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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

समाह्वानं सूतपुत्रार्जुनस्य ॥ १८ ॥ ‘सूतपुत्र! जैसे बालक, मूढ़ और वेगसे चौकड़ी भरनेवाला क्षुद्र मृग क्रोधमें भरे हुए विशालकाय, केसरयुक्त सिंहको ललकारे, तुम्हारा आज यह अर्जुनका युद्धके लिये आह्वान करना भी वैसा ही है ॥ १८ ॥

मा सूतपुत्राह्वय राजपुत्रं महावीर्यं केसरिणं यथैव । वने शृगालः पिशितेन तृप्तो मा पार्थमासाद्य विनङ्क्ष्यसि त्वम् ॥ १९ ॥ ‘सूतपुत्र! तुम महापराक्रमी राजकुमार अर्जुनका आह्वान न करो। जैसे वनमें मांस-भक्षणसे तृप्त हुआ गीदड़ महाबली सिंहके पास जाकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी अर्जुनसे भिड़कर विनाशके गर्तमें न गिरो ॥ १९ ॥

ईषादन्तं महानागं प्रभिन्नकरटामुखम् । शशको ह्वयसे युद्धे कर्ण पार्थं धनंजयम् ॥ २० ॥ ‘कर्ण! जैसे कोई खरगोश ईषादण्डके समान दाँतोंवाले महान् मदस्रावी गजराजको अपने साथ युद्धके लिये बुलाता हो, उसी प्रकार तुम भी कुन्तीपुत्र धनंजयका रणक्षेत्रमें आह्वान करते हो ॥ २० ॥

बिलस्थं कृष्णसर्पं त्वं बाल्यात् काष्ठेन विध्यसि । महाविषं पूर्णकोपं यत् पार्थं योद्धुमिच्छसि ॥ २१ ॥ ‘तुम यदि पूर्णतः क्रोधमें भरे हुए अर्जुनके साथ जूझना चाहते हो तो मूर्खतावश बिलमें बैठे हुए महाविषैले काले सर्पको किसी काठकी छड़ीसे बींध रहे हो ॥ २१ ॥

सिंहं केसरिणं क्रुद्धमतिक्रम्याभिनर्दसे । शृगाल इव मूढस्त्वं नृसिंहं कर्ण पाण्डवम् ॥ २२ ॥ ‘कर्ण! तुम मूर्ख हो; जैसे गीदड़ क्रोधमें भरे हुए केसरी सिंहका अनादर करके गर्जना करे, उसी प्रकार तुम भी मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी और क्रोधमें भरे हुए पाण्डुकुमार अर्जुनका लंघन करके गरज रहे हो ॥ २२ ॥

सुपर्णं पतगश्रेष्ठं वैनतेयं तरस्विनम् । भोगीवाह्वयसे पाते कर्ण पार्थं धनंजयम् ॥ २३ ॥ ‘कर्ण! जैसे कोई सर्प अपने पतनके लिये ही पक्षियोंमें श्रेष्ठ वेगशाली विनतानन्दन गरुडका आह्वान करता है, उसी प्रकार तुम भी अपने विनाशके लिये ही कुन्तीकुमार अर्जुनको ललकार रहे हो ॥ २३ ॥

सर्वाम्भसां निधिं भीमं मूर्तिमन्तं झषायुतम् । चन्द्रोदये विवर्धन्तमप्लवः संस्तितीर्षसि ॥ २४ ॥

'अरे! तुम चन्द्रोदयके समय बढ़ते हुए, जलजन्तुओंसे पूर्ण तथा उत्ताल तरंगोंसे व्याप्त अगाध जलराशिवाले भयंकर समुद्रको बिना किसी नावके ही केवल दोनों हाथोंके सहारे पार करना चाहते हो ।। २४ ।।

ऋषभं दुन्दुभिग्रीवं तीक्ष्णशृङ्गं प्रहारिणम् ।
वत्स आह्वयसे युद्धे कर्ण पार्थं धनंजयम् ।। २५ ।।
'बेटा कर्ण! दुन्दुभिकी ध्वनिके समान जिसका कंठस्वर गम्भीर है, जिसके सींग तीखे हैं तथा जो प्रहार करनेमें कुशल है, उस साँड़के समान पराक्रमी पृथापुत्र अर्जुनको तुम युद्धके लिये ललकार रहे हो ।। २५ ।।

महामेघं महाघोरं दर्दुरः प्रतिनर्दसि ।
बाणतोयप्रदं लोके नरपर्जन्यमर्जुनम् ।। २६ ।।
'जैसे महाभयंकर महामेघके मुकाबलेमें कोई मेढक टर्र-टर्र कर रहा हो, उसी प्रकार तुम संसारमें बाणरूपी जलकी वर्षा करनेवाले मानवमेघ अर्जुनको लक्ष्य करके गर्जना करते हो ।। २६ ।।

यथा च स्वगृहस्थः श्वा व्याघ्रं वनगतं भषेत् ।
तथा त्वं भषसे कर्ण नरव्याघ्रं धनंजयम् ।। २७ ।।
'कर्ण! जैसे अपने घरमें बैठा हुआ कोई कुत्ता वनमें रहनेवाले बाघकी ओर भूँके, उसी प्रकार तुम भी नरव्याघ्र अर्जुनको लक्ष्य करके भूँक रहे हो ।। २७ ।।

शृगालोऽपि वने कर्ण शशैः परिवृतो वसन् ।
मन्यते सिंहमात्मानं यावत् सिंहं न पश्यति ।। २८ ।।
'कर्ण! वनमें खरगोशोंके साथ रहनेवाला गीदड़ भी जबतक सिंहको नहीं देखता, तबतक अपनेको सिंह ही मानता रहता है ।। २८ ।।

तथा त्वमपि राधेय सिंहमात्मानमिच्छसि ।
अपश्यन् शत्रुदमनं नरव्याघ्रं धनंजयम् ।। २९ ।।
'राधानन्दन! उसी प्रकार तुम भी शत्रुओंका दमन करनेवाले पुरुषसिंह अर्जुनको न देखनेके कारण ही अपनेको सिंह समझना चाहते हो ।। २९ ।।

व्याघ्रं त्वं मन्यसेऽऽत्मानं यावत् कृष्णौ न पश्यसि ।
समास्थितावेकरथे सूर्याचन्द्रमसाविव ।। ३० ।।
'एक रथपर बैठे हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान सुशोभित श्रीकृष्ण और अर्जुनको जबतक तुम नहीं देख रहे हो, तभीतक अपनेको बाघ माने बैठे हो ।। ३० ।।

यावद् गाण्डीवघोषं त्वं न शृणोषि महाहवे ।
तावदेव त्वया कर्ण शक्यं वक्तुं यथेच्छसि ।। ३१ ।।
'कर्ण! महासमरमें जबतक गाण्डीवकी टंकार नहीं सुनते हो, तभीतक तुम जैसा चाहो, बक सकते हो ।। ३१ ।।

