भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1934, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1934

रथोंकी ध्वजाओंपर सोने और चाँदीके तारोंसे खचित वस्त्रोंकी बनी हुई शिल्पियोंद्वारा निर्मित बहुरंगी पताकाएँ हवाके झोंकेसे हिलती हुई कैसी शोभा पा रही हैं॥ ५३ १/२ ॥ सहेमचन्द्रताराकाः पताकाः किङ्किणीयुताः ॥ ५४ ॥ पश्य कर्णार्जुनस्यैताः सौदामन्य इवाम्बुदे । ‘कर्ण! देखो, अर्जुनके रथकी इन पताकाओंमें सुवर्णमय चन्द्रमा, सूर्य और तारोंके चिह्न बने हुए हैं और छोटी-छोटी घंटियाँ लगी हुई हैं। रथपर फहराती हुई ये पताकाएँ मेघोंकी घटामें बिजलीके समान प्रकाशित हो रही हैं॥ ५४ १/२ ॥ ध्वजाः कणकणायन्ते वातेनाभिसमीरिताः ॥ ५५ ॥ विभ्राजन्ति रथे कर्ण विमाने दैवते यथा । ‘कर्ण! देवताओंके विमान-जैसे रथपर ये ध्वज हवाके झोंके खा-खाकर कड़कड़ शब्द करते हुए शोभा पा रहे हैं॥ ५५ १/२ ॥ सपताका रथाश्चैते पञ्चालानां महात्मनाम् ॥ ५६ ॥ पश्य कुन्तीसुतं वीरं बीभत्सुमपराजितम् । प्रधर्षयितुमायान्तं कपिप्रवरकेतनम् ॥ ५७ ॥ ‘ये महामनस्वी पांचाल वीरोंके रथ हैं, जिनपर पताकाएँ फहरा रही हैं। यह देखो, श्रेष्ठ वानरयुक्त ध्वजावाले अपराजित वीर कुन्तीकुमार अर्जुन आक्रमण करनेके लिये इधर ही आ रहे हैं॥ ५६-५७॥ एष ध्वजाग्रे पार्थस्य प्रेक्षणीयः समन्ततः । दृश्यते वानरो भीमो द्विषतामघवर्धनः ॥ ५८ ॥ ‘अर्जुनके ध्वजके अग्रभागपर यह सब ओरसे देखनेयोग्य भयंकर वानर दृष्टिगोचर होता है, जो शत्रुओंका दुःख बढ़ानेवाला है॥ ५८॥ एतच्चक्रं गदा शार्ङ्गं शङ्खः कृष्णस्य धीमतः । अत्यर्थं भ्राजते कृष्णे कौस्तुभस्तु मणिस्ततः ॥ ५९ ॥ ‘ये बुद्धिमान् श्रीकृष्णके शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग-धनुष अत्यन्त शोभा पा रहे हैं। उनके वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि सबसे अधिक प्रकाशित हो रही है॥ ५९॥ एष शङ्खगदापाणिर्वासुदेवोऽतिवीर्यवान् । वाहयन्नेति तुरगान् पाण्डुरान् वातरंहसः ॥ ६० ॥ ‘हाथोंमें शंख और गदा धारण करनेवाले ये अत्यन्त पराक्रमी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वायुके समान वेगशाली श्वेत घोड़ोंको हाँकते हुए इधर ही आ रहे हैं॥ एतत् कूजति गाण्डीवं विकृष्टं सव्यसाचिना । एते हस्तवता मुक्ता घ्नन्त्यमित्रान्शिताः शराः ॥ ६१ ॥ ‘सव्यसाची अर्जुनके हाथसे खींचे गये गाण्डीव धनुषकी यह टंकार होने लगी। उनके कुशल हाथोंसे छोड़े गये ये पैने बाण शत्रुओंके प्राण ले रहे हैं॥ ६१॥

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