भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1940

दिव्य कवच और आयुध धारण किये, सिंहके समान पराक्रमी सेवकोंसहित समस्त द्रौपदीपुत्र युद्धके लिये उत्सुक हो धृष्टद्युम्नकी रक्षा करने लगे, मानो तेजस्वी शरीरवाले नक्षत्र चन्द्रमाका संरक्षण कर रहे हों॥

अथ व्यूढेष्वनीकेषु प्रेक्ष्य संशप्तकान् रणे ॥ ७ ॥
क्रुद्धोऽर्जुनोऽभिदुद्राव व्याक्षिपन् गाण्डिवं धनुः ।
इस प्रकार सेनाओंकी व्यूह-रचना हो जानेपर रणभूमिमें संशप्तकोंकी ओर देखकर क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए उनपर आक्रमण किया॥ ७ १/२ ॥

अथ संशप्तकाः पार्थमभ्यधावन् वधैषिणः ॥ ८ ॥
विजये धृतसंकल्पा मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ।
तब विजयका दृढ़ संकल्प लेकर मृत्युको ही युद्धसे निवृत्त होनेका निमित्त बनाकर अर्जुनके वधकी इच्छावाले संशप्तकोंने भी उनपर धावा बोल दिया॥ ८ १/२ ॥

तन्नराश्वौघबहुलं मत्तनागरथाकुलम् ॥ ९ ॥
पत्तिमच्छूरवीरौघं द्रुतमर्जुनमार्दयत् ।
संशप्तकोंकी सेनामें पैदल मनुष्यों और घुड़सवारोंकी संख्या बहुत अधिक थी। मतवाले हाथी और रथ भी भरे हुए थे। पैदलोंसहित शूरवीरोंके उस समुदायने तुरंत ही अर्जुनको पीड़ा देना आरम्भ किया॥ ९ १/२ ॥

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तेषामासीत् किरीटिना ॥ १० ॥
तस्यैव नः श्रुतो यादृङ्निवातकवचैः सह ।
किरीटधारी अर्जुनके साथ संशप्तकोंका वह संग्राम वैसा ही भयानक था, जैसा कि निवातकवच नामक दानवोंके साथ अर्जुनका युद्ध हमने सुन रखा है॥ १० १/२ ॥

रथानश्वान् ध्वजान् नागान् पतीन् रणगतानपि ॥ ११ ॥
इषून् धनूंषि खड्गांश्च चक्राणि च परश्वधान् ।
सायुधानुद्यतान् बाहून् विविधान्यायुधानि च ॥ १२ ॥
चिच्छेद द्विषतां पार्थः शिरांसि च सहस्रशः ।
तदनन्तर कुन्तीकुमार अर्जुनने रणस्थलमें आये हुए शत्रुपक्षके रथों, घोड़ों, ध्वजों, हाथियों और पैदलोंको भी काट डाला, उन्होंने शत्रुओंके धनुष, बाण, खड्ग, चक्र, फरसे, आयुधोंसहित उठी हुई भुजा, नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र तथा सहस्रों मस्तक काट गिराये॥ ११-१२ १/२ ॥

तस्मिन् सैन्यमहावर्ते पातालतलसंनिभे ॥ १३ ॥
निमग्नं तं रथं मत्वा नेदुः संशप्तका मुदा ।