महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1920, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राच्या दासा वृषला दाक्षिणात्याः स्तेना वाहीकाः संकरा वै सुराष्ट्राः ॥ २८ ॥ पांचाल देशके लोग वेदोक्त धर्मका आश्रय लेते हैं, कुरुदेशके निवासी धर्मानुकूल कार्य करते हैं, मत्स्यदेशके लोग सत्य बोलते और शूरसेननिवासी यज्ञ करते हैं। पूर्वदेशके लोग दासकर्म करनेवाले, दक्षिणके निवासी वृषल, बाहीक देशके लोग चोर और सौराष्ट्र-निवासी वर्णसंकर होते हैं ॥ २८ ॥
कृतघ्नता परवित्तापहारो मद्यपानं गुरुदारावमर्दः । वाक्पारुष्यं गोवधो रात्रिचर्या बहिर्गेहं परवस्त्रोपभोगः ॥ २९ ॥ येषां धर्मस्तान् प्रति नास्त्यधर्मो ह्यारट्टानां पञ्चनदान् धिगस्तु । कृतघ्नता, दूसरोंके धनका अपहरण, मदिरापान, गुरुपत्नीगमन, कटुवचनका प्रयोग, गोवध, रातके समय घरसे बाहर घूमना और दूसरोंके वस्त्रका उपभोग करना—ये सब जिनके धर्म हैं, उन आरट्टों और पंचनदवासियोंके लिये अधर्म नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। उन्हें धिक्कार है! ॥ २९ १/२ ॥
आ पाञ्चाल्येभ्यः कुरवो नैमिषाश्च मत्स्याश्चैतेऽप्यथ जानन्ति धर्मम् । अथोदीच्याश्चाङ्गका मागधाश्च शिष्टान् धर्मानुपजीवन्ति वृद्धाः ॥ ३० ॥ पांचाल, कौरव, नैमिष और मत्स्यदेशोंके निवासी धर्मको जानते हैं। उत्तर, अंग तथा मगधदेशोंके वृद्ध पुरुष शास्त्रोक्त धर्मोंका आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते हैं ॥
प्राचीं दिशं श्रिता देवा जातवेदःपुरोगमाः । दक्षिणां पितरो गुप्तां यमेन शुभकर्मणा ॥ ३१ ॥ प्रतीचीं वरुणः पाति पाल्यानः सुरान् बली । उदीचीं भगवान् सोमो ब्राह्मणैः सह रक्षति ॥ ३२ ॥ अग्नि आदि देवता पूर्वदिशाका आश्रय लेकर रहते हैं, पितर पुण्यकर्मा यमराजके द्वारा सुरक्षित दक्षिण दिशामें निवास करते हैं, बलवान् वरुण देवताओंका पालन करते हुए पश्चिम दिशाकी रक्षामें तत्पर रहते हैं और भगवान् सोम ब्राह्मणोंके साथ उत्तर दिशाकी रक्षा करते हैं ॥
तथा रक्षःपिशाचाश्च हिमवन्तं नगोत्तमम् । गुह्यकाश्च महाराज पर्वतं गन्धमादनम् ॥ ३३ ॥ ध्रुवः सर्वाणि भूतानि विष्णुः पाति जनार्दनः ।