महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1933, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘कर्ण! वह देखो, रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयदायक मेघसदृश महाघोर कबन्धाकार केतु नामक ग्रह सूर्यमण्डलको घेरकर खड़ा है ।। ४५ १/२ ।। पश्य यूथैर्बहुविधैर्मृगाणां सर्वतोदिशम् ।। ४६ ।। बलिभिर्दृप्तशार्दूलैरादित्योऽभिनिरीक्ष्यते । ‘देखो, चारों दिशाओंमें नाना प्रकारके पशुसमुदाय तथा बलवान् एवं स्वाभिमानी सिंह सूर्यकी ओर देख रहे हैं ।। ४६ १/२ ।। पश्य कङ्कांश्च गृध्रांश्च समवेतान् सहस्रशः ।। ४७ ।। स्थितानभिमुखान् घोरानन्योन्यमभिभाषतः । ‘देखो, सहस्रों घोर कंक और गीध एकत्र होकर सामने खड़े हैं और आपसमें कुछ बोल भी रहे हैं ।। रज्जिताश्चामरा युक्तास्तव कर्ण महारथे ।। ४८ ।। प्रवराः प्रज्वलन्त्येते ध्वजश्चैव प्रकम्पते । ‘कर्ण! तुम्हारे विशाल रथमें बँधे हुए ये रंगीन और श्रेष्ठ चँवर सहसा प्रज्वलित हो उठे हैं और तुम्हारी ध्वजा भी जोर-जोरसे हिलने लगी है ।। ४८ १/२ ।। सवेपथून् हयान् पश्य महाकायान् महाजवान् ।। ४९ ।। प्लवमानान् दर्शनीयानाकाशे गरुडानिव । ‘देखो, ये तुम्हारे विशालकाय, महान् वेगशाली, दर्शनीय तथा आकाशमें गरुडके समान उड़नेवाले घोड़े थरथर काँप रहे हैं ।। ४९ १/२ ।। ध्रुवमेषु निमित्तेषु भूमिमाश्रित्य पार्थिवाः ।। ५० ।। स्वप्स्यन्ति निहताः कर्ण शतशोऽथ सहस्रशः । ‘कर्ण! जब ऐसे अपशकुन प्रकट हो रहे हैं तो निश्चय ही आज सैकड़ों और हजारों नरेश मारे जाकर रणभूमिमें शयन करेंगे ।। ५० १/२ ।। शङ्खानां तुमुलः शब्दः श्रूयते लोमहर्षणः ।। ५१ ।। आनकानां च राधेय मृदङ्गानां च सर्वशः । ‘राधानन्दन! सब ओर शंखों, ढोलों और मृदंगोंकी रोमांचकारी तुमुल ध्वनि सुनायी दे रही है ।। ५१ १/२ ।। बाणशब्दान् बहुविधान् नराश्वरथनिस्वनान् ।। ५२ ।। ज्यातलत्रेषुशब्दांश्च शृणु कर्ण महात्मनाम् । ‘कर्ण! बाणोंके भाँति-भाँतिके शब्द, मनुष्यों, घोड़ों और रथोंके कोलाहल तथा महामनस्वी वीरोंकी प्रत्यंचा और दस्तानोंके शब्द सुनो ।। ५२ १/२ ।। हेमरूप्यप्रसृष्टानां वाससां शिल्पिनिर्मिताः ।। ५३ ।। नानावर्णा रथे भान्ति श्वसनेन प्रकम्पिताः ।