँसकर इस प्रकार कहा ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णावलेपे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णका अभिमानविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