महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1870, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमाह्वानं सूतपुत्रार्जुनस्य ॥ १८ ॥ ‘सूतपुत्र! जैसे बालक, मूढ़ और वेगसे चौकड़ी भरनेवाला क्षुद्र मृग क्रोधमें भरे हुए विशालकाय, केसरयुक्त सिंहको ललकारे, तुम्हारा आज यह अर्जुनका युद्धके लिये आह्वान करना भी वैसा ही है ॥ १८ ॥
मा सूतपुत्राह्वय राजपुत्रं महावीर्यं केसरिणं यथैव । वने शृगालः पिशितेन तृप्तो मा पार्थमासाद्य विनङ्क्ष्यसि त्वम् ॥ १९ ॥ ‘सूतपुत्र! तुम महापराक्रमी राजकुमार अर्जुनका आह्वान न करो। जैसे वनमें मांस-भक्षणसे तृप्त हुआ गीदड़ महाबली सिंहके पास जाकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी अर्जुनसे भिड़कर विनाशके गर्तमें न गिरो ॥ १९ ॥
ईषादन्तं महानागं प्रभिन्नकरटामुखम् । शशको ह्वयसे युद्धे कर्ण पार्थं धनंजयम् ॥ २० ॥ ‘कर्ण! जैसे कोई खरगोश ईषादण्डके समान दाँतोंवाले महान् मदस्रावी गजराजको अपने साथ युद्धके लिये बुलाता हो, उसी प्रकार तुम भी कुन्तीपुत्र धनंजयका रणक्षेत्रमें आह्वान करते हो ॥ २० ॥
बिलस्थं कृष्णसर्पं त्वं बाल्यात् काष्ठेन विध्यसि । महाविषं पूर्णकोपं यत् पार्थं योद्धुमिच्छसि ॥ २१ ॥ ‘तुम यदि पूर्णतः क्रोधमें भरे हुए अर्जुनके साथ जूझना चाहते हो तो मूर्खतावश बिलमें बैठे हुए महाविषैले काले सर्पको किसी काठकी छड़ीसे बींध रहे हो ॥ २१ ॥
सिंहं केसरिणं क्रुद्धमतिक्रम्याभिनर्दसे । शृगाल इव मूढस्त्वं नृसिंहं कर्ण पाण्डवम् ॥ २२ ॥ ‘कर्ण! तुम मूर्ख हो; जैसे गीदड़ क्रोधमें भरे हुए केसरी सिंहका अनादर करके गर्जना करे, उसी प्रकार तुम भी मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी और क्रोधमें भरे हुए पाण्डुकुमार अर्जुनका लंघन करके गरज रहे हो ॥ २२ ॥
सुपर्णं पतगश्रेष्ठं वैनतेयं तरस्विनम् । भोगीवाह्वयसे पाते कर्ण पार्थं धनंजयम् ॥ २३ ॥ ‘कर्ण! जैसे कोई सर्प अपने पतनके लिये ही पक्षियोंमें श्रेष्ठ वेगशाली विनतानन्दन गरुडका आह्वान करता है, उसी प्रकार तुम भी अपने विनाशके लिये ही कुन्तीकुमार अर्जुनको ललकार रहे हो ॥ २३ ॥
सर्वाम्भसां निधिं भीमं मूर्तिमन्तं झषायुतम् । चन्द्रोदये विवर्धन्तमप्लवः संस्तितीर्षसि ॥ २४ ॥