भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1876

गाथाओंको एकाग्रचित्त होकर मुझसे सुनो और सुनकर चुपचाप सह लो या जवाब दो॥ २०—२२॥

मित्रध्रुङ्मद्रको नित्यं यो नो द्वेष्टि स मद्रकः। मद्रके संगतं नास्ति क्षुद्रवाक्ये नराधमे॥ २३॥ मद्रदेशका अधम मनुष्य सदा मित्रद्रोही होता है। जो हमलोगोंसे अकारण द्वेष करता है, वह मद्रदेशका ही अधम मनुष्य है। क्षुद्रतापूर्ण वचन बोलनेवाले मद्रदेशके निवासीमें किसीके प्रति सौहार्दकी भावना नहीं होती॥

दुरात्मा मद्रको नित्यं नित्यमानृतिकोऽनृजुः। यावदन्त्यं हि दौरात्म्यं मद्रकेष्विति नः श्रुतम्॥ २४॥ मद्रनिवासी मनुष्य सदा ही दुरात्मा, सर्वदा झूठ बोलनेवाला और सदा ही कुटिल होता है। हमने सुन रखा है कि मद्रनिवासियोंमें मरते दमतक दुष्टता बनी रहती है॥ २४॥

पिता पुत्रश्च माता च श्वश्रूश्वशुरमातुलाः। जामाता दुहिता भ्राता नप्तान्ये ते च बान्धवाः॥ २५॥ वयस्याभ्यागताश्चान्ये दासीदासं च संगतम्। पुम्भिर्विमिश्रा नार्यश्च ज्ञाताज्ञाताः स्वयेच्छया॥ २६॥ येषां गृहेष्वशिष्टानां सक्तुमत्स्याशिनां तथा। पीत्वा सीधु सगोमांसं क्रन्दन्ति च हसन्ति च॥ २७॥ गायन्ति चाप्यबद्धानि प्रवर्तन्ते च कामतः। कामप्रलापिनोऽन्योन्यं तेषु धर्मः कथं भवेत्॥ २८॥ मद्रकेष्ववलिप्तेषु प्रख्याताशुभकर्मसु। सत्तू और मांस खानेवाले जिन अशिष्ट मद्रनिवासियोंके घरोंमें पिता, पुत्र, माता, सास, ससुर, मामा, बेटी, दामाद, भाई, नाती, पोते, अन्यान्य बन्धु-बान्धव, समवयस्क मित्र, दूसरे अभ्यागत अतिथि और दास-दासी—ये सभी अपनी इच्छाके अनुसार एक-दूसरेसे मिलते हैं। परिचित-अपरिचित सभी स्त्रियाँ सभी पुरुषोंसे सम्पर्क स्थापित कर लेती हैं और गोमांससहित मदिरा पीकर रोती, हँसती, गाती, असंगत बातें करती तथा कामभावसे किये जानेवाले कार्योंमें प्रवृत्त होती हैं। जिनके यहाँ सभी स्त्री-पुरुष एक-दूसरेसे कामसम्बन्धी प्रलाप करते हैं, जिनके पापकर्म सर्वत्र विख्यात हैं, उन घमंडी मद्रनिवासियोंमें धर्म कैसे रह सकता है?॥

नापि वैरं न सौहार्दं मद्रकेण समाचरेत्॥ २९॥ मद्रके संगतं नास्ति मद्रको हि सदामलः। मद्रनिवासीके साथ न तो वैर करे और न मित्रता ही स्थापित करे, क्योंकि उसमें सौहार्दकी भावना नहीं होती। मद्रनिवासी सदा पापमें ही डूबा रहता है॥ २९ १/२॥

मद्रकेषु च संसृष्टं शौचं गान्धारकेषु च॥ ३०॥