भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1911

‘मदसे उन्मत्त होकर परस्पर सरस विनोदयुक्त बातें करती हुई वे एक-दूसरीको ‘ओ घायल की हुई! ओ किसीकी मारी हुई! हे पतिमर्दिते!’ इत्यादि कहकर पुकारती और नृत्य करती हैं। पर्वों और त्योहारोंके अवसरपर तो उन संस्कारहीन रमणियोंके संयमका बाँध और भी टूट जाता है ।। १४ १/२ ।।

तासां किलावलिप्तानां निवसन् कुरुजाङ्गले ।। १५ ।।
कश्चिद् वाहीकदुष्टानां नातिहृष्टमना जगौ ।
‘उन्हीं बाहीकदेशी मदमत्त एवं दुष्ट स्त्रियोंका कोई सम्बन्धी वहाँसे आकर कुरुजांगल प्रदेशमें निवास करता था। वह अत्यन्त खिन्नचित्त होकर इस प्रकार गुनगुनाया करता था — ।। १५ १/२ ।।

सा नूनं बृहती गौरी सूक्ष्मकम्बलवासिनी ।। १६ ।।
मामनुस्मरती शेते वाहीकं कुरुजाङ्गले ।
‘निश्चय ही वह लंबी, गोरी और महीन कम्बलकी साड़ी पहननेवाली मेरी प्रेयसी कुरुजांगल प्रदेशमें निवास करनेवाले मुझ बाहीकको निरन्तर याद करती हुई सोती होगी ।। १६ १/२ ।।

शतद्रुकामहं तीर्त्वा तां च रम्यामिरावतीम् ।। १७ ।।
गत्वा स्वदेशं द्रक्ष्यामि स्थूलशङ्खाः शुभाः स्त्रियः ।
‘मैं कब सतलज और उस रमणीय रावी नदीको पार करके अपने देशमें पहुँचकर शंखकी बनी हुई मोटी-मोटी चूड़ियोंको धारण करनेवाली वहाँकी सुन्दरी स्त्रियोंको देखूँगा ।। १७ १/२ ।।

मनःशिलोज्ज्वलापाङ्ग्यो गौर्यस्त्रिककुदाञ्जनाः ।। १८ ।।
कम्बलाजिनसंवीताः कूर्दन्त्यः प्रियदर्शनाः ।
मृदङ्गानकशङ्खानां मर्दलानां च निःस्वनैः ।। १९ ।।
‘जिनके नेत्रोंके प्रान्तभाग मैनसिलके आलेपसे उज्ज्वल हैं, दोनों नेत्र और ललाट अंजनसे सुशोभित हैं तथा जिनके सारे अंग कम्बल और मृगचर्मसे आवृत हैं, वे गोरे रंगवाली प्रियदर्शना (परम सुन्दरी) रमणियाँ मृदंग, ढोल, शंख और मर्दल आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ-साथ कब नृत्य करती दिखायी देंगी ।। १८-१९ ।।

खरोष्ट्राश्वतरैश्चैव मत्ता यास्यामहे सुखम् ।
शमीपीलुकरीराणां वनेषु सुखवर्त्मसु ।। २० ।।
‘कब हमलोग मदोन्मत्त हो गदहे, ऊँट और खच्चरोंकी सवारीद्वारा सुखद मार्गोंवाले शमी, पीलु और करीलोंके जंगलोंमें सुखसे यात्रा करेंगे ।। २० ।।

अपूपान् सक्तुपिण्डांश्च प्राश्नन्तो मथितान्वितान् ।
पथि सुप्रबला भूत्वा कदा सम्पततोऽध्वगान् ।। २१ ।।
चेलापहारं कुर्वाणास्ताडयिष्याम भूयसः ।