महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1880, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमझदार शल्य! ऐसा जानकर चुपचाप बैठे रहो। डरके मारे बहुत बड़बड़ाते क्यों हो। मद्रदेशके नराधम! यदि तुम चुप न हुए तो तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े करके मांसभक्षी प्राणियोंको बाँट दूँगा ।। ५२ ½ ।।
मित्रप्रतीक्षया शल्य धृतराष्ट्रस्य चोभयोः ।। ५३ ।।
अपवादतितिक्षाभिस्त्रिभिरेतैर्हि जीवसि ।
शल्य! एक तो मैं मित्र दुर्योधन और राजा धृतराष्ट्र दोनोंके कार्यकी ओर दृष्टि रखता हूँ, दूसरे अपनी निन्दासे डरता हूँ और तीसरे मैंने क्षमा करनेका वचन दिया है—इन्हीं तीन कारणोंसे तुम अबतक जीवित हो ।। ५३ ½ ।।
पुनश्चेदीदृशं वाक्यं मद्रराज वदिष्यसि ।। ५४ ।।
शिरस्ते पातयिष्यामि गदया वज्रकल्पया ।
मद्रराज! यदि फिर ऐसी बात बोलोगे तो मैं अपनी वज्र-सरीखी गदासे तुम्हारा मस्तक चूर-चूर करके गिरा दूँगा ।। ५४ ½ ।।
श्रोतारस्त्विदमद्येह द्रष्टारो वा कुदेशज ।। ५५ ।।
कर्णं वा जघ्नतुः कृष्णौ कर्णो वा निजघान तौ ।
नीच देशमें उत्पन्न शल्य! आज यहाँ सुननेवाले सुनेंगे और देखनेवाले देख लेंगे कि 'श्रीकृष्ण और अर्जुनने कर्णको मारा या कर्णने ही उन दोनोंको मार गिराया' ।। ५५ ½ ।।
एवमुक्त्वा तु राधेयः पुनरेव विशाम्पते ।
अब्रवीन्मद्रराजानं याहि याहीत्यसम्भ्रमम् ।। ५६ ।।
प्रजानाथ! ऐसा कहकर राधापुत्र कर्णने बिना किसी घबराहटके पुनः मद्रराज शल्यसे कहा—‘चलो, चलो’ ।। ५६ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णमद्राधिपसंवादे चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४० ।।
* युद्धसे पीछे न हटना ही राजा पुरूरवाका उत्तम चरित्र है।