महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1919, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहो? ॥ २० ॥
इति पाञ्चनदं धर्ममवमेने पितामहः ।
स्वधर्मस्थेषु वर्षेषु सोऽप्येतान् नाभ्यपूजयत् ॥ २१ ॥
पितामह ब्रह्माने पंचनदनिवासियोंके आचार-व्यवहाररूपी धर्मका इस प्रकार अनादर किया है। अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले अन्य देशोंकी तुलनामें उन्होंने इनका आदर नहीं किया ॥ २१ ॥
हन्त शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ।
कल्माषपादः सरसि निमज्जन् राक्षसोऽब्रवीत् ॥ २२ ॥
शल्य! इन सब बातोंको अच्छी तरह जान लो। अभी इस विषयमें तुमसे कुछ और भी बातें बता रहा हूँ, जिन्हें सरोवरमें डूबते हुए राक्षस कल्माषपादने कहा था— ॥ २२ ॥
क्षत्रियस्य मलं भैक्ष्यं ब्राह्मणस्याश्रुतं मलम् ।
मलं पृथिव्यां वाहीकाः स्त्रीणां मद्रस्त्रियो मलम् ॥ २३ ॥
‘क्षत्रियका मल है भिक्षावृत्ति, ब्राह्मणका मल है वेद-शास्त्रोंके विपरीत आचरण, पृथ्वीके मल हैं बाहीक और स्त्रियोंके मल हैं मद्रदेशकी स्त्रियाँ’ ॥ २३ ॥
निमज्जमानमुद्धृत्य कश्चिद् राजा निशाचरम् ।
अपृच्छत् तेन चाख्यातं प्रोक्तवांस्तन्निबोध मे ॥ २४ ॥
उस डूबते हुए राक्षसका किसी राजाने उद्धार करके उससे कुछ प्रश्न किया। उनके उस प्रश्नके उत्तरमें राक्षसने जो कुछ कहा था, उसे सुनो— ॥ २४ ॥
मानुषाणां मलं म्लेच्छा म्लेच्छानां शौण्डिका मलम् ।
शौण्डिकानां मलं षण्ढाः षण्ढानां राजयाजकाः ॥ २५ ॥
‘मनुष्योंके मल हैं म्लेच्छ, म्लेच्छोंके मल हैं शराब बेचनेवाले कलाल, कलालोंके मल हैं हींजड़े और हींजड़ोंके मल हैं राजपुरोहित ॥ २५ ॥
राजयाजकयाज्यानां मद्रकाणां च यन्मलम् ।
तद् भवेद् वै तव मलं यद्यस्मान्न विमुञ्चसि ॥ २६ ॥
‘राजपुरोहितोंके पुरोहितों तथा मद्रदेशवासियोंका जो मल है, वह सब तुम्हें प्राप्त हो, यदि इस सरोवरसे तुम मेरा उद्धार न कर दो’ ॥ २६ ॥
इति रक्षोपसृष्टेषु विषवीर्यहतेषु च ।
राक्षसं भेषजं प्रोक्तं संसिद्धवचनोत्तरम् ॥ २७ ॥
जिनपर राक्षसोंका उपद्रव है तथा जो विषके प्रभावसे मारे गये हैं, उनके लिये यह उत्तम सिद्ध वाक्य ही राक्षसके प्रभावका निवारण करनेवाला एवं जीवनरक्षक औषध बताया गया है ॥ २७ ॥
ब्राह्मं पञ्चालाः कौरवेयास्तु धर्म्यं
सत्यं मत्स्याः शूरसेनाश्च यज्ञम् ।