महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1921, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! राक्षस, पिशाच और गुह्यक—ये गिरिराज हिमालय तथा गन्धमादन पर्वतकी रक्षा करते हैं और अविनाशी एवं सर्वव्यापी भगवान् जनार्दन समस्त प्राणियोंका पालन करते हैं (परंतु बाहीक देशपर किसी भी देवताका विशेष अनुग्रह नहीं है) ॥ ३३ १/२ ॥
इङ्गितज्ञाश्च मगधाः प्रेक्षितज्ञाश्च कोसलाः ॥ ३४ ॥
अर्धोक्ताः कुरुपञ्चालाः शाल्वाः कृत्स्नानुशासनाः ।
पर्वतीयाश्च विषमा यथैव शिबयस्तथा ॥ ३५ ॥
मगधदेशके लोग इशारेसे ही सब बात समझ लेते हैं, कोसलनिवासी नेत्रोंकी भावभंगीसे मनका भाव जान लेते हैं, कुरु तथा पांचालदेशके लोग आधी बात कहनेपर ही पूरी बात समझ लेते हैं, शाल्वदेशके निवासी पूरी बात कह देनेपर उसे समझ पाते हैं, परंतु शिबिदेशके लोगोंकी भाँति पर्वतीय प्रान्तोंके निवासी इन सबसे विलक्षण होते हैं। वे पूरी बात कहनेपर भी नहीं समझ पाते ॥ ३४-३५ ॥
सर्वज्ञा यवना राजन् शूराश्चैव विशेषतः ।
म्लेच्छाः स्वसंज्ञानियता नानुक्तमितरे जनाः ॥ ३६ ॥
प्रतिरब्धास्तु वाहीका न च केचन मद्रकाः ।
राजन्! यद्यपि यवनजातीय म्लेच्छ सभी उपायोंसे बात समझ लेनेवाले और विशेषतः शूर होते हैं, तथापि अपने द्वारा कल्पित संज्ञाओंपर ही अधिक आग्रह रखते हैं (वैदिक धर्मको नहीं मानते)। अन्य देशोंके लोग बिना कहे हुए कोई बात नहीं समझते हैं, परंतु बाहीक देशके लोग सब काम उलटे ही करते हैं (उनकी समझ उलटी ही होती है) और मद्रदेशके कुछ निवासी तो ऐसे होते हैं कि कुछ भी नहीं समझ पाते ॥ ३६ १/२ ॥
स त्वमेतादृशः शल्य नोत्तरं वक्तुमर्हसि ।
पृथिव्यां सर्वदेशानां मद्रको मलमूच्यते ॥ ३७ ॥
शल्य! ऐसे ही तुम हो। अब मेरी बातका जवाब नहीं दोगे। मद्रदेशके निवासीको पृथ्वीके सम्पूर्ण देशोंका मल बताया जाता है ॥ ३७ ॥
सीधोः पानं गुरुतल्पावमर्दो
भ्रूणहत्या परवित्तापहारः ।
येषां धर्मस्तान् प्रति नास्त्यधर्म
आरट्टजान् पञ्चनदान् धिगस्तु ॥ ३८ ॥
मदिरापान, गुरुकी शय्याका उपभोग, भ्रूणहत्या और दूसरोंके धनका अपहरण—ये जिनके लिये धर्म हैं, उनके लिये अधर्म नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। ऐसे आरट्ट और पंचनददेशके लोगोंको धिक्कार है! ॥
एतज्ज्ञात्वा जोषमास्व प्रतीपं मा स्म वै कृथाः ।
मा त्वां पूर्वमहं हत्वा हनिष्ये केशवार्जुनौ ॥ ३९ ॥