भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1869

**संजय कहते हैं—**राजन्! कर्णकी यह बात समाप्त होते ही मद्रराज शल्य उसे अत्यन्त कुपित करनेकी इच्छासे पुनः इस प्रकार उत्तर देने लगे— ॥ १३ ॥

यदा वै त्वां फाल्गुनवेगयुक्ता ज्याचोदिता हस्तवता विसृष्टाः । अन्वेतारः कङ्कपत्राः सिताग्रा- स्तदा तप्स्यस्यर्जुनस्यानुयोगात् ॥ १४ ॥ ‘कर्ण! अर्जुनके वेगसे युक्त हो उनकी प्रत्यंचासे प्रेरित और सुशिक्षित हाथोंसे छोड़े हुए तीखी धारवाले कंकपत्रविभूषित बाण जब तुम्हारे शरीरमें घुसने लगेंगे, तब जो तुम अर्जुनको पूछते फिरते हो, इसके लिये पश्चात्ताप करोगे ॥ १४ ॥

यदा दिव्यं धनुरदाय पार्थः प्रतापयन् पृतनां सव्यसाची । त्वां मर्दयिष्यन्निशितैः पृषत्कै- स्तदा पश्चात् तप्स्यसे सूतपुत्र ॥ १५ ॥ ‘सूतपुत्र! जब सव्यसाची कुन्तीकुमार अर्जुन अपने हाथमें दिव्य धनुष लेकर शत्रुसेनाको तपाते हुए पैने बाणोंद्वारा तुम्हें रौंदने लगेंगे, तब तुम्हें अपने कियेपर पछतावा होगा ॥

बालश्चन्द्रं मातुरङ्के शयानो यथा कश्चित् प्रार्थयतेऽपहर्तुम् । तद्वन्मोहाद् द्योतमानं रथस्थं सम्प्राथर्यस्यर्जुनं जेतुमद्य ॥ १६ ॥ ‘जैसे अपनी माँकी गोदमें सोया हुआ कोई बालक चन्द्रमाको पकड़ लाना चाहता हो, उसी प्रकार तुम भी रथपर बैठे हुए तेजस्वी अर्जुनको आज मोहवश परास्त करना चाहते हो ॥ १६ ॥

त्रिशूलमाश्रित्य सुतीक्ष्णधारं सर्वाणि गात्राणि विघर्षसि त्वम् । सुतीक्ष्णधारोपमकर्मणा त्वं युयुत्ससे योऽर्जुनेनाद्य कर्ण ॥ १७ ॥ ‘कर्ण! अर्जुनका पराक्रम अत्यन्त तीखी धारवाले त्रिशूलके समान है। उन्हीं अर्जुनके साथ आज जो तुम युद्ध करना चाहते हो, वह दूसरे शब्दोंमें यों है कि तुम पैनी धारवाले त्रिशूलको लेकर उसीसे अपने सारे अंगोंको रगड़ना या खुजलाना चाहते हो ॥ १७ ॥

क्रुद्धं सिंहं केसरिणं बृहन्तं बालो मूढः क्षुद्रमृगस्तरस्वी । समाह्वयेत् तद्वदेतत् तवाद्य