रथशब्दधनुःशब्दैर्नादयन्तं दिशो दश ।
नर्दन्तमिव शार्दूलं दृष्ट्वा क्रोष्टा भविष्यसि ॥ ३२ ॥
‘रथकी घर्घराहट और धनुषकी टंकारसे दसों दिशाओंको निनादित करते हुए सिंहसदृश अर्जुनको जब दहाड़ते देखोगे, तब तुरंत गीदड़ बन जाओगे ।। ३२ ।।
नित्यमेव शृगालस्त्वं नित्यं सिंहो धनंजयः ।
वीरप्रद्वेषणान्मूढ तस्मात् क्रोष्टेव लक्ष्यसे ॥ ३३ ॥
‘ओ मूढ! तुम सदासे ही गीदड़ हो और अर्जुन सदासे ही सिंह हैं। वीरोंके प्रति द्वेष रखनेके कारण ही तुम गीदड़-जैसे दिखायी देते हो ।। ३३ ।।
यथाखुः स्याद् विडालश्च श्वा व्याघ्रश्च बलाबले ।
यथा शृगालः सिंहश्च यथा च शशकुञ्जरौ ॥ ३४ ॥
‘जैसे चूहा और बिलाव, कुत्ता और बाघ, गीदड़ और सिंह तथा खरगोश और हाथी अपनी निर्बलता और प्रबलताके लिये प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार तुम निर्बल हो और अर्जुन सबल हैं ।। ३४ ।।
यथानृतं च सत्यं च यथा चापि विषामृते ।
तथा त्वमपि पार्थश्च प्रख्यातावात्मकर्मभिः ॥ ३५ ॥
‘जैसे झूठ और सच तथा विष और अमृत अपना अलग-अलग प्रभाव रखते हैं, उसी प्रकार तुम और अर्जुन भी अपने-अपने कर्मोंके लिये सर्वत्र विख्यात हो' ।। ३५ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्याधिक्षेपे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णके प्रति शल्यका आक्षेपविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३९ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1873)

⬅ विषय-सूची (TOC)

चत्वारिंशोऽध्यायः

कर्णका शल्यको फटकारते हुए मद्रदेशके निवासियोंकी निन्दा करना एवं उसे मार डालनेकी धमकी देना

संजय उवाच

अधिक्षिप्तस्तु राधेयः शल्येनामिततेजसा । शल्यमाह सुसंक्रुद्धो वाक्शल्यमवधारयन् ।। १ ।।

**संजय कहते हैं—**राजन्! अमिततेजस्वी शल्यके इस प्रकार आक्षेप करनेपर राधापुत्र कर्ण अत्यन्त कुपित हो उठा और यह वचनरूपी शल्य (बाण) छोड़नेके कारण ही इसका नाम शल्य पड़ा है, ऐसा निश्चय करके शल्यसे इस प्रकार बोला ।। १ ।।

कर्ण उवाच

गुणान् गुणवतां शल्य गुणवान् वेत्ति नागुणः । त्वं तु शल्य गुणैर्हीनः किं ज्ञास्यसि गुणागुणम् ।। २ ।।

**कर्णने कहा—**शल्य! गुणवान् पुरुषोंके गुणोंको गुणवान् ही जानता है, गुणहीन नहीं। तुम तो समस्त गुणोंसे शून्य हो; फिर गुण-अवगुण क्या समझोगे? ।। २ ।।

अर्जुनस्य महास्त्राणि क्रोधं वीर्यं धनुः शरान् । अहं शल्याभिजानामि विक्रमं च महात्मनः ।। ३ ।।

शल्य! मैं महात्मा अर्जुनके महान् अस्त्र, क्रोध, बल, धनुष, बाण और पराक्रमको अच्छी तरह जानता हूँ ।। ३ ।।

तथा कृष्णस्य माहात्म्यमृषभस्य महीक्षिताम् । यथाहं शल्य जानामि न त्वं जानासि तत् तथा ।। ४ ।।

शल्य! इसी प्रकार महीपालशिरोमणि श्रीकृष्णके माहात्म्यको जैसा मैं जानता हूँ, वैसा तुम नहीं जानते ।। ४ ।।

एवमेवात्मनो वीर्यमहं वीर्यं च पाण्डवे । जानन्नेवाह्वये युद्धे शल्य गाण्डीवधारिणम् ।। ५ ।।

शल्य! मैं अपना और पाण्डुपुत्र अर्जुनका बल-पराक्रम समझकर ही गाण्डीवधारी पार्थको युद्धके लिये बुलाता हूँ ।। ५ ।।

अस्ति वायमिषुः शल्य सुपुङ्खो रक्तभोजनः । एकतूणीशयः पत्री सुधौतः समलंकृतः ।। ६ ।।

शल्य! मेरा यह सुन्दर पंखोंसे युक्त बाण शत्रुओंका रक्त पीनेवाला है। यह अकेले ही एक तरकसमें रखा जाता है, जो बहुत ही स्वच्छ, कंकपत्रयुक्त और भलीभाँति अलंकृत

है॥ ६॥ शेते चन्दनचूर्णेषु पूजितो बहुलाः समाः। आहेयो विषवानुग्रो नराश्वद्विपसंघहा॥ ७॥ यह सर्पमय भयानक विषैला बाण बहुत वर्षोंतक चन्दनके चूर्णमें रखकर पूजित होता आया है, जो मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंके समुदायका संहार करनेवाला है॥ ७॥ घोररूपो महारौद्रस्तनुत्रास्थिविदारणः। निर्भिन्द्यां येन रुष्टोऽहमपि मेरुं महागिरिम्॥ ८॥ यह अत्यन्त भयंकर घोर बाण कवच तथा हड्डियोंको भी चीर देनेवाला है। मैं कुपित होनेपर इस बाणके द्वारा महान् पर्वत मेरुको भी विदीर्ण कर सकता हूँ॥ ८॥ तमहं जातु नास्येयमन्यस्मिन् फाल्गुनादृते। कृष्णाद् वा देवकीपुत्रात् सत्यं चापि शृणुष्व मे॥ ९॥ इस बाणको मैं अर्जुन अथवा देवकीपुत्र श्रीकृष्णको छोड़कर दूसरे किसीपर कभी नहीं छोड़ूँगा। मेरी सच्ची बातको तुम कान खोलकर सुन लो॥ ९॥ तेनाहमिषिणा शल्य वासुदेवधनंजयौ। योत्स्ये परमसंक्रुद्धस्तत् कर्म सदृशं मम॥ १०॥ शल्य! मैं अत्यन्त कुपित होकर उस बाणके द्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनके साथ युद्ध करूँगा और वह कार्य मेरे योग्य होगा॥ १०॥ सर्वेषां वृष्णिवीराणां कृष्णे लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता। सर्वेषां पाण्डुपुत्राणां जयः पार्थे प्रतिष्ठितः॥ ११॥ उभयं तु समासाद्य को निवर्तितुमर्हति। समस्त वृष्णिवंशी वीरोंकी सम्पत्ति श्रीकृष्णपर ही प्रतिष्ठित है और पाण्डुके सभी पुत्रोंकी विजय अर्जुनपर ही अवलम्बित है; फिर उन दोनोंको एक साथ युद्धमें पाकर कौन वीर पीछे लौट सकता है?॥ ११ १/२॥ तावेतौ पुरुषव्याघ्रौ समेतौ स्यन्दने स्थितौ॥ १२॥ मामेकमभिसंयातौ सुजातं पश्य शल्य मे। शल्य! वे दोनों पुरुषसिंह एक साथ रथपर बैठकर एकमात्र मुझपर आक्रमण करनेवाले हैं। देखो, मेरा जन्म कितना उत्तम है?॥ १२ १/२॥ पितृष्वसामातुलजौ भ्रातरावपराजितौ॥ १३॥ मणी सूत्र इव प्रोतौ द्रष्टासि निहतौ मया। धागेमें पिरोयी हुई दो मणियोंके समान प्रेमसूत्रमें बँधे हुए उन दोनों फुफेरे और ममेरे भाइयोंको, जो किसीसे पराजित नहीं होते, तुम मेरे द्वारा मारा गया देखोगे॥ १३ १/२॥ अर्जुने गाण्डिवं कृष्णे चक्रं तार्क्ष्यकपिध्वजौ॥ १४॥ भीरूणां त्रासजननं शल्य हर्षकरं मम।

