महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1936, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपड़ती है ।। ६९ ।। अद्य द्रक्ष्यसि तं वीरं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् । निघ्नन्तं शात्रवान् संख्ये यं कर्ण परिपृच्छसि ।। ७० ।। ‘कर्ण! तुम जिन्हें पूछ रहे थे, युद्धस्थलमें शत्रुओंका संहार करते हुए उन कृष्णसारथि श्वेतवाहन वीर अर्जुनको अभी देखोगे ।। ७० ।। अद्य तौ पुरुषव्याघ्रौ लोहिताक्षौ परंतपौ । वासुदेवार्जुनौ कर्ण द्रष्टास्येकरथे स्थितौ ।। ७१ ।। ‘कर्ण! लाल नेत्रोंवाले उन शत्रुसंतापी पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुनको आज तुम एक रथपर बैठे हुए देखोगे ।। सारथिर्यस्य वार्ष्णेयो गाण्डीवं यस्य कार्मुकम् । तं चेद्धन्तासि राधेय त्वं नो राजा भविष्यसि ।। ७२ ।। ‘राधापुत्र! श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं और गाण्डीव जिनका धनुष है, उन अर्जुनको यदि तुमने मार लिया तो तुम हमारे राजा हो जाओगे ।। ७२ ।। एष संशप्तकाहूतस्तानेवाभिमुखो गतः । करोति कदनं चैषां संग्रामे द्विषतां बली ।। ७३ ।। ‘यह देखो, संशप्तकोंकी ललकार सुनकर महाबली अर्जुन उन्हींकी ओर चल पड़े और अब संग्राममें उन शत्रुओंका संहार कर रहे हैं’ ।। ७३ ।। इति ब्रुवाणं मद्रेशं कर्णः प्राहातिमन्युना । पश्य संशप्तकैः क्रुद्धैः सर्वतः समभिद्रुतः ।। ७४ ।। ऐसी बातें कहते हुए मद्रराज शल्यसे कर्णने अत्यन्त क्रोधपूर्वक कहा—‘तुम्हीं देखो न, रोषमें भरे हुए संशप्तकोंने उनपर चारों ओरसे आक्रमण कर दिया है ।। एष सूर्य इवाम्भोदैश्छन्नः पार्थो न दृश्यते । एतदन्तोऽर्जुनः शल्य निमग्नो योधसागरे ।। ७५ ।। ‘यह लो, बादलोंसे ढके हुए सूर्यके समान अर्जुन अब नहीं दिखायी देते हैं। शल्य! अब अर्जुनका यहीं अन्त हुआ समझो। वे योद्धाओंके समुद्रमें डूब गये’ ।। ७५ ।।
शल्य उवाच
वरुणं कोऽम्भसा हन्यादिन्धनेन च पावकम् । को वानिलं निगृह्णीयात् पिबेद् वा को महार्णवम् ।। ७६ ।। **शल्यने कहा—**कर्ण! कौन ऐसा वीर है जो जलसे वरुणको और ईंधनसे अग्निको मार सके? वायुको कौन कैद कर सकता है अथवा महासागरको कौन पी सकता है? ।। ७६ ।। ईदृग्रूपमहं मन्ये पार्थस्य युधि विग्रहम् । न हि शक्योऽर्जुनो जेतुं युधि सेन्द्रैः सुरासुरैः ।। ७७ ।।