महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1910, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘जो प्रदेश हिमालय, गंगा, सरस्वती, यमुना और कुरुक्षेत्रकी सीमासे बाहर हैं तथा जो सतलज, व्यास, रावी, चिनाव और झेलम—इन पाँचों एवं छठी सिंधु नदीके बीचमें स्थित हैं, उन्हें बाहीक कहते हैं। वे धर्मबाह्य और अपवित्र हैं। उन्हें त्याग देना चाहिये।। गोवर्धनो नाम वटः सुभद्रं नाम चत्वरम् । एतद् राजकुलद्वारमाकुमारात् स्मराम्यहम् ॥ ८ ॥ ‘गोवर्धन नामक वटवृक्ष और सुभद्र नामक चबूतरा—ये दोनों वहाँके राजभवनके द्वारपर स्थित हैं, जिन्हें मैं बचपनसे ही भूल नहीं पाता हूँ।। ८ ।। कार्येणात्यर्थगूढेन वाहीकेषूषितं मया । तत एषां समाचारः संवासाद् विदितो मम ॥ ९ ॥ ‘मैं अत्यन्त गुप्त कार्यवश कुछ दिनोंतक बाहीक देशमें रहा था। इससे वहाँके निवासियोंके सम्पर्कमें आकर मैंने उनके आचार-व्यवहारकी बहुत-सी बातें जान ली थीं।। ९ ।। शाकलं नाम नगरमापगा नाम निम्नगा । जर्तिका नाम वाहीकास्तेषां वृत्तं सुनिन्दितम् ॥ १० ॥ ‘वहाँ शाकल नामक एक नगर और आपगा नामकी एक नदी है, जहाँ जर्तिक नामवाले बाहीक निवास करते हैं। उनका चरित्र अत्यन्त निन्दित है।। १० ।। धाना गौड़्यासवं पीत्वा गोमांसं लशुनैः सह । अपूपमांसवाट्यानामाशिनः शीलवर्जिताः ॥ ११ ॥ ‘वे भुने हुए जौ और लहसुनके साथ गोमांस खाते और गुड़से बनी हुई मदिरा पीकर मतवाले बने रहते हैं। पुआ, मांस और वाटी खानेवाले बाहीकदेशके लोग शील और आचारसे शून्य हैं।। ११ ।। गायन्त्यथ च नृत्यन्ति स्त्रियो मत्ता विवाससः । नगरागारवप्रेषु बहिर्माल्यानुलेपनाः ॥ १२ ॥ ‘वहाँकी स्त्रियाँ बाहर दिखायी देनेवाली माला और अंगराग धारण करके मतवाली तथा नंगी होकर नगर एवं घरोंकी चहारदिवारियोंके पास गाती और नाचती हैं।। १२ ।। मत्तावगीतैर्विविधैः खरोष्ट्रनिनदोपमैः । अनावृता मैथुने ताः कामचाराश्च सर्वशः ॥ १३ ॥ ‘वे गदहोंके रेंकने और ऊँटोंके बलबलानेकी-सी आवाजसे मतवालेपनमें ही भाँति-भाँतिके गीत गाती हैं और मैथुनकालमें भी परदेके भीतर नहीं रहती हैं। वे सब-की-सब सर्वथा स्वेच्छाचारिणी होती हैं।। १३ ।। आहुरन्योन्यसूक्तानि प्रब्रुवाणा मदोत्कटाः । हे हते हे हतेत्येवं स्वामिभर्तृहतेति च ॥ १४ ॥ आक्रोशन्त्यः प्रनृत्यन्ति व्रात्या पर्वस्वसंयताः ।