अर्जुनके हाथमें गाण्डीव धनुष और श्रीकृष्णके हाथमें सुदर्शन चक्र है। एक कपिध्वज है तो दूसरा गरुड़ध्वज। शल्य! ये सब वस्तुएँ कायरोंको भय देनेवाली हैं; परंतु मेरा हर्ष बढ़ाती हैं ।। १४ १/२ ।। त्वं तु दुष्प्रकृतिमूढो महायुद्धेष्वकोविदः ।। १५ ।। भयावदीर्णः संत्रासादबद्धं बहु भाषसे । तुम तो दुष्ट स्वभावके मूर्ख मनुष्य हो। बड़े-बड़े युद्धोंमें कैसे शत्रुका सामना किया जाता है, इस बातसे अनभिज्ञ हो। भयसे तुम्हारा हृदय विदीर्ण-सा हो रहा है; अतः डरके मारे बहुत-सी असंगत बातें कह रहे हो ।। १५ १/२ ।। संस्तौषि तौ तु केनापि हेतुना त्वं कुदेशज ।। १६ ।। तौ हत्वा समरे हन्ता त्वामद्य सहबान्धवम् । पापदेशज दुर्बुद्धे क्षुद्र क्षत्रियपांसन ।। १७ ।। दुष्ट और पापी देशमें उत्पन्न हुए नीच क्षत्रिय-कुलांगार दुर्बुद्धि शल्य! तुम उन दोनोंकी किसी स्वार्थसिद्धिके लिये स्तुति करते हो; परंतु आज समरांगणमें उन दोनोंको मारकर बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारा भी वध कर डालूँगा ।। १६-१७ ।। सुहृद् भूत्वा रिपुः किं मां कृष्णाभ्यां भीषयिष्यसि । तौ वा मामद्य हन्तारौ हनिष्ये वापि तावहम् ।। १८ ।। तुम मेरे शत्रु होकर भी सुहृद् बनकर मुझे श्रीकृष्ण और अर्जुनसे क्यों डरा रहे हो। आज या तो वे ही दोनों मुझे मार डालेंगे या मैं ही उन दोनोंका संहार कर दूँगा ।। १८ ।। नाहं बिभेमि कृष्णाभ्यां विजानन्नात्मनो बलम् । वासुदेवसहस्रं वा फाल्गुनानां शतानि वा ।। १९ ।। अहमेको हनिष्यामि जोषमास्स्व कुदेशज । मैं अपने बलको अच्छी तरह जानता हूँ; इसलिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे कदापि नहीं डरता हूँ। नीच देशमें उत्पन्न शल्य! तुम चुप रहो। मैं अकेला ही सहस्रों श्रीकृष्णों और सैकड़ों अर्जुनोको मार डालूँगा ।। स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च प्रायः क्रीडागता जनाः ।। २० ।। या गाथाः सम्प्रगायन्ति कुर्वन्तोऽध्ययनं यथा । ता गाथाः शृणु मे शल्य मद्रकेषु दुरात्मसु ।। २१ ।। ब्राह्मणैः कथिताः पूर्वं यथावद् राजसंनिधौ । श्रुत्वा चैकमना मूढ क्षम वा ब्रूहि चोत्तरम् ।। २२ ।। मूर्ख शल्य! स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े लोग, खेलकूदमें लगे हुए मनुष्य और स्वाध्याय करनेवाले पुरुष भी दुरात्मा मद्रनिवासियोंके विषयमें जिन गाथाओंको गाया करते हैं तथा ब्राह्मणोंने पहले राजाके समीप आकर यथावत् रूपसे जिनका वर्णन किया है, उन

गाथाओंको एकाग्रचित्त होकर मुझसे सुनो और सुनकर चुपचाप सह लो या जवाब दो॥ २०—२२॥

मित्रध्रुङ्मद्रको नित्यं यो नो द्वेष्टि स मद्रकः। मद्रके संगतं नास्ति क्षुद्रवाक्ये नराधमे॥ २३॥ मद्रदेशका अधम मनुष्य सदा मित्रद्रोही होता है। जो हमलोगोंसे अकारण द्वेष करता है, वह मद्रदेशका ही अधम मनुष्य है। क्षुद्रतापूर्ण वचन बोलनेवाले मद्रदेशके निवासीमें किसीके प्रति सौहार्दकी भावना नहीं होती॥

दुरात्मा मद्रको नित्यं नित्यमानृतिकोऽनृजुः। यावदन्त्यं हि दौरात्म्यं मद्रकेष्विति नः श्रुतम्॥ २४॥ मद्रनिवासी मनुष्य सदा ही दुरात्मा, सर्वदा झूठ बोलनेवाला और सदा ही कुटिल होता है। हमने सुन रखा है कि मद्रनिवासियोंमें मरते दमतक दुष्टता बनी रहती है॥ २४॥

पिता पुत्रश्च माता च श्वश्रूश्वशुरमातुलाः। जामाता दुहिता भ्राता नप्तान्ये ते च बान्धवाः॥ २५॥ वयस्याभ्यागताश्चान्ये दासीदासं च संगतम्। पुम्भिर्विमिश्रा नार्यश्च ज्ञाताज्ञाताः स्वयेच्छया॥ २६॥ येषां गृहेष्वशिष्टानां सक्तुमत्स्याशिनां तथा। पीत्वा सीधु सगोमांसं क्रन्दन्ति च हसन्ति च॥ २७॥ गायन्ति चाप्यबद्धानि प्रवर्तन्ते च कामतः। कामप्रलापिनोऽन्योन्यं तेषु धर्मः कथं भवेत्॥ २८॥ मद्रकेष्ववलिप्तेषु प्रख्याताशुभकर्मसु। सत्तू और मांस खानेवाले जिन अशिष्ट मद्रनिवासियोंके घरोंमें पिता, पुत्र, माता, सास, ससुर, मामा, बेटी, दामाद, भाई, नाती, पोते, अन्यान्य बन्धु-बान्धव, समवयस्क मित्र, दूसरे अभ्यागत अतिथि और दास-दासी—ये सभी अपनी इच्छाके अनुसार एक-दूसरेसे मिलते हैं। परिचित-अपरिचित सभी स्त्रियाँ सभी पुरुषोंसे सम्पर्क स्थापित कर लेती हैं और गोमांससहित मदिरा पीकर रोती, हँसती, गाती, असंगत बातें करती तथा कामभावसे किये जानेवाले कार्योंमें प्रवृत्त होती हैं। जिनके यहाँ सभी स्त्री-पुरुष एक-दूसरेसे कामसम्बन्धी प्रलाप करते हैं, जिनके पापकर्म सर्वत्र विख्यात हैं, उन घमंडी मद्रनिवासियोंमें धर्म कैसे रह सकता है?॥

नापि वैरं न सौहार्दं मद्रकेण समाचरेत्॥ २९॥ मद्रके संगतं नास्ति मद्रको हि सदामलः। मद्रनिवासीके साथ न तो वैर करे और न मित्रता ही स्थापित करे, क्योंकि उसमें सौहार्दकी भावना नहीं होती। मद्रनिवासी सदा पापमें ही डूबा रहता है॥ २९ १/२॥

मद्रकेषु च संसृष्टं शौचं गान्धारकेषु च॥ ३०॥

राजयाजकयाज्ये च नष्टं दत्तं हविर्भवेत् ।
शूद्रसंस्कारको विप्रो यथा याति पराभवम् ॥ ३१ ॥
यथा ब्रह्मद्विषो नित्यं गच्छन्तीह पराभवम् ।
यथैव संगतं कृत्वा नरः पतति मद्रकैः ॥ ३२ ॥
मद्रके संगतं नास्ति हतं वृश्चिक ते विषम् ।
आथर्वणेन मन्त्रेण यथा शान्तिः कृता मया ॥ ३३ ॥
‘ओ बिच्छू! जैसे मद्रनिवासियोंके पास रखी हुई धरोहर और गान्धारनिवासियोंमें शौचाचार नष्ट हो जाते हैं, जहाँ क्षत्रिय पुरोहित हो उस यजमानके यज्ञमें दिया हुआ हविष्य जैसे नष्ट हो जाता है, जैसे शूद्रोंका संस्कार करानेवाला ब्राह्मण पराभवको प्राप्त होता है, जैसे ब्रह्मद्रोही मनुष्य इस जगत्‌में सदा ही तिरस्कृत होते रहते हैं, जैसे मद्रनिवासियोंके साथ मित्रता करके मनुष्य पतित हो जाता है तथा जिस प्रकार मद्रनिवासीमें सौहार्दकी भावना सर्वथा नष्ट हो गयी है, उसी प्रकार तेरा यह विष भी नष्ट हो गया। मैंने अथर्ववेदके मन्त्रसे तेरे विषको शान्त कर दिया’ ॥ ३०—३३ ॥

