भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1922

यह जानकर तुम चुपचाप बैठे रहो। फिर कोई प्रतिकूल बात मुँहसे न निकालो। अन्यथा पहले तुम्हींको मारकर पीछे श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध करूँगा ॥ ३९ ॥

शल्य उवाच

आतुराणां परित्यागः स्वदारसुतविक्रयः ।
अङ्गे प्रवर्तते कर्ण येषामधिपतिर्भवान् ॥ ४० ॥
**शल्य बोले—**कर्ण! तुम जहाँके राजा बनाये गये हो, उस अंगदेशमें क्या होता है? अपने सगे-सम्बन्धी जब रोगसे पीड़ित हो जाते हैं तो उनका परित्याग कर दिया जाता है। अपनी ही स्त्री और बच्चोंको वहाँके लोग सरे बाजार बेचते हैं ॥ ४० ॥
रथातिरथसंख्यायां यत् त्वां भीष्मस्तदाब्रवीत् ।
तान् विदित्वाऽऽत्मनो दोषान् निर्मन्युर्भव मा क्रुधः ॥ ४१ ॥
उस दिन रथी और अतिरथियोंकी गणना करते समय भीष्मजीने तुमसे जो कुछ कहा था, उसके अनुसार अपने उन दोषोंको जानकर क्रोधरहित हो शान्त हो जाओ ॥ ४१ ॥
सर्वत्र ब्राह्मणाः सन्ति सन्ति सर्वत्र क्षत्रियाः ।
वैश्याः शूद्रास्तथा कर्ण स्त्रियः साध्व्यश्च सुव्रताः ॥ ४२ ॥
कर्ण! सर्वत्र ब्राह्मण हैं। सब जगह क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं तथा सभी देशोंमें उत्तम व्रतका पालन करनेवाली साध्वी स्त्रियाँ होती हैं ॥ ४२ ॥
रमन्ते चोपहासेन पुरुषाः पुरुषैः सह ।
अन्योन्यमवतक्षन्तो देशे देशे समैथुनाः ॥ ४३ ॥
सभी देशोंके पुरुष दूसरे पुरुषोंके साथ बात करते समय उपहासके द्वारा एक-दूसरेको चोट पहुँचाते हैं और स्त्रियोंके साथ रमण करते हैं ॥ ४३ ॥
परवाच्येषु निपुणः सर्वो भवति सर्वदा ।
आत्मवाच्यं न जानीते जानन्नपि च मुह्यति ॥ ४४ ॥
दूसरोंके दोष बतानेमें सभी लोग सदा ही निपुण होते हैं; परंतु अपने दोषोंका उन्हें पता नहीं रहता, अथवा जानकर भी अनजान बने रहते हैं ॥ ४४ ॥
सर्वत्र सन्ति राजानः स्वं स्वं धर्ममनुव्रताः ।
दुर्मनुष्यान् निगृह्णन्ति सन्ति सर्वत्र धार्मिकाः ॥ ४५ ॥
सभी देशोंमें अपने-अपने धर्मका पालन करनेवाले राजा रहते हैं, जो दुष्टोंका दमन करते हैं तथा सर्वत्र ही धर्मात्मा मनुष्य निवास करते हैं ॥ ४५ ॥
न कर्ण देशसामान्यात् सर्वः पापं निषेवते ।
यादृशाः स्वस्वभावेन देवा अपि न तादृशाः ॥ ४६ ॥
कर्ण! एक देशमें रहनेमात्रसे सब लोग पापका ही सेवन नहीं करते हैं। उसी देशमें मनुष्य अपने श्रेष्ठ शील-स्वभावके कारण ऐसे महापुरुष हो जाते हैं कि देवता भी उनकी