भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1875

अर्जुनके हाथमें गाण्डीव धनुष और श्रीकृष्णके हाथमें सुदर्शन चक्र है। एक कपिध्वज है तो दूसरा गरुड़ध्वज। शल्य! ये सब वस्तुएँ कायरोंको भय देनेवाली हैं; परंतु मेरा हर्ष बढ़ाती हैं ।। १४ १/२ ।। त्वं तु दुष्प्रकृतिमूढो महायुद्धेष्वकोविदः ।। १५ ।। भयावदीर्णः संत्रासादबद्धं बहु भाषसे । तुम तो दुष्ट स्वभावके मूर्ख मनुष्य हो। बड़े-बड़े युद्धोंमें कैसे शत्रुका सामना किया जाता है, इस बातसे अनभिज्ञ हो। भयसे तुम्हारा हृदय विदीर्ण-सा हो रहा है; अतः डरके मारे बहुत-सी असंगत बातें कह रहे हो ।। १५ १/२ ।। संस्तौषि तौ तु केनापि हेतुना त्वं कुदेशज ।। १६ ।। तौ हत्वा समरे हन्ता त्वामद्य सहबान्धवम् । पापदेशज दुर्बुद्धे क्षुद्र क्षत्रियपांसन ।। १७ ।। दुष्ट और पापी देशमें उत्पन्न हुए नीच क्षत्रिय-कुलांगार दुर्बुद्धि शल्य! तुम उन दोनोंकी किसी स्वार्थसिद्धिके लिये स्तुति करते हो; परंतु आज समरांगणमें उन दोनोंको मारकर बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारा भी वध कर डालूँगा ।। १६-१७ ।। सुहृद् भूत्वा रिपुः किं मां कृष्णाभ्यां भीषयिष्यसि । तौ वा मामद्य हन्तारौ हनिष्ये वापि तावहम् ।। १८ ।। तुम मेरे शत्रु होकर भी सुहृद् बनकर मुझे श्रीकृष्ण और अर्जुनसे क्यों डरा रहे हो। आज या तो वे ही दोनों मुझे मार डालेंगे या मैं ही उन दोनोंका संहार कर दूँगा ।। १८ ।। नाहं बिभेमि कृष्णाभ्यां विजानन्नात्मनो बलम् । वासुदेवसहस्रं वा फाल्गुनानां शतानि वा ।। १९ ।। अहमेको हनिष्यामि जोषमास्स्व कुदेशज । मैं अपने बलको अच्छी तरह जानता हूँ; इसलिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे कदापि नहीं डरता हूँ। नीच देशमें उत्पन्न शल्य! तुम चुप रहो। मैं अकेला ही सहस्रों श्रीकृष्णों और सैकड़ों अर्जुनोको मार डालूँगा ।। स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च प्रायः क्रीडागता जनाः ।। २० ।। या गाथाः सम्प्रगायन्ति कुर्वन्तोऽध्ययनं यथा । ता गाथाः शृणु मे शल्य मद्रकेषु दुरात्मसु ।। २१ ।। ब्राह्मणैः कथिताः पूर्वं यथावद् राजसंनिधौ । श्रुत्वा चैकमना मूढ क्षम वा ब्रूहि चोत्तरम् ।। २२ ।। मूर्ख शल्य! स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े लोग, खेलकूदमें लगे हुए मनुष्य और स्वाध्याय करनेवाले पुरुष भी दुरात्मा मद्रनिवासियोंके विषयमें जिन गाथाओंको गाया करते हैं तथा ब्राह्मणोंने पहले राजाके समीप आकर यथावत् रूपसे जिनका वर्णन किया है, उन