इति वृश्चिकदष्टस्य विषवेगहतस्य च ।
कुर्वन्ति भेषजं प्राज्ञाः सत्यं तच्चापि दृश्यते ॥ ३४ ॥
ये उपर्युक्त बातें कहकर जो बुद्धिमान् विषवैद्य बिच्छूके काटनेपर उसके विषके वेगसे पीड़ित हुए मनुष्यकी चिकित्सा या औषध करते हैं, उनका वह कथन सत्य ही दिखायी देता है ॥ ३४ ॥

एवं विद्वञ्जोषमास्स्व शृणु चात्रोत्तरं वचः ।
वासांस्युत्सृज्य नृत्यन्ति स्त्रियो या मद्यमोहिताः ॥ ३५ ॥
मैथुनेऽसंयताश्चापि यथाकामवराश्च ताः ।
तासां पुत्रः कथं धर्मं मद्रको वक्तुमर्हति ॥ ३६ ॥
विद्वान् राजा शल्य! ऐसा समझकर तुम चुपचाप बैठे रहो और इसके बाद जो बात मैं कह रहा हूँ, उसे भी सुन लो। जो स्त्रियाँ मद्यसे मोहित हो कपड़े उतारकर नाचती हैं, मैथुनमें संयम एवं मर्यादाको छोड़कर प्रवृत्त होती हैं और अपनी इच्छाके अनुसार जिस किसी पुरुषका वरण कर लेती हैं, उनका पुत्र मद्रनिवासी नराधम दूसरोंको धर्मका उपदेश कैसे कर सकता है? ॥ ३५-३६ ॥

यास्तिष्ठन्त्यः प्रमेहन्ति यथैवोष्ट्रदशेरकाः ।
तासां विभ्रष्टधर्माणां निर्लज्जानां ततस्ततः ॥ ३७ ॥
त्वं पुत्रस्तादृशीनां हि धर्मं वक्तुमिहेच्छसि ।
जो ऊँटों और गदहोंके समान खड़ी-खड़ी मूतती हैं तथा जो धर्मसे भ्रष्ट होकर लज्जाको तिलांजलि दे चुकी हैं, वैसी मद्रनिवासिनी स्त्रियोंके पुत्र होकर तुम मुझे यहाँ धर्मका उपदेश करना चाहते हो ॥ ३७ १/२ ॥

सुवीरकं याच्यमाना मद्रिका कर्षति स्फिचौ ॥ ३८ ॥ अदातुकामा वचनमिदं वदति दारुणम् । मा मां सुवीरकं कश्चिद् याचतां दयितं मम ॥ ३९ ॥ पुत्रं दद्यां पतिं दद्यां न तु दद्यां सुवीरकम् । यदि कोई पुरुष मद्रदेशकी किसी स्त्रीसे कांजी माँगता है तो वह उसकी कमर पकड़कर खींच ले जाती है और कांजी न देनेकी इच्छा रखकर यह कठोर वचन बोलती है—'कोई मुझसे कांजी न माँगे, क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। मैं अपने पुत्रको दे दूँगी, पतिको भी दे दूँगी; परंतु कांजी नहीं दे सकती' ॥ ३८-३९ १/२ ॥

गौर्यो बृहत्यो निर्ह्रीका मद्रिकाः कम्बलावृताः ॥ ४० ॥ घस्मरा नष्टशौचाश्च प्राय इत्यनुशुश्रुम । मद्रदेशकी स्त्रियाँ प्रायः गोरी, लंबे कदवाली, निर्लज्ज, कम्बलसे शरीरको ढकनेवाली, बहुत खानेवाली और अत्यन्त अपवित्र होती हैं, ऐसा हमने सुन रखा है ॥ ४० १/२ ॥

एवमादि मयान्यैर्वा शक्यं वक्तुं भवेद् बहु ॥ ४१ ॥ आकेशाग्रान्नखाग्राच्च वक्तव्येषु कुकर्मसु । मद्रनिवासी सिरकी चोटीसे लेकर पैरोंके नखाग्रभागतक निन्दाके ही योग्य हैं। वे सब-के-सब कुकर्ममें लगे रहते हैं। उनके विषयमें हम तथा दूसरे लोग भी ऐसी बहुत-सी बातें कह सकते हैं ॥ ४१ १/२ ॥

मद्रकाः सिन्धुसौवीराः धर्मं विद्युः कथं त्विह ॥ ४२ ॥ पापदेशोद्भवा म्लेच्छा धर्माणामविचक्षणाः । मद्र तथा सिन्धु-सौवीर देशके लोग पापपूर्ण देशमें उत्पन्न हुए म्लेच्छ हैं। उन्हें धर्म-कर्मका पता नहीं है। वे इस जगत्में धर्मकी बातें कैसे समझ सकते हैं? ॥ ४२ १/२ ॥

एष मुख्यतमो धर्मः क्षत्रियस्येति नः श्रुतम् ॥ ४३ ॥ यदाजौ निहतः शेते सद्भिः समभिपूजितः । हमने सुना है कि क्षत्रियके लिये सबसे श्रेष्ठ धर्म यह है कि वह युद्धमें मारा जाकर रणभूमिमें सो जाय और सत्पुरुषोंके आदरका पात्र बने ॥ ४३ १/२ ॥

आयुधानां साम्पराये यन्मुच्येयमहं ततः ॥ ४४ ॥ ममैष प्रथमः कल्पो निधने स्वर्गमिच्छतः । मैं अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा किये जानेवाले युद्धमें अपने प्राणोंका परित्याग करूँ, यही मेरे लिये प्रथम श्रेणीका कार्य है; क्योंकि मैं मृत्युके पश्चात् स्वर्ग पानेकी अभिलाषा रखता हूँ ॥ ४४ १/२ ॥

सोऽयं प्रियः सखा चास्मि धार्तराष्ट्रस्य धीमतः ॥ ४५ ॥ तदर्थे हि मम प्राणा यच्च मे विद्यते वसु ।

व्यक्तं त्वमप्युपहितः पाण्डवैः पापदेशज ।। ४६ ।। यथा चामित्रवत् सर्वं त्वमस्मासु प्रवर्तसे । मैं बुद्धिमान् दुर्योधनका प्रिय मित्र हूँ। अतः मेरे पास जो कुछ धन-वैभव है, वह और मेरे प्राण भी उसीके लिये हैं। परंतु पापदेशमें उत्पन्न हुए शल्य! यह स्पष्ट जान पड़ता है कि पाण्डवोंने तुम्हें हमारा भेद लेनेके लिये ही यहाँ रख छोड़ा है; क्योंकि तुम हमारे साथ शत्रुके समान ही सारा बर्ताव कर रहे हो ।। ४५-४६ १/२ ।।

कामं न खलु शक्योऽहं त्वद्विधानां शतैरपि ।। ४७ ।। संग्रामाद् विमुखः कर्तुं धर्मज्ञ इव नास्तिकैः । जैसे सैकड़ों नास्तिक मिलकर भी धर्मज्ञ पुरुषको धर्मसे विचलित नहीं कर सकते, उसी प्रकार तुम्हारे-जैसे सैकड़ों मनुष्योंके द्वारा भी मुझे संग्रामसे विमुख नहीं किया जा सकता, यह निश्चय है ।। ४७ १/२ ।।

