महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1941, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसेनाओंकी उस विशाल भँवरमें जो पातालतलके समान प्रतीत होता था, अर्जुनके उस रथको निमग्न हुआ मानकर संशप्तक सैनिक प्रसन्न हो सिंहनाद करने लगे ॥ १३ १/२ ॥
स पुनस्तानरीन् हत्वा पुनरुत्तरतोऽवधीत् ॥ १४ ॥
दक्षिणेन च पश्चाच्च क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ।
तत्पश्चात् उन शत्रुओंका वध करके पुनः अर्जुनने कुपित हो उत्तर, दक्षिण और पश्चिमकी ओरसे आपकी सेनाका उसी प्रकार संहार आरम्भ किया, जैसे प्रलयकालमें रुद्रदेव पशुओं (जगत्के प्राणियों)-का विनाश करते हैं ॥ १४ १/२ ॥
अथ पञ्चालचेदीनां सृञ्जयानां च मारिष ॥ १५ ॥
त्वदीयैः सह संग्राम आसीत् परमदारुणः ।
माननीय नरेश! फिर आपके सैनिकोंके साथ पाञ्चाल, चेदि और सृजयवीरोंका अत्यन्त भयंकर संग्राम होने लगा ॥ १५ १/२ ॥
कृपश्च कृतवर्मा च शकुनिश्चापि सौबलः ॥ १६ ॥
हृष्टसेनाः सुसंरब्धा रथानीकप्रहारिणः ।
कोसलैः काश्यमत्स्यैश्च कारूषैः केकयैरपि ॥ १७ ॥
शूरसेनैः शूरवरैर्ययुर्युधुर्युद्धदुर्मदाः ।
रथियोंकी सेनामें प्रहार करनेमें कुशल कृपाचार्य, कृतवर्मा और सुबलपुत्र शकुनि—ये रणदुर्मद वीर अत्यन्त कुपित हो हर्षमें भरी हुई सेना साथ लेकर कोसल काशि, मत्स्य, करूष, केकय तथा शूरसेनदेशीय शूरवीरोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १६-१७ १/२ ॥
तेषामन्तकरं युद्धं देहपाप्मासुनाशनम् ॥ १८ ॥
क्षत्रविट्शूद्रवीराणां धर्म्यं स्वर्ग्यं यशस्करम् ।
उनका वह युद्ध क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रवीरोंके शरीर, पाप और प्राणोंका विनाश करनेवाला, संहारकारी, धर्मसंगत स्वर्गदायक तथा यशकी वृद्धि करनेवाला था ॥ १८ १/२ ॥
दुर्योधनोऽथ सहितो भ्रातृभिर्भरतर्षभ ॥ १९ ॥
गुप्तः कुरुप्रवीरैश्च मद्राणां च महारथैः ।
पाण्डवैः सह पञ्चालैश्चेदिभिः सात्यकेन च ॥ २० ॥
युध्यमानं रणे कर्णं कुरुवीरो व्यपालयत् ।
भरतश्रेष्ठ! भाइयोंसहित कुरुवीर दुर्योधन कौरववीरों तथा मद्रदेशीय महारथियोंसे सुरक्षित हो रणभूमिमें पाण्डवों, पांचालों, चेदिदेशके वीरों तथा सात्यकिके साथ जूझते हुए कर्णकी रक्षा करने लगा ॥ १९-२० १/२ ॥
कर्णोऽपि निशितैर्बाणैर्विनिहत्य महाचमूम् ॥ २१ ॥
प्रमृद्य च रथश्रेष्ठान् युधिष्ठिरमपीडयत् ।