महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1879, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यक्तं त्वमप्युपहितः पाण्डवैः पापदेशज ।। ४६ ।। यथा चामित्रवत् सर्वं त्वमस्मासु प्रवर्तसे । मैं बुद्धिमान् दुर्योधनका प्रिय मित्र हूँ। अतः मेरे पास जो कुछ धन-वैभव है, वह और मेरे प्राण भी उसीके लिये हैं। परंतु पापदेशमें उत्पन्न हुए शल्य! यह स्पष्ट जान पड़ता है कि पाण्डवोंने तुम्हें हमारा भेद लेनेके लिये ही यहाँ रख छोड़ा है; क्योंकि तुम हमारे साथ शत्रुके समान ही सारा बर्ताव कर रहे हो ।। ४५-४६ १/२ ।।
कामं न खलु शक्योऽहं त्वद्विधानां शतैरपि ।। ४७ ।। संग्रामाद् विमुखः कर्तुं धर्मज्ञ इव नास्तिकैः । जैसे सैकड़ों नास्तिक मिलकर भी धर्मज्ञ पुरुषको धर्मसे विचलित नहीं कर सकते, उसी प्रकार तुम्हारे-जैसे सैकड़ों मनुष्योंके द्वारा भी मुझे संग्रामसे विमुख नहीं किया जा सकता, यह निश्चय है ।। ४७ १/२ ।।
सारङ्ग इव घर्मार्तः कामं विलप शुष्य च ।। ४८ ।। नाहं भीषयितुं शक्यः क्षत्रवृत्ते व्यवस्थितः । तुम धूपसे संतप्त हुए हरिणके समान चाहे विलाप करो चाहे सूख जाओ। क्षत्रियधर्ममें स्थित हुए मुझ कर्णको तुम डरा नहीं सकते ।। ४८ १/२ ।।
तनुत्यजां नृसिंहानामाहवेष्वनिवर्तिनाम् ।। ४९ ।। या गतिर्गुरुणा प्रोक्ता पुरा रामेण तां स्मरे । पूर्वकालमें गुरुवर परशुरामजीने युद्धमें पीठ न दिखानेवाले एवं शत्रुका सामना करते हुए प्राण विसर्जन कर देनेवाले पुरुषसिंहोंके लिये जो उत्तम गति बतायी है, उसे मैं सदा याद रखता हूँ ।। ४९ १/२ ।।
तेषां त्राणार्थमुद्यन्तं वधार्थं द्विषतामपि ।। ५० ।। विद्धि मामास्थितं वृत्तं पौरूरवसमुत्तमम् । शल्य! तुम यह जान लो कि मैं धृतराष्ट्रके पुत्रोंकी रक्षाके लिये वैरियोँका वध करनेके लिये उद्यत हो राजा पुरूरवाके उत्तम* चरित्रका आश्रय लेकर युद्धभूमिमें डटा हुआ हूँ ।। ५० १/२ ।।
न तद् भूतं प्रपश्यामि त्रिषु लोकेषु मद्रप ।। ५१ ।। यो मामस्मादभिप्रायाद् वारयेदिति मे मतिः । मद्रराज! मैं तीनों लोकोंमें किसी ऐसे प्राणीको नहीं देखता, जो मुझे मेरे इस संकल्पसे विचलित कर दे, यह मेरा दृढ़ निश्चय है ।। ५१ १/२ ।।
एवं विद्वञ्जोषमास्व त्रासात् किं बहु भाषसे ।। ५२ ।। मा त्वां हत्वा प्रदास्यामि क्रव्याद्भ्यो मद्रकाधम ।