सारङ्ग इव घर्मार्तः कामं विलप शुष्य च ।। ४८ ।। नाहं भीषयितुं शक्यः क्षत्रवृत्ते व्यवस्थितः । तुम धूपसे संतप्त हुए हरिणके समान चाहे विलाप करो चाहे सूख जाओ। क्षत्रियधर्ममें स्थित हुए मुझ कर्णको तुम डरा नहीं सकते ।। ४८ १/२ ।।

तनुत्यजां नृसिंहानामाहवेष्वनिवर्तिनाम् ।। ४९ ।। या गतिर्गुरुणा प्रोक्ता पुरा रामेण तां स्मरे । पूर्वकालमें गुरुवर परशुरामजीने युद्धमें पीठ न दिखानेवाले एवं शत्रुका सामना करते हुए प्राण विसर्जन कर देनेवाले पुरुषसिंहोंके लिये जो उत्तम गति बतायी है, उसे मैं सदा याद रखता हूँ ।। ४९ १/२ ।।

तेषां त्राणार्थमुद्यन्तं वधार्थं द्विषतामपि ।। ५० ।। विद्धि मामास्थितं वृत्तं पौरूरवसमुत्तमम् । शल्य! तुम यह जान लो कि मैं धृतराष्ट्रके पुत्रोंकी रक्षाके लिये वैरियोँका वध करनेके लिये उद्यत हो राजा पुरूरवाके उत्तम* चरित्रका आश्रय लेकर युद्धभूमिमें डटा हुआ हूँ ।। ५० १/२ ।।

न तद् भूतं प्रपश्यामि त्रिषु लोकेषु मद्रप ।। ५१ ।। यो मामस्मादभिप्रायाद् वारयेदिति मे मतिः । मद्रराज! मैं तीनों लोकोंमें किसी ऐसे प्राणीको नहीं देखता, जो मुझे मेरे इस संकल्पसे विचलित कर दे, यह मेरा दृढ़ निश्चय है ।। ५१ १/२ ।।

एवं विद्वञ्जोषमास्व त्रासात् किं बहु भाषसे ।। ५२ ।। मा त्वां हत्वा प्रदास्यामि क्रव्याद्भ्यो मद्रकाधम ।

समझदार शल्य! ऐसा जानकर चुपचाप बैठे रहो। डरके मारे बहुत बड़बड़ाते क्यों हो। मद्रदेशके नराधम! यदि तुम चुप न हुए तो तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े करके मांसभक्षी प्राणियोंको बाँट दूँगा ।। ५२ ½ ।।
मित्रप्रतीक्षया शल्य धृतराष्ट्रस्य चोभयोः ।। ५३ ।।
अपवादतितिक्षाभिस्त्रिभिरेतैर्हि जीवसि ।
शल्य! एक तो मैं मित्र दुर्योधन और राजा धृतराष्ट्र दोनोंके कार्यकी ओर दृष्टि रखता हूँ, दूसरे अपनी निन्दासे डरता हूँ और तीसरे मैंने क्षमा करनेका वचन दिया है—इन्हीं तीन कारणोंसे तुम अबतक जीवित हो ।। ५३ ½ ।।
पुनश्चेदीदृशं वाक्यं मद्रराज वदिष्यसि ।। ५४ ।।
शिरस्ते पातयिष्यामि गदया वज्रकल्पया ।
मद्रराज! यदि फिर ऐसी बात बोलोगे तो मैं अपनी वज्र-सरीखी गदासे तुम्हारा मस्तक चूर-चूर करके गिरा दूँगा ।। ५४ ½ ।।
श्रोतारस्त्विदमद्येह द्रष्टारो वा कुदेशज ।। ५५ ।।
कर्णं वा जघ्नतुः कृष्णौ कर्णो वा निजघान तौ ।
नीच देशमें उत्पन्न शल्य! आज यहाँ सुननेवाले सुनेंगे और देखनेवाले देख लेंगे कि 'श्रीकृष्ण और अर्जुनने कर्णको मारा या कर्णने ही उन दोनोंको मार गिराया' ।। ५५ ½ ।।
एवमुक्त्वा तु राधेयः पुनरेव विशाम्पते ।
अब्रवीन्मद्रराजानं याहि याहीत्यसम्भ्रमम् ।। ५६ ।।
प्रजानाथ! ऐसा कहकर राधापुत्र कर्णने बिना किसी घबराहटके पुनः मद्रराज शल्यसे कहा—‘चलो, चलो’ ।। ५६ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णमद्राधिपसंवादे चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४० ।।


* युद्धसे पीछे न हटना ही राजा पुरूरवाका उत्तम चरित्र है।

राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना

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एकचत्वारिंशोऽध्यायः

राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना

संजय उवाच

मारिषाधिरथेः श्रुत्वा वाचो युद्धाभिनन्दिनः ।
शल्योऽब्रवीत् पुनः कर्णं निदर्शनमिदं वचः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**माननीय नरेश! युद्धका अभिनन्दन करनेवाले अधिरथपुत्र कर्णकी पूर्वोक्त बात सुनकर फिर शल्यने उससे यह दृष्टान्तयुक्त बात कही— ॥ १ ॥

जातोऽहं यज्वनां वंशे संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् ।
राज्ञां मूर्धाभिषिक्तानां स्वयं धर्मपरायणः ॥ २ ॥
'सूतपुत्र! मैं युद्धमें पीठ न दिखानेवाले यज्ञपरायण, मूर्धाभिषिक्त नरेशोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ और स्वयं भी धर्ममें तत्पर रहता हूँ ॥ २ ॥

यथैव मत्तो मद्येन त्वं तथा लक्ष्यसे वृष ।
तथाद्य त्वां प्रमाद्यन्तं चिकित्सेयं सुहृत्तया ॥ ३ ॥
किंतु वृषभस्वरूप कर्ण! जैसे कोई मदिरासे मतवाला हो गया हो, उसी प्रकार तुम भी उन्मत्त दिखायी दे रहे हो; अतः मैं हितैषी सुहृद् होनेके नाते तुम-जैसे प्रमत्तकी आज चिकित्सा करूँगा ॥ ३ ॥

इमां काकोपमां कर्ण प्रोच्यमानां निबोध मे ।
श्रुत्वा यथेष्टं कुर्यास्त्वं निहीन कुलपांसन ॥ ४ ॥
ओ नीच कुलांगार कर्ण! मेरे द्वारा बताये जानेवाले कौएके इस दृष्टान्तको सुनो और सुनकर जैसी इच्छा हो वैसा करो ॥ ४ ॥

नाहमात्मनि किंचिद् वै किल्बिषं कर्ण संस्मरे ।
येन मां त्वं महाबाहो हन्तुमिच्छस्यनागसम् ॥ ५ ॥
महाबाहु कर्ण! मुझे अपना कोई ऐसा अपराध नहीं याद आता है, जिसके कारण तुम मुझ निरपराधको भी मार डालनेकी इच्छा रखते हो ॥ ५ ॥

अवश्यं तु मया वाच्यं बुद्ध्यता त्वद्धिताहितम् ।
विशेषतो रथस्थेन राज्ञश्चैव हितैषिणा ॥ ६ ॥
मैं राजा दुर्योधनका हितैषी हूँ और विशेषतः रथपर सारथि बनकर बैठा हूँ; इसलिये तुम्हारे हिताहितको जानते हुए मेरा आवश्यक कर्तव्य है कि तुम्हें वह सब बता दूँ ॥ ६ ॥

