महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1867, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
शल्यका कर्णके प्रति अत्यन्त आक्षेपपूर्ण वचन कहना
शल्य उवाच
मा सूतपुत्र दानेन सौवर्णं हस्तिषड्गवम् ।
प्रयच्छ पुरुषायाद्य द्रक्ष्यसि त्वं धनंजयम् ॥ १ ॥
शल्य बोले— सूतपुत्र! तुम किसी पुरुषको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट छः बैलोंसे जुता हुआ सोनेका रथ न दो। आज अवश्य ही अर्जुनको देखोगे ॥ १ ॥
बाल्यादिह त्वं त्यजसि वसु वैश्रवणो यथा ।
अयत्नेनैव राधेय द्रष्टास्यद्य धनंजयम् ॥ २ ॥
राधापुत्र! तुम मूर्खतासे ही यहाँ कुबेरके समान धन लुटा रहे हो, आज अर्जुनको तो तुम बिना यत्न किये ही देख लोगे ॥ २ ॥
परान् सृजसि यद् वित्तं किंचित्त्वं बहु मूढवत् ।
अपात्रदाने ये दोषास्तान् मोहान्नावबुध्यसे ॥ ३ ॥
मूढ़ पुरुषोंके समान तुम अपना बहुत कुछ धन जो दूसरोंको दे रहे हो, इससे जान पड़ता है कि अपात्रको धनका दान देनेसे जो दोष पैदा होते हैं, उन्हें मोहवश तुम नहीं समझ रहे हो ॥ ३ ॥
यत् त्वं प्रेरयसे वित्तं बहु तेन खलु त्वया ।
शक्यं बहुविधैर्यज्ञैर्यष्टुं सूत यजस्व तैः ॥ ४ ॥
सूत! तुम जो बहुत धन देनेकी यहाँ घोषणा कर रहे हो, निश्चय ही उसके द्वारा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान कर सकते हो; अतः तुम उन धन-वैभवोंद्वारा यज्ञोंका ही अनुष्ठान करो ॥ ४ ॥
यच्च प्रार्थयसे हन्तुं कृष्णौ मोहाद् वृथैव तत् ।
न हि शुश्रुम सम्मर्दे क्रोष्ट्रा सिंहौ निपातितौ ॥ ५ ॥
और जो तुम मोहवश श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको मारना चाहते हो, वह मनसूबा तो व्यर्थ ही है; क्योंकि हमने यह बात कभी नहीं सुनी है कि किसी गीदड़ने युद्धमें दो सिंहोंको मार गिराया हो ॥ ५ ॥
अप्रार्थितं प्रार्थयसे सुहृदो न हि सन्ति ते ।
ये त्वां न वारयन्त्याशु प्रपतन्तं हुताशने ॥ ६ ॥
तुम ऐसी चीज चाहते हो, जिसकी अबतक किसीने इच्छा नहीं की थी। जान पड़ता है तुम्हारे कोई सुहृद् नहीं हैं, जो शीघ्र ही आकर तुम्हें चलती आगमें गिरनेसे रोक नहीं रहे हैं ॥ ६ ॥