भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1918

'कुरु, पांचाल, शाल्व, मत्स्य, नैमिष, कोसल, काशी, अंग, कलिंग, मगध और चेदिदेशोंके बड़भागी मनुष्य सनातन धर्मको जानते हैं ।। १४१/२ ।।

नानादेशेषु सन्तश्च प्रायो बाह्यालयादृते ।। १५ ।। आ मत्स्येभ्यः कुरुपञ्चालदेश्या आ नैमिषाच्चेदयो ये विशिष्टाः । धर्मं पुराणमुपजीवन्ति सन्तो मद्रानृते पाञ्चनदांश्च जिह्यान् ।। १६ ।।

'भिन्न-भिन्न देशोंमें बाहीकनिवासियोंको छोड़कर प्रायः सर्वत्र श्रेष्ठ पुरुष उपलब्ध होते हैं। मत्स्यसे लेकर कुरु और पांचाल देशतक, नैमिषारण्यसे लेकर चेदिदेशतक जो लोग निवास करते हैं, वे सभी श्रेष्ठ एवं साधु पुरुष हैं और प्राचीन धर्मका आश्रय लेकर जीवननिर्वाह करते हैं। मद्र और पंचनद प्रदेशोंमें ऐसी बात नहीं है। वहाँके लोग कुटिल होते हैं' ।। १५-१६ ।।

एवं विद्वान् धर्मकथासु राजं- स्तूष्णींभूतो जडवच्छल्य भूयः । त्वं तस्य गोप्ता च जनस्य राजा षड्भागहर्ता शुभदुष्कृतस्य ।। १७ ।।

राजा शल्य! ऐसा जानकर तुम जड पुरुषोंके समान धर्मोपदेशकी ओरसे मुँह मोड़कर चुपचाप बैठे रहो। तुम बाहीक देशके लोगोंके राजा और रक्षक हो; अतः उनके पुण्य और पापका भी छठा भाग ग्रहण करते हो ।। १७ ।।

अथवा दुष्कृतस्य त्वं हर्ता तेषामरक्षिता । रक्षिता पुण्यभाग् राजा प्रजानां त्वं ह्यपुण्यभाक् ।। १८ ।।

अथवा उनकी रक्षा न करनेके कारण तुम केवल उनके पापोंमें ही हिस्सा बँटाते हो। प्रजाकी रक्षा करनेवाला राजा ही उसके पुण्यका भागी होता है; तुम तो केवल पापके ही भागी हो ।। १८ ।।

पूज्यमाने पुरा धर्मे सर्वदेशेषु शाश्वते । धर्मं पाञ्चनदं दृष्ट्वा धिगित्याह पितामहः ।। १९ ।।

पूर्वकालमें समस्त देशोंमें प्रचलित सनातन धर्मकी जब प्रशंसा की जा रही थी, उस समय ब्रह्माजीने पंचनदवासियोंके धर्मपर दृष्टिपात करके कहा था कि 'धिक्कार है इन्हें!' ।। १९ ।।

व्रात्यानां दासमीयानां कृतेऽप्यशुभकर्मणाम् । ब्रह्मणा निन्दिते धर्मे स त्वं लोके किमब्रवीः ।। २० ।।

संस्कारहीन, जारज और पापकर्मों पंचनदवासियोंके धर्मकी जब ब्रह्माजीने सत्ययुगमें भी निन्दा की, तब तुम उसी देशके निवासी होकर जगत्‌मे क्यों धर्मोपदेश करने चले