समं च विषमं चैव रथिनश्च बलाबलम् । श्रमः खेदश्च सततं हयानां रथिना सह ॥ ७ ॥ आयुधस्य परिज्ञानं रुतं च मृगपक्षिणाम् । भारश्चाप्यतिभारश्च शल्यानां च प्रतिक्रिया ॥ ८ ॥ अस्त्रयोगश्च युद्धं च निमित्तानि तथैव च । सर्वमेतन्मया ज्ञेयं रथस्यास्य कुटुम्बिना ॥ ९ ॥ अतस्त्वां कथये कर्ण निदर्शनमिदं पुनः । सम और विषम अवस्था, रथीकी प्रबलता और निर्बलता, रथीके साथ ही घोड़ोंके सतत परिश्रम और कष्ट, अस्त्र हैं या नहीं, इसकी जानकारी, जय और पराजयकी सूचना देनेवाली पशु-पक्षियोंकी बोली, भार, अतिभार, शल्य-चिकित्सा, अस्त्रप्रयोग, युद्ध और शुभाशुभ निमित्त—इन सारी बातोंका ज्ञान रखना मेरे लिये आवश्यक है; क्योंकि मैं इस रथका एक कुटुम्बी हूँ। कर्ण! इसीलिये मैं पुनः तुमसे इस दृष्टान्तका वर्णन करता हूँ— ॥ ७—९ १/२ ॥

वैश्यः किल समुद्रान्ते प्रभूतधनधान्यवान् ॥ १० ॥ यज्वा दानपतिः क्षान्तः स्वकर्मस्थोऽभवच्छुचिः । बहुपुत्रः प्रियापत्यः सर्वभूतानुकम्पकः ॥ ११ ॥ राज्ञो धर्मप्रधानस्य राष्ट्रे वसति निर्भयः । कहते हैं समुद्रके तटपर किसी धर्मप्रधान राजाके राज्यमें एक प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न वैश्य रहता था। वह यज्ञ-यागादि करनेवाला, दानपति, क्षमाशील, अपने वर्णानुकूल कर्ममें तत्पर, पवित्र, बहुत-से पुत्रवाला, संतानप्रेमी और समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाला था ॥ १०-११ १/२ ॥

पुत्राणां तस्य बालानां कुमाराणां यशस्विनाम् ॥ १२ ॥ काको बहूनामभवदुच्छिष्टकृतभोजनः । उसके जो बहुत-से अल्पवयस्क यशस्वी पुत्र थे, उन सबकी जूठन खानेवाला एक कौआ भी वहाँ रहा करता था ॥ १२ १/२ ॥

तस्मै सदा प्रयच्छन्ति वैश्यपुत्राः कुमारकाः ॥ १३ ॥ मांसौदनं दधि क्षीरं पायसं मधुसर्पिषी । वैश्यके बालक उस कौएको सदा मांस, भात, दही, दूध, खीर, मधु और घी आदि दिया करते थे ॥ १३ १/२ ॥

स चोच्छिष्टभृतः काको वैश्यपुत्रैः कुमारकैः ॥ १४ ॥ सदृशान् पक्षिणो दृप्तः श्रेयसश्चाधिचिक्षिपे ।

वैश्यके बालकोंद्वारा जूठन खिला-खिलाकर पाला हुआ वह कौआ बड़े घमंडमें भरकर अपने समान तथा अपनेसे श्रेष्ठ पक्षियोंका भी अपमान करने लगा ।। १४ १/२ ।।
अथ हंसाः समुद्रान्ते कदाचिदतिपातिनः ।। १५ ।।
गरुडस्य गतौ तुल्याश्चक्राङ्गा हृष्टचेतसः ।
एक दिनकी बात है, उस समुद्रके तटपर गरुड़के समान लंबी उड़ानें भरनेवाले मानसरोवरनिवासी राजहंस आये। उनके अंगोंमें चक्रके चिह्न थे और वे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न थे ।। १५ १/२ ।।
कुमारकास्तदा हंसान् दृष्ट्वा काकमथाब्रुवन् ।। १६ ।।
भवानेव विशिष्टो हि पतत्रिभ्यो विहङ्गम ।
(एतेऽतिपातिनः पश्य विहङ्गान् वियदाश्रितान् ।
एभिस्त्वमपि शक्तो हि कामान्न पतितं त्वया ।।)
उस समय उन हंसोंको देखकर कुमारोंने कौएसे इस प्रकार कहा—‘विहंगम! तुम्हीं समस्त पक्षियोंमें श्रेष्ठ हो। देखो, ये आकाशचारी हंस आकाशमें जाकर बड़ी दूरकी उड़ानें भरते हैं। तुम भी इन्हींके समान दूरतक उड़नेमें समर्थ हो। तुमने अपनी इच्छासे ही अबतक वैसी उड़ान नहीं भरी’ ।। १६ १/२ ।।
प्रतार्यमाणस्तैः सर्वैरल्पबुद्धिभिरण्डजः ।। १७ ।।
तद्वचः सत्यमित्येव मौर्ख्याद् दर्पाच्च मन्यते ।
उन सारे अल्पबुद्धि बालकोंद्वारा ठगा गया वह पक्षी मूर्खता और अभिमानसे उनकी बातको सत्य मानने लगा ।। १७ १/२ ।।
तान् सोऽभिपत्य जिज्ञासुः क एषां श्रेष्ठभागिति ।। १८ ।।
उच्छिष्टदर्पितः काको बहूनां दूरपातिनाम् ।
तेषां यं प्रवरं मेने हंसानां दूरपातिनाम् ।। १९ ।।
तमाह्वयत दुर्बुद्धिः पताव इति पक्षिणम् ।
फिर वह जूठनपर घमंड करनेवाला कौआ इन हंसोंमें सबसे श्रेष्ठ कौन है? यह जाननेकी इच्छासे उड़कर उनके पास गया और दूरतक उड़नेवाले उन बहुसंख्यक हंसोंमेंसे जिस पक्षीको उसने श्रेष्ठ समझा, उसीको उस दुर्बुद्धिने ललकारते हुए कहा—‘चलो, हम दोनों उड़ें’ ।। १८-१९ १/२ ।।
तच्छ्रुत्वा प्राहसन् हंसा ये तत्रासन् समागताः ।। २० ।।
भाषतो बहु काकस्य बलिनः पततां वराः ।
इदमूचुः स्म चक्राङ्गा वचः काकं विहङ्गमाः ।। २१ ।।
बहुत काँव-काँव करनेवाले उस कौएकी वह बात सुनकर वहाँ आये हुए वे पक्षियोंमें श्रेष्ठ आकाशचारी बलवान् चक्रांग हँस पड़े और कौएसे इस प्रकार बोले ।। २०-२१ ।।

हंसा ऊचुः

वयं हंसाश्चरामेमां पृथिवीं मानसौकसः ।
पक्षिणां च वयं नित्यं दूरपातेन पूजिताः ॥ २२ ॥
**हंसोंने कहा—**काक! हम मानसरोवरनिवासी हंस हैं, जो सदा इस पृथ्वीपर विचरते रहते हैं। दूरतक उड़नेके कारण हमलोग सदा सभी पक्षियोंमें सम्मानित होते आये हैं ॥ २२ ॥

कथं हंसं नु बलिनं चक्राङ्गं दूरपातिनम् ।
काको भूत्वा निपतने समाह्वयसि दुर्मते ॥ २३ ॥
कथं त्वं पतिता काक सहास्माभिर्ब्रवीहि तत् ।
ओ खोटी बुद्धिवाले काग! तू कौआ होकर लंबी उड़ान भरनेवाले और अपने अंगोंमें चक्रका चिह्न धारण करनेवाले एक बलवान् हंसको अपने साथ उड़नेके लिये कैसे ललकार रहा है? काग! बता तो सही, तू हमारे साथ किस प्रकार उड़ेगा? ॥ २३ १/२ ॥

अथ हंसवचो मूढः कुत्सयित्वा पुनः पुनः ।
प्रजगादोत्तरं काकः कथनो जातिलाघवात् ॥ २४ ॥
हंसकी बात सुनकर बढ़-बढ़कर बातें बनानेवाले मूर्ख कौएने अपनी जातिगत क्षुद्रताके कारण बारंबार उसकी निन्दा करके उसे इस प्रकार उत्तर दिया ॥ २४ ॥

काक उवाच

शतमेकं च पातानां पतितास्मि न संशयः ।
शतयोजनमेकैकं विचित्रं विविधं तथा ॥ २५ ॥
**कौआ बोला—**हंस! मैं एक सौ एक प्रकारकी उड़ानें उड़ सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। उनमेंसे प्रत्येक उड़ान सौ-सौ योजनकी होती है और वे सभी विभिन्न प्रकारकी एवं विचित्र हैं ॥ २५ ॥

उड्डीनमवडीनं च प्रडीनं डीनमेव च ।
निडीनमथ संडीनं तिर्यक् डीनगतानि च ॥ २६ ॥
विडीनं परिडीनं च पराडीनं सुडीनकम् ।
अभिडीनं महाडीनं निर्डीनमतिडीनकम् ॥ २७ ॥
अवडीनं प्रडीनं च संडीनं डीनडीनकम् ।
संडीनोड्डीनडीनं च पुनर्डीनविडीनकम् ॥ २८ ॥
सम्पातं समुदीषं च ततोऽन्यद् व्यतिरिक्तकम् ।
गतागतप्रतिगतं बह्लींश्च निकुलीनकाः ॥ २९ ॥
उनमेंसे कुछ उड़ानोंके, नाम इस प्रकार हैं—उड्डीन (ऊँचा उड़ना), अवडीन (नीचा उड़ना), प्रडीन (चारों ओर उड़ना), डीन (साधारण उड़ना), निडीन (धीरे-धीरे उड़ना),

संडीन (ललित गतिसे उड़ना), तिर्यग्डीन (तिरछा उड़ना), विडीन (दूसरोंकी चालकी नकल करते हुए उड़ना), परिडीन (सब ओर उड़ना), पराडीन (पीछेकी ओर उड़ना), सुडीन (स्वर्गकी ओर उड़ना), अभिडीन (सामनेकी ओर उड़ना), महाडीन (बहुत वेगसे उड़ना), निर्डीन (परोंको हिलाये बिना ही उड़ना), अतिडीन (प्रचण्डतासे उड़ना), संडीन डीनडीन (सुन्दर गतिसे आरम्भ करके फिर चक्कर काटकर नीचेकी ओर उड़ना), संडीनोड्डीनडीन (सुन्दर गतिसे आरम्भ करके फिर चक्कर काटकर ऊँचा उड़ना), डीनविडीन (एक प्रकारकी उड़ानमें दूसरी उड़ान दिखाना), सम्पात (क्षणभर सुन्दरतासे उड़कर फिर पंख फड़फड़ाना), समुदीष (कभी ऊपरकी ओर और कभी नीचेकी ओर उड़ना) और व्यतिरिक्तक (किसी लक्ष्यका संकल्प करके उड़ना), —ये छब्बीस उड़ानें हैं। इनमेंसे महाडीनके सिवा अन्य सब उड़ानोंके, ‘गत’ (किसी लक्ष्यकी ओर जाना), ‘आगत’ (लक्ष्यतक पहुँचकर लौट आना) और ‘प्रतिगत’ (पलटा खाना)—ये तीन भेद हैं (इस प्रकार कुल छिहत्तर भेद हुए)। इसके सिवा बहुत-से (अर्थात् पचीस) निपात भी हैं।* (ये सब मिलकर एक सौ एक उड़ानें होती हैं) ।।

कर्तास्मि मिषतां वोऽद्य ततो द्रक्ष्यथ मे बलम् ।
तेषामन्यतमेनाहं पतिष्यामि विहायसम् ।। ३० ।।
प्रदिशध्वं यथान्यायं केन हंसाः पताम्यहम् ।
आज मैं तुमलोगोंके देखते-देखते जब इतनी उड़ानें भरूँगा, उस समय मेरा बल तुम देखोगे। मैं इनमेंसे किसी भी उड़ानसे आकाशमें उड़ सकूँगा। हंसो! तुमलोग यथोचितरूपसे विचार करके बताओ कि ‘मैं किस उड़ानसे उड़ूँ?’ ।। ३०१/२ ।।

ते वै ध्रुवं विनिश्चित्य पतध्वं न मया सह ।। ३१ ।।
पातैरेभिः खलु खगाः पतितुं खे निराश्रये ।
अतः पक्षियो! तुम सब लोग दृढ़ निश्चय करके आश्रयरहित आकाशमें इन विभिन्न उड़ानोंद्वारा उड़नेके लिये मेरे साथ चलो न ।। ३११/२ ।।

एवमुक्ते तु काकेन प्रहस्यैको विहंगमः ।। ३२ ।।
उवाच काकं राधेय वचनं तन्निबोध मे ।
राधापुत्र! कौएके ऐसा कहनेपर एक आकाशचारी हंसने हँसकर उससे जो कुछ कहा, वह मुझसे सुनो ।। ३२१/२ ।।

हंस उवाच
शतमेकं च पातानां त्वं काक पतिता ध्रुवम् ।। ३३ ।।
एकमेव तु यं पातं विदुः सर्वे विहंगमाः ।
तमहं पतिता काक नान्यं जानामि कञ्चन ।। ३४ ।।
पत त्वमपि ताम्राक्ष येन पातेन मन्यसे ।

हंस बोला- काग! तू अवश्य एक सौ एक उड़ानोंद्वारा उड़ सकता है। परंतु मैं तो

जिस एक उड़ानको सारे पक्षी जानते हैं उसीसे उड़ सकता हूँ, दूसरी किसी उड़ानका मुझे

पता नहीं है। लाल नेत्रवाले कौए? तू भी जिस उड़ानसे उचित समझे, उसीसे

उड़ ।। ३३-३४ १/२ ।।

अथ काकाः प्रजहसुर्ये तत्रासन् समागताः ।। ३५ ।।

कथमेकेन पातेन हंसः पातशतं जयेत् ।

एकेनैव शतस्यैष पातेनाभिभविष्यति ।। ३६ ।।

हंसस्य पतितं काको बलवानाशुविक्रमः ।

तब वहाँ आये हुए सारे कौए जोर-जोरसे हँसने लगे और आपसमें बोले- 'भला यह

हंस एक ही उड़ानसे सौ प्रकारकी उड़ानोंको कैसे जीत सकता है? यह कौआ बलवान् और

शीघ्रतापूर्वक उड़नेवाला है; अतः सौमेंसे एक ही उड़ानद्वारा हंसकी उड़ानको पराजित कर

देगा' ।। ३५-३६ १/२ ।।

प्रपेततुः स्पर्धया च ततस्तौ हंसवायसौ ।। ३७ ।।

एकपाती च चक्राङ्गः काकः पातशतेन च ।

पेतिवानथ चक्राङ्गः पेतिवानथ वायसः ।। ३८ ।।

तदनन्तर हंस और कौआ दोनों होड़ लगाकर उड़े। चक्रांग हंस एक ही गतिसे

उड़नेवाला था और कौआ सौ उड़ानोंसे। इधरसे चक्रांग उड़ा और उधरसे

कौआ ।। ३७-३८ ।।

विसिस्मापयिषुः पातैराचक्षाणोऽऽत्मनः क्रियाः ।

अथ काकस्य चित्राणि पतितानि मुहुर्मुहुः ।। ३९ ।।

दृष्ट्वा प्रमुदिताः काका विनेदुरधिकैः स्वरैः ।

कौआ विभिन्न उड़ानोंद्वारा दर्शकोंको आश्चर्य-चकित करनेकी इच्छासे अपने कार्योंका

बखान करता जा रहा था। उस समय कौएकी विचित्र उड़ानोंको बारंबार देखकर दूसरे कौए

बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोरसे काँव-काँव करने लगे ।। ३९ १/२ ।।

हंसांश्चावहसन्ति स्म प्रावदन्नप्रियाणि च ।। ४० ।।

उत्पत्योत्पत्य च मुहुर्मुहूर्तमिति चेति च ।

वृक्षाग्रेभ्यः स्थलेभ्यश्च निपतन्त्युतन्ति च ।। ४१ ।।

कुर्वाणा विविधान् रावानाशंसन्तो जयं तथा ।

वे दो-दो घड़ीपर बारंबार उड़-उड़कर कहते— 'देखो, कौएकी यह उड़ान, वह उड़ान'।

ऐसा कहकर वे हंसोंका उपहास करते और उन्हें कटु वचन सुनाते थे। साथ ही कौएकी

विजयके लिये शुभाशंसा करते और भाँति-भाँतिकी बोली बोलते हुए वे कभी वृक्षोंकी

शाखाओंसे भूतलपर और कभी भूतलसे वृक्षोंकी शाखाओंपर नीचे-ऊपर उड़ते रहते

थे ।। ४०-४१ १/२ ।।

हंसस्तु मृदुनैकेन विक्रान्तुमुपचक्रमे ।। ४२ ।। प्रत्यहीयत काकाच्च मुहूर्तमिव मारिष । आर्य! हंसने एक ही मृदुल गतिसे उड़ना आरम्भ किया था; अतः दो घड़ीतक वह कौएसे हारता-सा प्रतीत हुआ ।। ४२ १/२ ।। अवमन्य च हंसांस्तानिदं वचनमब्रुवन् ।। ४३ ।। योऽसावुत्पतितो हंसः सोऽसावेवं प्रहीयते । तब कौओंने हंसोंका अपमान करके इस प्रकार कहा—‘वह जो हंस उड़ा था, वह तो इस प्रकार कौएसे पिछड़ता जा रहा है!’ ।। ४३ १/२ ।। अथ हंसः स तच्छ्रुत्वा प्रापतत् पश्चिमां दिशम् ।। ४४ ।। उपर्युपरि वेनेन सागरं मकरालयम् । उड़नेवाले हंसने कौओंकी वह बात सुनकर बड़े वेगसे मकरालय समुद्रके ऊपर-ऊपर पश्चिम दिशाकी ओर उड़ना आरम्भ किया ।। ४४ १/२ ।। ततो भीः प्राविशत् काकं तदा तत्र विचेतसम् ।। ४५ ।। द्वीपद्रुमानपश्यन्तं निपातार्थे श्रमान्वितम् । इधर कौआ थक गया था। उसे कहीं आश्रय लेनेके लिये द्वीप या वृक्ष नहीं दिखायी दे रहे थे; अतः उसके मनमें भय समा गया और वह घबराकर अचेत-सा हो उठा ।। ४५ १/२ ।। निपतेयं क्व नु श्रान्त इति तस्मिञ्जलार्णवे ।। ४६ ।। अविषह्यः समुद्रो हि बहुसत्त्वगणालयः । महासत्त्वशतोद्भासी नभसोऽपि विशिष्यते ।। ४७ ।। कौआ सोचने लगा, ‘मैं थक जानेपर इस जलराशिमें कहाँ उतरूँगा? बहुत-से जल-जन्तुओंका निवासस्थान समुद्र मेरे लिये असह्य है। असंख्य महाप्राणियोंसे उद्भासित होनेवाला यह महासागर तो आकाशसे भी बढ़कर है’ ।। ४६-४७ ।। गाम्भीर्याद्धि समुद्रस्य न विशेषं हि सूतज । दिगम्बराम्भसः कर्ण समुद्रस्था विदुर्जनाः ।। ४८ ।। विदूरपातात् तोयस्य किं पुनः कर्ण वायसः । सूतपुत्र कर्ण! समुद्रमें विचरनेवाले मनुष्य भी उसकी गम्भीरताके कारण दिशाओंद्वारा आवृत उसकी जलराशिकी थाह नहीं जान पाते, फिर वह कौआ कुछ दूरतक उड़ने मात्रसे उस समुद्रके जलसमूहका पार कैसे पा सकता था? ।। ४८ १/२ ।। अथ हंसोऽप्यतिक्रम्य मुहूर्तमिति चेति च ।। ४९ ।। अवेक्षमाणस्तं काकं नाशकद् व्यपसर्पितुम् । उधर हंस दो घड़ीतक उड़कर इधर-उधर देखता हुआ कौएकी प्रतीक्षामें आगे न जा सका ।। ४९ १/२ ।।

अतिक्रम्य च चक्राङ्गः काकं तं समुदैक्षत ।। ५० ।। यावद् गत्वा पतत्येष काको मामिति चिन्तयन् । चक्रांग कौएको लाँघकर आगे बढ़ चुका था तो भी यह सोचकर उसकी प्रतीक्षा करने लगा कि यह कौआ भी उड़कर मेरे पास आ जाय ।। ५० १/२ ।।

ततः काको भृशं श्रान्तो हंसमभ्यागमत्तदा ।। ५१ ।। तं तथा हीयमानं तु हंसो दृष्ट्वाब्रवीदिदम् । उज्जिहीर्षुर्निमज्जन्तं स्मरन् सत्पुरुषव्रतम् ।। ५२ ।। तदनन्तर उस समय अत्यन्त थका-मादा कौआ हंसके समीप आया। हंसने देखा, कौएकी दशा बड़ी शोचनीय हो गयी है। अब यह पानीमें डूबनेहीवाला है। तब उसने सत्पुरुषोंके व्रतका स्मरण करके उसके उद्धारकी इच्छा मनमें लेकर इस प्रकार कहा ।। ५१-५२ ।।

हंस उवाच

बहूनि पतितानि त्वमाचक्षाणो मुहुर्मुहुः । पातस्य व्याहरंश्चेदं न नो गुह्यं प्रभाषसे ।। ५३ ।। हंस बोला—काग! तू तो बारंबार अपनी बहुत-सी उड़ानोंका बखान कर रहा था; परंतु उन उड़ानोंका वर्णन करते समय उनमेंसे इस गोपनीय रहस्ययुक्त उड़ानकी बात तो तूने नहीं बतायी थी ।। ५३ ।।

किं नाम पतितं काक यत्त्वं पतसि साम्प्रतम् । जलं स्पृशसि पक्षाभ्यां तुण्डेन च पुनः पुनः ।। ५४ ।। कौए! बता तो सही, तू इस समय जिस उड़ानसे उड़ रहा है, उसका क्या नाम है? इस उड़ानमें तो तू अपने दोनों पंखों और चोंचके द्वारा जलका बार-बार स्पर्श करने लगा है ।। ५४ ।।

प्रब्रूहि कतमे तत्र पाते वर्तसि वायस । एह्येहि काक शीघ्रं त्वमेष त्वां प्रतिपालये ।। ५५ ।। वायस! बता, बता। इस समय तू कौन-सी उड़ानमें स्थित है। कौए! आ, शीघ्र आ। मैं अभी तेरी रक्षा करता हूँ ।। ५५ ।।

शल्य उवाच

स पक्षाभ्यां स्पृशन्नार्तस्तुण्डेन च जलं तदा । दृष्टो हंसेन दुष्टात्मन्निदं हंसं ततोऽब्रवीत् ।। ५६ ।। अपश्यन्नम्भसः पारं निपतंश्च श्रमान्वितः । पातवेगप्रमथितो हंसं काकोऽब्रवीदिदम् ।। ५७ ।।

**शल्य कहते हैं—**दुष्टात्मा कर्ण! वह कौआ अत्यन्त पीड़ित हो जब अपनी दोनों पाँखों और चोंचसे जलका स्पर्श करने लगा, उस अवस्थामें हंसने उसे देखा। वह उड़ानके वेगसे थककर शिथिलांग हो गया था और जलका कहीं आर-पार न देखकर नीचे गिरता जा रहा था। उस समय उसने हंससे इस प्रकार कहा— ।। ५६-५७ ।।